हर बार ' नो मेन्स लैंड ' से भारत में नदियां पार करके मतदान करने आते हैं लोग

हर बार  नो मेन्स लैंड  से भारत में नदियां पार करके मतदान करने आते हैं लोग


- करीब 260 एकड़ रकबा वाले इस क्षेत्र का भारत के राजस्व विभाग में कोई रिकॉर्ड नहीं

- यहां के बाशिंदे फिरोजपुर जिले के वोटर हैं लेकिन गांव बुनियादी सुविधाओं से महरूम

फ़िरोज़पुर ( पंजाब ) )- ' नो मेन्स लैंड ' अर्थात दो देशों के बीच वाली भूमि, जिस पर किसी का अधिकार न हो, इस क्षेत्र से इस बार भी दर्जनों परिवार भारत के सामान्य लोक सभा चुनाव में मतदान के लिए नदी पार करके शामिल होंगे।

पाकिस्तान सीमा के साथ फ़िरोज़पुर संसदीय क्षेत्र के इस बेनाम गाँव में पिछले 55 वर्षों से रह रहे करीब 60 परिवार यूँ तो भारत का हिस्सा हैं, परन्तु करीब 260 एकड़ भूमि के इस क्षेत्र का राजस्व विभाग में कोई रिकॉर्ड नहीं है। अब भी ये भूमि सीमा पार पाकिस्तान के गाँव अहमदवाला का हिस्सा नज़र आ रही है।

दिलचस्प बात ये भी है कि पाकिस्तान के राजस्व रिकॉर्ड में ये भूमि अब उसका हिस्सा नहीं है। इस बेनाम गाँव में करीब 200 वोट तो हैं परन्तु नेता भी यहाँ वोट मांगने कभी -कभार ही आते रहे हैं। गाँव के लोगों ने वोटें डाल कर देश और राज्य की किस्मत बदलने में तो योगदान किया परन्तु उनकी किस्मत में अभी बदलाव नहीं नज़र आ रहा।

कहने को तो ज़िला फ़िरोज़पुर के सीमान्त गाँव कालूवाला व निहालेवाला के मध्य स्थापित भूमि का यह टुकड़ा समृद्ध पंजाब का हिस्सा है, परन्तु समृद्धि क्या होती है, इसका आभास गाँव में आकर ही होता है। फ़िरोज़पुर से करीब 18 किलोमीटर दूर पाकिस्तान की सीमा के करीब बने इन गांवों में जाने के लिए सड़कें तो है परन्तु टूटी -फूटी। इस बेनाम गाँव में जाने के लिए आज कल तो सेना द्वारा बनाया हुआ प्लाटून पुल है लेकिन यह प्रत्येक वर्ष छह माह के लिए बनाया जाता है, जो मई माह के अंत के सेना हटा लेगी।

इस बेनाम गाँव समेत दो अन्य गाँवों कालू वाला और निहालेवाला के क्षेत्र में जाने के लिए सिर्फ पानी में हाथ से चलने वाली बड़ी कश्ती होगी। बदकिस्मती की बात ये भी है कि इन गाँवों में जाने के लिए उपलब्ध एकमात्र बेड़ी टूट कर दरिया में डूब चुकी है और यहाँ के लोग अब चिंता में है कि वे कैसे दरिया के आर -पार जा सकेंगे।

यहां दुर्गम रास्तों से होते हुए पत्रकारों की टीम गाँव में पहुंची। तीनों गाँव का क्षेत्र तीन तरफ से सतलुज नदी से घिरा हुआ है और चौथी तरफ पाकिस्तान है, जहाँ पर तारबंदी है और बीएसफ़ तैनात है। गाँव में न तो कोई सड़क है, न स्कूल , न हस्पताल अथवा डिस्पेंसरी है। मृत्यु, जन्म, शादी सब बेड़ी पर ही आश्रित होता है और अगर नदी में बाढ़ आ जाये तो सब कुछ स्थगित हो जाता है। बच्चे भी स्कूल जाने के लिए बेड़ी का सहारा लेते हैं और नदी में पानी का उफान आने के दिनों में स्कूल जाने का कार्य बंद कर दिया जाता है।

अन्य मुश्किलों के साथ साथ बेनाम गाँव के किसानों की सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि जिस भूमि पर वे दशकों से खेती करते आ रहे हैं, न तो उसकी गिरदावरी उनके नाम है, न कभी फसल बर्बादी का मुआवजा उनको मिलता है और न ही वे फसल के लिए क़र्ज़ ले पाते है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि जिस भूमि पर वे खेती करते आ रहे हैं, भारत के रिकॉर्ड में वो भूमि है ही नहीं। यहाँ तक कि इस भूमि पर होने वाले लड़ाई- झगड़ों को भी पुलिस को किन्हीं अन्य स्थानों पर दिखाना पड़ता है और अन्य राजकीय कार्य भी इधर -उधर का स्थान दिखा कर किये जाते हैं। 260 एकड़ की ये भूमि पाकिस्तान की दिशा से भारत में प्रवेश करते सतलुज दरिया के साथ है। भूमि पर खेती करने वाले लोगों में गाँव कमाले वाला के सरपंच हरबंस सिंह , नम्बरदार बचन सिंह नम्बरदार की भी जमीन इसमें शामिल है।

पंजाब के राजस्व विभाग के अधिकारीयों अनुसार वर्ष 1962 में भारत द्वारा हुसैनीवाला में शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के समाधि स्थल को लेने के लिए पाकिस्तान सरकार के साथ समझौता हुआ था। समाधि स्थल के बदले भारत ने सीमा के ही करीब फाजिल्का के 12 गाँवों की भूमि पाकिस्तान को दी थी, जिसमें फाजिल्का में भारत से पाकिस्तान की तरफ से जाती ड्रेनों का बाँध क्षेत्र भी शामिल था। बदले में पाकिस्तान ने भारत को हुसैनीवाला शहीदी स्थल व साथ की भूमि का कुछ क्षेत्र दिया था। धीरे -धीरे चले इस भूमि तबादले मामले का काम तब बीच में अटक गया, जब 1971 में भारत -पाक युद्ध हो गया और भूमि तबादले की दस्तावेजी औपचारिक प्रक्रिया लटक गई। हालांकि भूमि तबादले की भौतिक प्रक्रिया मुकम्मल हो गई थी। ये 260 एकड़ भूमि उसी समझौते का हिस्सा था, जिसका न तो रिकॉर्ड पाकिस्तान ने दिया और न ही ये क्षेत्र राजस्व नक़्शे में शामिल हो सका। इस भूमि की स्थिति दस्तावेजों में भारत -पाकिस्तान के मध्य बनी ' नो मेन्स लैंड' की तरह ही बनी हुई है।

पूर्ववर्ती प्रकाश सिंह बादल सरकार में जब काश्तकारों को भूमि के मालिकाना हक़ देने का निर्णय हुआ तो तब भूमि की निशानदेही के दौरान इस 260 एकड़ का मामला उठा, क्योंकि इस भूमि का कोई रिकॉर्ड ही नहीं था। इसलिए इस भूमि का मामला सरकार की नज़र में आ गया। सतलुज नदी भारत में गाँव टिंडीवाला से प्रवेश करती है। इस बेनाम भूमि को लेकर सरकार के निर्देशों पर गाँव के पटवारियों ने रिपोर्ट तैयार करके सरकार को सौंप दी थी। यह रिपोर्ट चंडीगढ़ में सरकार की नज़रे-इनायत के लिए वर्षों से पड़ी धूल फांक रही है।

पंजाब राजस्व के अधिकारी इस भूमि की बात तो करते है परन्तु जिला उपायुक्त समेत अन्य अफसर भी अब चुनावों में व्यस्त हैं, इसलिए अभी इसके लिए कुछ भी कर पाने में अक्षम हैं। गाँव के लोग भी कई बार इस क्षेत्र से चुने जाते रहे लोक सभा सदस्य को अपनी समस्या बता चुके हैं परन्तु किसी ने भी उनके इस दर्द को संसद में नहीं रखा।

हालत ये बने है कि धीरे -धीरे लोगों ने अपने घर किन्हीं अन्य स्थानों पर बनाने शुरू कर दिये हैं। गाँव के नम्बरदार बचन सिंह बताते हैं कि अकाली दल व भाजपा के नेता तो चुनावों के आस पास आते रहे हैं परन्तु कांग्रेस के लोग तो वोट मांगने भी नहीं आये। केंद्र सरकार की योजनाएं भी यहाँ आकर ख़त्म हो जाती हैं। केंद्र की शौचालय योजना का तो यहाँ नामों -निशान तक नहीं है और न ही कोई इस बारे में जानता है। गाँव के लोगों ने बताया कि वे तो हर बार चुनाव में मतदान करने जाते हैं, हालांकि इसके लिए उन्हें कई अन्य मुश्किलों के साथ -साथ नदी भी पार करनी पड़ती है परन्तु वे वोट देने का अपना फ़र्ज़ नहीं भूलते। यह बात दीगर है कि जीतने के बाद जन प्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी भूल जाते हैं।


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