अनमोल वचन

अनमोल वचन

वेद, पुराणों, उपनिषदों से लेकर हमारे महान आध्यात्मिक संतों ने प्रभु के प्रति समर्पण की महिमा गाई है। समर्पण पर विशेष बल देते हुए उसे प्रभु तक पहुंचने का एक स्वर्ण सोपान बताया है। गीता में श्री कृष्ण स्पष्ट रूप से अर्जुन से ही नहीं, बल्कि सभी के लिये यह संदेश करते प्रतीत होते हैं 'सर्व धर्मान परित्यज मामेक शरण ब्रज। अर्थात सब कुछ समर्पित कर देने का स्पष्ट संकेत सब कुछ छोडकर शरणगत होने का अर्थ समर्पण ही है। अब प्रश्न उठता है कि क्या है यह समर्पण? तथा समर्पित करने का आदेश भगवान देते हैं? एक बात सत्य है कि सत्य को सीधे शब्दों में नहीं कहा जा सकता। सत्य को कहने के लिये हम शब्दों का प्रयोग करते हैं और शब्द ईश्वर के समक्ष वैसे ही सिद्ध होते हैं, जैसे हम हवा को मुट्ठी में बांधने का प्रयास करें। फिर भी करूणा से पूर्ण प्रत्येक संत ने सत्य को शब्दों के द्वारा उद्भाषित करने का प्रयास किया। विचार करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि समर्पण का मन में उदय होते ही अहंकार का गलना आरम्भ हो जाता है। अहंकार उस शासक की तरह है, जो अलग अस्तित्व चाहता है और तन मन को ही नहीं, वरन पूरी सृष्टि को गुलाम बनाकर रखने की चेष्टा करता है। अहंकार जब छूट जाता है, तो हम सब कुछ प्रभु के चरणों में समर्पित कर चुके होते हैं। चिंताओं से हमें मुक्ति मिल जाती है, एक अपूर्व शान्ति हमारे अन्तस में उतर जाती है, यही शान्ति हमारे लिये समर्पण के बदले मिला प्रभु का प्रसाद है।

Share it
Top