मां भुवनेश्वरी मंदिर की मिट्टी लगाने से गठिया बीमारी होती है छूमंतर

मां भुवनेश्वरी मंदिर की मिट्टी लगाने से गठिया बीमारी होती है छूमंतर


-सैकड़ों साल पुराने मंदिर की मिट्टी में सल्फर की ज्यादा मात्रा बीमारी से दिलाती है निजात


हमीरपुर। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में रविवार को मां भुवनेश्वरी मंदिर में गठिया बीमारी से निजात पाने के लिये हजारों लोगों ने डेरा डाल दिया है। सुबह से ही लोग इस मंदिर के सरोवर में स्नान कर अनुष्ठान भी कर रहे हैं क्योंकि मान्यता है कि यहां स्नान करने और मंदिर की मिट्टी लगाने से गठिया बीमारी दूर हो जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस स्थान की मिट्टी की जांच करने पर सल्फर की मात्रा ज्यादा पायी गयी। यही रासायनिक तत्व ही बीमारी से निजात दिलाता है।

हमीरपुर से 11 किमी दूर कालपी मार्ग पर स्थित झलोखर गांव में स्थित मां भुवनेश्वरी मंदिर की मिट्टी का चमत्कार बुन्देलखण्ड क्षेत्र में विख्यात है। इस मंदिर को भुइयांरानी के नाम से भी जाना जाता है। किसी जमाने में यह मंदिर रिहायशी बस्ती से काफी दूर था लेकिन समय बीतने के साथ-साथ अब यह मंदिर घनी बस्ती के क्षेत्र में आ गया है। इसी मंदिर से लगे सरोवर का इतिहास भी सैकड़ों साल पुराना है। यह सरोवर भीषण गर्मी में भी पानी से लबालब रहता है। यह मंदिर पूरी तरह से खुला है क्योंकि इसमें छत भी नहीं पड़ी है। पहले मिट्टी का चबूतरा था जिसकी सीढ़ियां जरूर पक्की करवायी गयी हैं लेकिन चबूतरे का ऊपरी हिस्सा कच्चा है। चबूतरे में ही नीम के पेड़ से लगी माता रानी की मूर्ति के दर्शन कर पान बताशा चढ़ाने की परम्परा है। बाद में भोजन के रूप में आटे की भौरिया बनाकर खाने की परम्परा है। रविवार को हमीरपुर के अलावा, फतेहपुर, कानपुर देहात, रायबरेली, जालौन, बांदा व मध्यप्रदेश के इलाकों से बड़ी संख्या में लोग मंदिर में माथा टेकने आये हैं। इनमें तमाम लोग गठिया रोग के पीड़ित हैं। मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुये गांव के लोगों ने इंतजाम किया है। मंदिर के पास ही मेला भी लगा है जो देर रात चलेगा।

जबलपुर की महिला ने पूरे परिवार के साथ टेका माथा

मध्यप्रदेश के जबलपुर की किरन सोनकर ने बताया कि कई साल पूर्व ट्रेन में सफर के दौरान पता चला था कि मां भुवनेश्वरी मंदिर में आकर यहां की मिट्टी लगाने से गठिया रोग ठीक हो जाता है। वह कई सालों से पैर के दर्द से परेशान थी जिसका हर जगह इलाज कराया मगर कोई राहत नहीं मिली। पिछले साल मंदिर आकर मिट्टी लगाई तो दर्द छूमंतर हो गया। इसी तरह से सुशील कुमार की पत्नी को भी बीमारी से राहत मिली है। वह पिछले पांच सालों से लगातार यहां आ रहे हैं। दिल्ली के विजय कुमार ने बताया कि उनका आठ सालों से मां भुवनेश्वरी मंदिर से नाता है। यहां आने पर बड़ा ही आराम मिलता है और मन को शांति मिलती है।

नीम के पेड़ से निकली थीं मां भुवनेश्वरी

राष्ट्रपति पदक से सम्मानित रिटायर्ड शिक्षक सरजू प्रसाद त्रिपाठी व मनोज प्रजापति ने बताया कि इस मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। मां की मूर्ति नीम के पेड़ से निकली थी। उस समय झलोखर व आसपास के तमाम गांवों से लोगों की भीड़ मां के दर्शन के लिये उमड़ी थी। मूर्ति के दर्शन करने के साथ लोगों ने यहां की मिट्टी से तिलक भी लगाना शुरू किया था। माथे पर तिलक लगाने वालों को बहुत आराम मिला। यहीं से मां भुवनेश्वरी (भुइयारानी का चमत्कार शुरू हो गया था जो सैकड़ों सालों से लगातार अभी भी जारी है।

स्नान करने के बाद लगानी होती है मिट्टी

गठिया रोग से पीड़ित लोगों को पहले मंदिर के पास बने सरोवर में स्नान करना पड़ता है और फिर मंदिर के पीछे नीम के पेड़ के नीचे की मिट्टी लगाकर लोग गठिया रोग से छुटकारा पाते हैं। मान्यता है कि ये अनुष्ठान बिना खाये पीये ही करना होता है। बाद में मंदिर के सामने गोबर के कंडे (ओपले) में आटे की भौरियां बनाकर खाया जाता है। भौरिया घी और गुड़ के साथ ही खाने का रिवाज है।

छत विहीन मंदिर में होते हैं चमत्कार

झलोखर गांव के सतेन्द्र अग्रवाल ने बताया कि मां भुवनेश्वरी का मंदिर पूरी तरह से छत विहीन है। कई बार गांव के लोगों ने मंदिर में छत डलवाने की कोशिश की लेकिन छत नहीं रुकी। मंदिर के पुजारी श्यामबाबू प्रजापति ने बताया कि मंदिर में छत डालने के लिये अगल-बगल दीवारें खड़ी की गईं मगर छत डालने से पहले ही दीवारें अचानक ढह गईं। बाहर से भी तमाम कारीगरों को इस काम के लिये बुलवाया गया लेकिन मंदिर में छत डालने में कारीगर फेल हो गये। सतेन्द्र अग्रवाल व अभिषेक त्रिपाठी ने बताया कि बुजुर्गों से सुना गया है कि इस स्थान पर राजा हम्मीरदेव के सैनिक भटकते हुये आये थे और पीठ दर्द से परेशान होकर यहीं पर लेट गये थे। मिट्टी के स्पर्श से सैनिकों को आराम मिला। माता रानी ने स्वप्न देकर उन्हें बताया कि यहां मेरा स्थान है। वह सैनिक गौर ठाकुर थे जिनका परिवार आज भी झलोखर में बसा है।

मंदिर के पास कुएं में शख्स ने लगाई थी छलांग

झलोखर गांव के रिटायर्ड शिक्षक सरजू प्रसाद त्रिपाठी समेत कई बुजुर्गों ने बताया कि मंदिर के पास एक प्राचीन कुआं था। एक व्यक्ति गठिया रोग से परेशान होकर यहां आया और वह कुएं में कूद गया। जब उसे कुएं से बाहर निकाला गया तो वह अपने पैरों पर चलने लगा था। गठिया रोग छूमंतर होने पर वह मां के मंदिर में खूब रोया था। वह कई दिनों तक मंदिर में रहा और गोबर के ओपले जलाकर रोटियां (भौरिया) बनाकर प्रसाद ग्रहण किया था। मंदिर के पुजारी ने बताया कि मध्यप्रदेश और रायबरेली सहित कई महानगरों से लोग वाहनों से वह लोग यहां आये जो अपने पांव चल भी नहीं पाते थे लेकिन जैसे ही यहां की मिट्टी लगाई तो वह अपने पांव चलने लगे थे।

कुम्हार जाति के लोग ही मंदिर के होते हैं पुजारी

गांव के बुजुर्गों ने बताया कि मां भुवनेश्वरी (भुइयारानी) के मंदिर की महिला बड़ी ही निराली है। यहां देश के कोने-कोने से लोग माता रानी के दर्शन करने आते हैं। सर्वाधिक गठिया व बात रोग के मरीजों की भीड़ रविवार के दिन उमड़ती है जिन्हें मंदिर की मिट्टी लगाने से निजात मिल जाती है। ऐसा मंदिर में लिखी पंक्तियों में भी उल्लेख है। यहां स्थित प्रेमसागर तालाब में कमरी खुदान का विशेष महत्व है। मंदिर का चढ़ावा लेने वाले कुम्हार जाति के ही पुजारी हैं जिन्हें बारी-बारी चढ़ावा मिलने का मौका मिलता है। किसी-किसी परिवार को सालों बाद मंदिर का चढ़ावा मिलने का नम्बर आता है। मंदिर के पुजारी श्याम बाबू प्रजापति ने बताया कि आषाढ़ मास के रविवार को माता के दर्शन का विशेष महत्व है।

मंदिर की मिट्टी के चमत्कार से वैज्ञानिक भी हैरान

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि माता रानी के स्थान के ठीक पीछे नीम का पेड़ है जहां की मिट्टी अद्भुत है। यही मिट्टी गठिया रोग के लिये रामबाण है। इस मिट्टी की वैज्ञानिक जांच भी कर चुके हैं लेकिन वह किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचे। हमीरपुर के कृषि एवं मृदा वैज्ञानिक डा. एसपी सोनकर ने रविवार को बताया कि यह स्थान बड़ा ही चमत्कारी है। मिट्टी से बीमारी के छूमंतर होने के मामले देखे गये हैं। उन्होंने बताया कि इस स्थान की मिट्टी की जांच की गयी है तो इसमें सल्फर की मात्रा ज्यादा पायी गयी। ये तत्व ही बीमारी से निजात दिलाता है।


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