अनमोल वचन

अनमोल वचन

सीखने से अधिक कठिन कार्य सिखाना है अर्थात विद्या ग्रहण करने वाले विद्यार्थी से शिक्षक का कार्य कठिन होता है। प्राचीन काल में हर प्रकार से उन्नत चरित्र वाला विद्वान ही शिक्षक बनने का साहस कर सकता था। ऐसे विद्वान को शिक्षण का कार्य सौंपा जाता था, जो अक्षर ज्ञान के साथ-साथ विद्यार्थी की प्रतिभा को विकसित करने में सामथ्र्यवान हो। यह तत्व विद्या ही है जो मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती है और ऊंचे स्तर पर पहुंचाती है। आज के शिक्षक गुरूओं का चारित्रिक, नैतिक उत्तरदायित्व की भावना किस स्तर की है, वह सर्वविदित है। जो उनके पास नहीं है, वह वें अपने शिष्य को कहां से दे पायेंगे। महाराजा धृतराष्ट्र को कौरवों तथा पांडवों को शस्त्र प्रशिक्षण देने के लिये सुयोग्य आचार्य की आवश्यकता थी, किन्तु कोई विद्वान राजगुरू उन्हें दिखाई नहीं दिया। अकेले शस्त्र प्रशिक्षण देने की बात रही होती तो वह कार्य कई एक प्रशिक्षक कर सकते थे, परन्तु नैतिक स्तर ऊंचा उठाने के लिये चरित्र सद्ज्ञान, विद्वता और प्रतिभा सभी एक साथ एक ही व्यक्ति में मिलना कठिन कार्य था। एक दिन गुरू द्रोणाचार्य उनकी सभा में आये। इतने प्रवीण आचार्य का पांडित्य धृतराष्ट्र को मुग्ध कर गया। उन्होंने उन्हें युवराजों के विकास के योग्य समझा। उनसे प्रार्थना की गई और उनकी सहमति भी प्राप्त हो गई। उनके दिये गये प्रशिक्षण से सभी अवगत हैं।

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