परना गांव में भगवान के साथ पूजे जाते हैं भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद

परना गांव में भगवान के साथ पूजे जाते हैं भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद


बेगूसराय। अगस्त का महीना आ गया। अब राजनीतिक दल, नेता, प्रशासन, जनप्रतिनिधि एवं कुछेक बुद्धिजीवी लोग अगस्त क्रांति एवं स्वतंत्रता दिवस के नाम पर शहीदों को याद करेंगे। उनकी प्रतिमा पर फूल माला चढ़ा कर कुछ देर भाषण देने बाद फिर एक साल के लिए भूल जाएंगे। लेकिन बिहार के बेगूसराय जिले में एक गांव ऐसा भी है जहां हर ग्रामीण प्रतिदिन, सुबह शाम भगवान के साथ ही शहीदों की भी पूजा अर्चना करते हैं। जी हां, बेगूसराय सदर प्रखंड में जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित परना गांव में सार्वजनिक जगह पर बने मंदिर में भोले शंकर, मां दुर्गा एवं हनुमान जी आदि के साथ शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे मां भारती के वीर सपूतों की पूजा अर्चना की जाती है। रघुपति राघव राजा राम से होती है सुबह और इसी से होती है यहां की रात।

यह सिलसिला लगातार 1991 से चल रहा है, जो कि एक मिसाल है देश भक्ति का। देश की आजादी में कुर्बानी देने वाले महापुरुषों की सालों भर पूजा-अर्चना कर परना गांव के लोग मिसाल कायम कर रहे हैं। इस गांव के लोग हर दिन, सुबह-शाम आजादी के दीवाने महापुरुषों की प्रतिमाओं की न सिर्फ पूजा-अर्चना कर रहे हैं, बल्कि उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प भी लेते हैं। सुबह से शाम पूजा में वैदिक मंत्रोच्चार के देशभक्ति तराने भी गूंजते हैं। यहां के 18 वर्ष का युवा हो या फिर 80 वर्ष के वृद्ध, सबों में देशभक्ति का एक अजब जूनून देखने को मिलता है। स्थानीय निवासी बबलू कुमार बताते हैं कि परना व चांदपुरा की सीमा पर अवस्थित इस पोखर के मुहार पर पहले मात्र एक शिवालय था।

1987 में यहां मां दुर्गा का मंदिर बनवा कर दुर्गा पूजा शुरू की गई हुई। 1990 में भगवानों की पूजा के साथ आजादी दिवाने महापुरुषों की भी पूजा का फैसला ग्रामीणों ने लिया। तत्कालीन मुखिया शिवराम महतो के नेतृत्व में ग्रामीणों ने सामूहिक चंदा कर 1991 में पोखर के मुहार पर ही भव्य शहीद स्मारक स्थल का निर्माण कराया तथा करीब ढ़ाई लाख रुपये की लागत से महापुरुषों की प्रतिमा स्थापित कर पूजा शुरू कर दिया गया।तब से आज तक करीब 27 वर्षों से यहां भगवान के साथ शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे मां भारती के दिवानों की पूजा लगातार जारी है। लेकिन इस ऐतिहासिक जगह पर ना तो जिला प्रशासन की नजर गई है और ना ही बड़े जन प्रतिनिधियों की। मुकेश विक्रम कहते हैं कि इससे सामाजिक समरसता कायम होती है तथा आने वाली पीढ़ी को देशभक्ति का संदेश भी मिलता है। ग्रामीणों ने अपनी धरती पर शहीदों का भव्य स्मारक स्थल का निर्माण करवा कर महापुरुषों की पूजा-अर्चना करने की यह अनूठी परंपरा काबिले तारीफ है। सुदूर क्षेत्र में रोज शहीदों की पूजा करना प्रेरणादायक कदम है।

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