अनमोल वचन

अनमोल वचन

प्रेम हृदय का पवित्र श्रृंगार है। प्रेम वही हृदय कर सकता है, जो पवित्रता, पावनता एवं दिव्यता से आपूरित हो अन्यथा वह वासना, ईष्र्या, द्वेष जैसा कलुषित एवं कालिमायुक्त हो जाता है। आज की सच्चाई यही है कि संसार में प्रेम को इन्हीं बद रंगों के रूप में परिभाषित किया जाता है, संकीर्ण बनाकर परोसा जाता है। प्रेम के इस मलिन और विषाक्त रूप को प्रेम मानने से जीवन असहाय, असहज एवं वासनाग्रस्त हो जाता है, जिसमें पतन, पराभव और पराजय का विष घुला रहता है, जो मानवीय व्यक्तित्व को पतित करता रहता है। प्रेम इन्द्रियों का विषय नहीं, इन्द्रयातीत है। इसे पवित्र एवं निष्कपट हृदय से ही अनुभव किया जा सकता है। हृदय की पवित्रता एवं निष्कपटता में प्रेम बसता है। प्रेम मांग नहीं, बल्कि एक भाव है, जो अपने भीतर त्याग, बलिदान एवं समर्पण की अकथनीय कथा को जीवंत रखता है। इसी प्रेम की डोर थामकर राष्ट्र को माता मानकर वीर बलिदानी इसकी बलि वेदी पर असंख्य बार कुर्बान, बलिदान एवं उत्सर्ग की प्रेरणा से भर गये। प्रेम इसी प्रेरणा का नाम है, जो हमारे दिलों में बसकर राष्ट्र के प्रति समर्पित होने के लिये प्रेरित करे। प्रेम का सच्चा स्वरूप यही है।

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