...और सब कुछ पलभर में खत्म हो गया..सुहाग को अर्थी देने वाली सिग्नल ऑपरेटर संध्या के हौसले को सलाम

...और सब कुछ पलभर में खत्म हो गया..सुहाग को अर्थी देने वाली सिग्नल ऑपरेटर संध्या के हौसले को सलाम


पलवल। ...और सब कुछ पलभर में खत्म हो गया। सूनी हो गई मांग। 24 घंटे पहले पंचतत्व में विलीन हुए एएन-32 के शहीद लेफ्टिनेंट कैप्टन आशीष तंवर (29) की वीरांगना पत्नी सिग्नल ऑपरेटर संध्या सोलंकी का सफर अभी बहुत लंबा है। साल-सवा साल पहले हाथों में सजी सुहाग की मेहंदी इतनी जल्दी मिट जाएगी, यह किसी ने कभी नहीं सोचा होगा। महज साढ़े 28 साल की उम्र में विधाता का यह सदमा संध्या सीने में जज्ब कर गई हैं।

दीघौट गांव में अंतिम विदाई के वक्त शुक्रवार को हर आंख रोई। अगर किसी की आंख से आंसू नहीं निकले तो वो हैं आशीष की पत्नी संध्या सोलंकी तंवर। सिर्फ इतना बोलीं- 'सैन्य परिवार में पली-बढ़ी हूं। सैनिक हूं। सैनिक कभी रोते नहीं। मुझे अपने जीवनसाथी की शहादत पर गर्व है। माना की जीवन का सफर अधूरा छोड़कर वो वीरगति को प्राप्त हो गए...लेकिन जाबांजों की जिंदगी में ऐसे पल आते-जाते रहते हैं।'

दीघौट में अपार जनसमूह के बीच संध्या ने अपने पति की अर्थी की अगुवाई की। पति की कैप और बैज के साथ तिरंगा अपने हाथों में थामा। यह देखकर सभी की सांसें थम गईं। ...और हर आंख रो पड़ी।

तिरंगे में लिपटा शहीद का चोला वायुसेना के जिस वाहन से पलवल होते हुए दीघौट ले जाया गया, संध्या उसी में सवार थीं। सलामी परेड और मातमी धुन ब्रिगेड की अगुवाई करने वाले एम सुनील कुमार और ग्रुप कमांडर जेसीएस चौहान के चेहरे गमगीन दिखे। तीन साल तक जोरहाट में आशीष के सहपाठी रहे सैन्य अधिकारी अनिल छोंकर ने कहा, जिंदादिल और हमेशा मुस्कराने वाला दोस्त चला गया।

'गधे का बेटा गधा और फौजी का बेटा फौजी बनता है'- आशीष की इस बात को यादकर उसके चाचा शिवनारायण गम में डूब जाते हैं। बेटे की शहादत पर पिता राधेलाल तंवर बोले, उसे चैलेंज पसंद था। वह बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छी सेलेरी के पैकेज को छोड़कर पायलट बना था।

दीघौट सरपंच जितेंद्र तंवर का कहना है, अब सिर्फ यादें बाकी हैं। आशीष की स्मृति में गांव में स्टेडियम का निर्माण कराया जाएगा। बामनीखेड़ा-हसनपुर सड़क का नाम शहीद आशीष तंवर मार्ग होगा। गांव के सरकारी स्कूल का नाम भी उसके नाम पर होगा।

उल्लेखनीय है कि वायुसेना का यह विमान तीन जून को लापता हो गया था। उसने जोरहाट से मेंचुक के लिए उड़ान भरी थी। संध्या सोलंकी जोरहाट में ही ड्यूटी पर थीं। 18 जून को पुष्टि हुई थी कि इस विमान में सवार सभी 13 लोग वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं।


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