अनमोल वचन

अनमोल वचन

शरीर के लिये आहार की आवश्यकता होती है, सात्विक आहार का मुख्य भाग अन्न होता है। हर प्रकार की प्रगति अन्न पर निर्भर करती है, इसलिए वेद में कहा गया है कि 'अन्नपते अन्नस्य नो देहान भीवस्थ सुतिमता। प्र प्र दातारम् तारिष ऊर्जा नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे। मंत्र का भावार्थ यह है कि सब अन्नों के स्वामी परमेश्वर हमें वह अन्न प्रदान करायें, जो व्याधि रहित हो, राजस अन्न दुख, शोक और रोग को देने वाले हैं। इसलिए हम उसी अन्न की प्रार्थना करते हैं, जो हमें व्याधियों से दूर रखे। जिन अन्नों के सेवन से हमारे भीतर के काम, क्रोध व लोभ के विकारों की समाप्ति की जा सकती हो और जो हमें बाह्य शत्रुओं पर भी विजय प्राप्त करा सकता हो। इन अन्नों को रोग नाशक तथा बल उत्पन्न करने वाला होने की कामना की गई है। जो अन्न का दान करता है, उसे प्रभु जीवन के पार लगा दें अर्थात मोक्ष की प्राप्ति करा दें। जो व्यक्ति दूसरों को खिलाकर बचे हुए को खाता है, वास्तव में वही अन्न खाया जाना कहा जाता है, परन्तु जो त्यागपूर्वक उपभोग न करके केवल अकेला ही सब कुछ खा जाता है, वह पापी है, उसे तो यह अन्न ही वस्तुत: खा लेता है।

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