अनमोल वचन

अनमोल वचन

रजोगुण क्रियाशील का प्रतीक है। इसके बढने का लोभ, अति महत्वाकांक्षा, विषय भोगों की घोर लालसा, स्वार्थ बुद्धि प्रकट होती है। कुछ अधिक पाने की लालसा में अतिकर्म करने लगता है। इसके करने में पाने की तीव्र इच्छा समाई रहती है। वह करता ही है कुछ पाने के लिये। जितना अधिक करता है, उससे अधिक पाने का सपना संजोता है। उसकी नियति बन जाती है- बस करते जाओ और विभिन्न वस्तुओं को पाते जाओ। उसकी यह यात्रा थमती नहीं, बस अंतहीन पथ पर सब कुछ पाने के लिये चलती रहती है। इससे उसके भीतर लोभ पैदा हो जाता है। लोभ तो ऐसी अग्नि की ज्वाला है, जो कभी बुझती नहीं, इच्छा और महत्वाकांक्षा की हवि से यह और धधकने लगती है। यह है रजोगुण की क्रियाशीलता। रजोगुण में पाप पुण्य दोनों प्रकट होते हैं। मन चंचल होता है, सुख-दुख, चिंता-परेशानी सतत बनी रहती है। सुख भोग के समय उसका अहंकार बढ जाता है कि वह कुछ भी करे तो उसका कुछ नहीं बिगडेगा। उन्माद में पाप कर्म करने लगता है। परिणाम स्वरूप दुख-कष्ट भोगने पडते हैं। इस अवस्था में साधना नहीं हो पाती। केवल निष्कामता के द्वारा ही तमोगुण के दोषों से मुक्ति पाई जा सकती है।

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