रहस्य रोमांच: कब, कहां नहीं हैं जासूस

रहस्य रोमांच: कब, कहां नहीं हैं जासूस

भारत में इन दिनों सर्वत्र चर्चा में हैं जासूस। वैसे जासूसों की दुनियां रोमांचक होती है और सावधानी के पश्चात भी पकड़े जाने पर जान जाने का खतरा भी रहता है। ये जासूस भांति-भांति की भूमिका निभाते हैं। जासूस निजी और शासकीय भी होते हैं पर सभी को मिली जिम्मेदारी के अनुसार भूमिका निभाते अपनी जासूसी पहचान गुप्त रख कर्तव्य पूरा करना होता है।
ये आदि काल में भी थे पर अब तो एक से बढ़कर एक आधुनिक भेदिया संसाधनों से लैस हैं। जासूस कब, कहां नहीं रहे। समय के साथ-साथ ऐसे भेदियों की आवश्यकता व भूमिका अब बढ़ गई है।
बचपन में बच्चे छुपा-छिपी या छुपन-छुपाई (हाइड एंड सीक), आइस-पाइस (आई-स्पाई) दी-पहाड़, ऊंच-नीच, चोर सिपाही और विष-अमृत आदि खेलते हैं। वह बच्चों की भेदिया गतिविधियों को भांपने, (पता लगाने) का खेल होता है। विद्यालय में प्रश्नपत्र कहां छपा एवं उत्तर पुस्तिका कहां जांचने (मूल्यांकन कराने) गई है, इसका विद्यार्थी पता लगाते हैं, यह जासूसी का का गलत कदम विद्यार्थी को पथभ्रष्ट कर देता है।
सफल गुप्तचर हनुमान:- प्राचीन काल में जनसामान्य बनकर भेदिया अपना कर्तव्य पूरा करते थे। ऋग्वेद एवं वैदिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है जिसमें राष्ट्र की सुरक्षा के लिए लगभग सात हजार वर्ष पूर्व ऐसा वृहद प्रयोग करने का वर्णन है। रामायण में हनुमान ने भी गुप्तचर की सफल भूमिका की थी। हनुमान को रावण के गुप्तचरों ने पहचान कर पकड़ लिया था।
रामायण में रावण के तीन गुप्तचरों का भी प्रमुखता से उल्लेख हैं। रावण के गुप्तचर शार्दुल, शुक्र व शारण को राम के गुप्तचरों ने पकड़ लिया व दण्डित किया। इनकी पैठ राम की सेना तक थी। रामायण में ऐसी गुप्तचरी का विस्तृत वर्णन है। महागंरथ महाभारत में भी प्रतिवेदक, कापटिक, गुप्तचर सूचक, कर्णेजप आदि संबोधनों से इनका वर्णन किया गया है। चीन, मिश्र, बेबीलोन, असीरिया, रोम में गुप्तचरी व्यवस्था का विकास हुआ। इतिहास में सिकन्दर, हन्नीबाल, चंगेज खां, सम्राट चार्ल्स प्रथम, नेपोलियन, वाटरलू, अडोल्फ हिटलर द्वारा आदिकाल में गुप्तचर का उपयोग सफल किया गया। हिटलर के 45 हजार प्रशिक्षित भेदिये थे। इसके बल पर इन्होंने युद्ध में विजय पायी।
विश्व की प्रमुख गुप्तचर संस्थाएं:- वर्तमान में विश्व की प्रमुख गुप्तचर संस्थाओं में अमेरिका की सेन्ट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) रूस की के जी बी, चीन की ग्बानबो, ब्रिटेन की मिलेट्री इंटेलिजेंस एमआई 6, जापान की बोइको, तथा नुहोई, होनबू, भारत की रिसर्च एंड इनालिसिस विंग (रा़), फ्रांस की स्डेस, दक्षिण अफ्रीका की नेशनल इंटेलिजेंस कोआर्डिनेटिंग कमेटी, इजरायल की मोस्साद तथा पाकिस्तान की इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आई. एस.आई.) हैं। ये जासूसी संस्थाएं अपने देश के भीतर एवं बाहर भी जासूसी करती हैं।
बीते समय में काम आने वाले भेदिया यंत्र अब असामयिक हो गए हैं। अब तो करामाती यंत्र और आधुनिक हथियार व आश्चर्यजनक तकनीकों से सूचनाएं जुटाई जाती हैं। धरती से आकाश तक, आदमी से उपग्रह द्वारा हर पल जासूसी की जा रही है। सभी स्तर पर इनका वृहद संजाल फैला है। ये कम बोलते व अधिक देखते, सुनते, समझते व सूचनाएं एकत्र करते हैं। यही इनकी सफलता का राज है। भारत में आधुनिक भेदिया यंत्रों का सफल प्रयोग बड़े पैमाने पर गत दिनों स्टिंग आपरेशन में किया गया।
जासूसी नायाब उपन्यास, लेखक व पात्र:- अपने समय में बड़ों से लेकर बच्चों तक में जासूसी कथा, कहानियों एवं उपन्यासों की दीवानगी रही है। रचनाओं के जासूस पात्र बार-बार दुहराये जाते रहे। कथा की परिस्थितियां एवं चुनौतियां बदलती रही। सभी ने लोकप्रियता के झण्डे गाड़े और प्रसिद्धि पाई। ऐसी कृतियों के अनेक चर्चित लेखक रहे। इनकी रचनाएं भी ख्यात रही। इनके जासूस पात्र भी प्रसिद्ध रहे। अपने आप में बेजोड़ एक समय ऐसा भी आया जब जासूसी रचनाओं ने साहित्यिक रचनाओं से अधिक लोकप्रियता पाई।
सर्वत्र जासूसों की आवश्यकता बढ़ी:- यत्र-तत्र-सर्वत्र जासूस हैं। हर जासूस कुछ न कुछ तलाश रहा है। इनकी सतर्क, चालाक नजरें और तेज कान कुछ न कुछ बटोर रहे हैं। एकत्रित जानकारी कहीं मनुष्य के मस्तिष्क में जा रही है तो कहीं यंत्र बटोर रहा है। धरती से आसमान तक जासूसी की जा रही है। आकाश में उपग्रह तो हरपल खामोश बहुत कुछ बटोर रहा है और इस उपग्रह में एकत्र जानकारियों को धरती में कहीं न कहीं बंद कक्ष में, कंप्यूटर में कोई काम की चीज खंगाल रहा है।
दुकान, कार्यालय, सार्वजनिक स्थल, सड़क, गली, धार्मिक स्थल यहां तक आपके घर से कोई कई रूपों में अपने काम की जानकारी जुटा रहा है।
जासूस बहुत कुछ कर रहा है सब बड़ों की सफलता, विफलता में जासूस की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। सब अपने काम की जानकारी जुटा रहे हैं। हर कहीं अब जासूस की भूमिका बढ़ गई है।
-डॉ. सीतेश कुमार द्विवेदी

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