अनमोल वचन

अनमोल वचन

'अहम् ब्रह्मास्मि' का अर्थ यह समझ लेना भूल होगी कि मैं भगवान हूं, इसका भाव यह है कि मैं स्वयं ब्रह्म अर्थात निर्माण, कर्ता, सृजन कर्ता, निर्माता हूं। इस परिपेक्ष्य में इसका अर्थ हुआ- मैं स्वयं अपना निर्माता हूं। शाब्दिक अर्थ के अतिरिक्त इस वाक्य का आध्यात्मिक अर्थ है- मैं ईश्वर का अंश हूं, उसी ईश्वर का अंश, जिसके सभी दूसरे भी अंश हैं अर्थात हम सब एक जैसे हैं। हममें किसी प्रकार का कोई भेद नहीं यह वाक्य हमें यह महसूस कराने के लिये भी है कि सृष्टि के जिस निर्माता ने बडे-बडे सागर, पर्वत, ग्रह, यह पूरा ब्रह्माण्ड बनाया, मैं भी उस अखंड शक्ति का स्रोत हूं। इसलिए मुझे भी अपने अन्दर की उसी ऊर्जा, उसी अंश को जागृत कर वैसा ही बनने का प्रयास करना चाहिए, तभी हमारे स्वयं की, समाज की, देश की, यहां तक कि संसार की नैतिक, भौतिक, आत्मिक उन्नति होगी। ईसा, मुहम्मद, बुद्ध, महावीर, नानक और दयानन्द सभी ने किसी न किसी रूप में यह बात कही। सभी ने अपने भीतर झांकने और स्वयं पर विश्वास रखने की बात कही। बुद्ध ने कहा था 'आपो दीपो भव' अर्थात अपने दीपक स्वयं बनो। खुद जलो, रोशनी करो तो अंधेरा दूर हो जायेगा, किन्तु खेद की बात है कि हमारे आधुनिक समाज में सह-सरोकार का भाव 'मैं' केवल मैं और केवल मेरा में तिरोहित होता जा रहा है। इसी कारण मनो में अशान्ति, आशंका और भय समाया हुआ है।

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