अनमोल वचन

अनमोल वचन

तमोगुणी व्यक्ति निकृष्ट माना जाता है। तमोगुण के बढने पर अन्त:करण और इन्द्रियों में जडता आ जाती है, कार्य करने की इच्छा समाप्त हो जाती है, विचारों में नकारात्मकता आ जाती है। शरीर आलस्य का घर बन जाता है, निंद्रा उसकी सहचरी बन जाती है। व्यक्ति यों ही निश्चेष्ट, निष्क्रिय और मुर्दे के समान पडा रहता है, शरीर, मन जडवत हो जाते हैं, हृदय भावहीन हो जाता है। वह दूसरों के दुख से संवेदित नहीं होता। तमोगुणी घोर स्वार्थी और दूसरों पर आश्रित होता है। वह स्वतंत्र रूप से कोई कार्य नहीं कर सकता, करता है तो केवल अपने लिये वह आलस्य, प्रमाद और निंद्रा की जीती जागती मूर्ति होता है। पतंजलि ने इसे मूढावस्था की संज्ञा दी है। चित्त के सिकुड जाने से वह मनुष्य योनियों में निकृष्ट योनियों को प्राप्त होता है, किन्तु कर्मयोग के द्वारा तमोगुण से ऊपर उठा जा सकता है।

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