अनमोल वचन

अनमोल वचन

विद्या केवल अक्षर ज्ञान नहीं। वह ज्ञान का पर्यायवाची है, जिसके द्वारा कत्र्तव्य बोध की प्रेरणा प्राप्त हो, स्वतंत्र रूप से विचार करने की बुद्धि विकसित हो, परिस्थितियों से टकराने की सामथ्र्य पैदा हो, अन्यथा वह विद्या निस्तेज है, निष्प्राण है। आज के समय में विद्या का स्वरूप ही बदल गया है। उसमें नैतिक शिक्षण और चरित्र निर्माण के लिये कोई स्थान नहीं, कोरी बौद्धिक उन्नति की ओर ही प्रयत्न है। विद्यार्थियों का चरित्र बल, कर्म शक्ति, आशा, विश्वास, उत्साह, संयम और सात्विकता जागृत करने की शक्ति उसमें नहीं। राष्ट्र के प्रति अनुराग और देशभक्ति, मातृ-पितृ का पाठ उसमें पढाया ही नहीं जाता, मात्र दिखावटी विद्या दी जा रही है। असंख्य डिग्रियां प्राप्त करके भी छात्रों में छलकपट, धूर्तता, द्वेष, फैशन परस्ती, विलासिता, दुष्चरित्रता और अहंकार के भाव पाये जाने की शिकायतें मिलती हैं। आज के कलियुगी विद्यार्थियों की करतूतें किसी से छिपी नहीं। तनिक-तनिक सी बातों पर मारपीट, झगडेबाजी, परीक्षाओं में नकल, लडकियों से गंदा मजाक, अशिष्ट शब्दों का प्रयोग, माता-पिता का अपमान, फिजूलखर्ची, सिनेमा, सिगरेट आदि व्यसन जैसे दोष देखे जाते हैं। उनमें स्वतंत्र चिंतन का अभाव है। जो विद्या संस्कारवान न बना सके, चरित्रवान न बना सके, वह विद्या नहीं, अविद्या ही कही जायेगी।

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