अनमोल वचन

अनमोल वचन

ईश्वर जड़ नहीं चेतन है। इसे प्रतिमाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता। चेतन वस्तुत: चेतना के साथ ही दूध पानी की तरह घुल मिल सकती है। मानवीय अन्त:करण ही ईश्वर का सबसे निकटवर्ती और सुनिश्चित स्थान हो सकता है। एक शिक्षाप्रद दृष्टांत के अनुसार मंदिर बनाने के लिये व्याकुल किसी भक्तजन ने सूफी संत से मंदिर की रूपरेखा बना देने के लिये अनुरोध किया। संत ने अत्यंत गम्भीरता से कहा- इमारत अपनी इच्छानुरूप कारीगरों की सलाह से अपने बजट के अनुसार बना लो, पर एक बात मेरी मानो उसमें प्रतिमा के स्थान पर एक विशालकाय दर्पण ही प्रतिष्ठित करना, ताकि उसमें अपनी छवि देखकर दर्शकों को इस वास्तविकता का बोध हो सके कि या तो ईश्वर का निवास उसके भीतर विद्यमान है अथवा फिर यह समझो कि आत्म सत्ता को यदि परिष्कृत किया जाये तो वही परम सत्ता में विकसित हो सकती है। इतना ही नहीं, वह परिष्कृत आत्मसत्ता पात्रता के अनुरूप दिव्य वरदानों की अनवरत वर्षा भी करती रह सकती है। भक्त को कुछ का कुछ सुझाने वाली सस्ती भावुकता अथवा मंदिर बनाने के यश की आकांक्षा से छुटकारा मिला। उसने एक बडा हाल बनाकर सचमुच ही एक स्थान पर एक विशाल दर्पण प्रतिष्ठित कर दिया, जिसे देखकर दर्शक अपने भीतर के भगवान को देखने और उसे निखारने, उभारने का प्रयास करते रह सकें।

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