अनमोल वचन

अनमोल वचन

विचारों में तो सभी आदर्शवादी होते हैं। योग्य-अयोग्य, सुकर्म- अकर्म और पाप-पुण्य की अनुभूति तो मूर्ख और पापी को भी होती है, किन्तु व्यवहारिक जीवन में हम उसे भूल जाते हैं। आचरण बहुधा उसके विपरीत होता है। धर्म क्या है, यह जानते-समझते भी उसमें प्रवृत्त नहीं होते और अधर्म को जानते हुए भी उससे निवृत नहीं होते। इसी कारण धर्म का ज्ञान होते हुए भी धर्म विरूद्ध आचरण करते हैं। इसके परिणाम क्या होंगे, इसे जानते हुए भी पाप की गठरी का बोझ बढाते जाते हैं, दुर्योधन ने यही बात भगवान श्रीकृष्ण से तब कही थी, जब वे युद्ध को टालने के उद्देश्य से शान्ति दूत बनकर उसके पास गये थे। दुर्योधन ने कहा था कि धर्म-अधर्म का विवेक सभी को रहता है। सभी उन बातों को जानते हैं। मात्र चर्चा करने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। यद्यपि दुर्योधन ने यह बात दूसरे भाव से कही थी, किन्तु यथार्थ यही है कि धर्म की मात्र चर्चा करने से कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है। यदि कोरी चर्चा करते हुए घूमे तो इसका कोई लाभ नहीं। यदि चाहें कि सभी धर्म के मार्ग पर चलें तो उसे क्रियान्वित करने के लिये शुभारम्भ अपने आप से करें और उस पर दृढतापूर्वक आरूढ रहें।

Share it
Share it
Share it
Top