अनमोल वचन

अनमोल वचन

हीरा और कुछ नहीं, कोयले का ही परिष्कृत स्वरूप है। भाप से उडाया पानी ही स्रवित जल (डिस्टिल्ड वाटर) है, जिसकी शुद्धता पर विश्वास करते हुए उसे इन्जैक्शन जैसे जोखिम भरे कार्य में प्रयुक्त किया जाता है। मनुष्य और कुछ नहीं, मात्र भटका हुआ देवता है, यदि वह अपने ऊपर चढे मल आवरण और विक्षेप को उतार फेंके तो उसका अतुलित सौंदर्य देखते ही बनता है। अष्टावक्र की दृश्यमान कुरूपता उनकी आकर्षता, प्रतिभा और प्रभाव गरिमा में राई रत्ती भर भी अन्तर न डाल सकी। जब मनुष्य के अन्त:करण का सौंदर्य खुलता है तो बाहरी सौंदर्य की कमी का कोई महत्व नहीं रह जाता। गीता का वचन है 'मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है। मन ही बन्धन और मोक्ष का एकमात्र कारण है। 'अपने आपको ऊंचा उठाओ, गिराओ मत। इन अभिवचनों में अलंकार जैसा कुछ नहीं। इनमें आदि से अन्त तक सत्य ही सत्य भरा पडा है। एक आप्त पुरूष का वचन है 'मनुष्य की एक मुट्ठी में स्वर्ग है और दूसरी में नरक है। वह अपने लिये इन दोनों में से किसी को भी खोलने में स्वतंत्र है। यदि कस्तूरी मृग की भांति निरर्थक न भटकना हो तो हमें अपना ही अन्त:करण टटोलना चाहिए। हृदय में बैठे परमात्मा को जी भरकर देखने, उनसे मिलने की अभिलाषा सहज ही पूरी की जा सकती है। भावुकता अथवा काल्पनिक उडानें उडने से बात कुछ बन नहीं पायेगी।

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