अनमोल वचन

अनमोल वचन

पुराणों में वर्णित वैतरणी नदी का भाव वितरण से ही है। जो अपने जीवन में अपनी शुद्ध कमाई के अन्न से वितरण करके खाता है, वही परलोक में सुख का भागी होता है। जो अकेला अकेला खाता है, वह नीच योनियों का भागी होता है। ऋग्वेद में कहा गया है कि 'केवलधौ भवति केवला दीÓ अर्थात अकेला खाने वाला पापी बनता है। त्यागपूर्वक भोग किया हुआ अन्न हमारे अन्दर बल व प्राण शक्ति धारण कराता है। अन्न जीवन का आधार है, इस सत्य को हम सब जानते हैं, परन्तु यह विचार नहीं करते कि वह वायु और जल के बाद ईश्वर का सबसे बडा वरदाान है। कणाद ऋषि ने अन्न की महिमा को भली भांति समझा था। किसान जब फसल काटकर अपने धर ले जाते थे, तब उससे झरे अन्न कणों को जो खेत में पडे रह जाते थे, उन्हें बीनकर एकत्र कर लेते थे और उसी से जीवन निर्वाह करते थे। अन्न का सीधा सम्बन्ध मन से है। कहा भी गया है कि जैसा खाये अन्न, वैसा हो जाये मन। यह सभी का दायित्व है कि त्यागपूर्वक इसका भोग करते हुए ही प्रयोग करें तथा इसे नष्ट न होने दें, क्योंकि इसके नष्ट हो जाने से किसान का श्रम और राष्ट्रीय सम्पदा दोनों नष्ट होते हैं, बल्कि कई मनुष्य भूखे रह जाते हैं।

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