रहस्य कथा: प्यासी हड्डी

रहस्य कथा: प्यासी हड्डी

तब मुझे मुंबई गये दो साल हो गये थे। उम्र यही कोई 22 साल के करीब रही होगी। खास पढ़ा लिखा नहीं था। अच्छी नौकरी क्या मिलती। एक क्लीनिक पर काम करने लगा। शुरू में पर्ची काटने पर लगाया गया लेकिन काम के प्रति निष्ठा व लगन देखकर कुछ माह बाद ही डॉक्टर रस्तोगी ने मुझे दवा देने व मरहम पट्टी करने के लिए प्रयोग करना आरंभ कर दिया।

धीरे-धीरे मैं कार्य में दक्ष सा हो गया। यहां तक कि इंजेक्शन भी आसानी से लगा लेता। सुबह जल्दी निकलना और देर रात लौटना, यही दिनचर्या बन गयी। खाना-पीना अक्सर ढाबों में चलता। सोने को चाचा के घर की छत व बरामदा बहुत थे। डॉक्टर साहब काम के हिसाब से ठीक पैसे दे देते थे। खाने-पहनने के बाद जो थोड़ा बहुत बच जाता, चाचा के हाथ में रख देता जिसे वे गांव गढ़वाल भेज देते।

कभी कभार फिल्म देखने के सिवाय कोई व्यसन नहीं पाला। अविवाहित था इसलिए कोई खास जिम्मेदारी भी नहीं थी हालांकि घर से आये पत्रों से पता चलता कि मेरी शादी की बात चलायी जा रही है। पत्रों में हिदायत भी होती कि खूब कमाऊं।

क्लीनिक पर अधिक भीड़-भाड़ हो न हो मैं देर रात से ही घर लौटता। डॉक्टरी सीखने की धुन इस कदर थी कि डॉक्टर साहब के जाने के बाद उनकी किताबें उलटता पलटता और दवाओं-इंजेक्शनों आदि के बारे में अधिक जानकारी हासिल करता। दिन में घाटकोपर की वह सड़क अधिक व्यस्त होती थी परन्तु देर रात जब मैं पैदल लौटता तब अधिकतर सुनसान, कभी कभार कोई बस, टैक्सी व पैदल नजर आ जाते। चोर, उचक्कों, गुंडों आदि का भय न के बराबर था जिससे लौटते वक्त अकेलेपन के सिवाय कोई परेशानी न होती।

वर्षों गुजरने के बाद भी 13 अप्रैल की वह रात मुझे अच्छी तरह याद है। मैं क्लीनिक बंद कर सड़क पर निकला तो सन्नाटा छाया हुआ था। शायद साढ़े बारह एक का वक्त रहा हो। मैं दवाओं इंजेक्शनों आदि के बारे में सोचता हुए अपनी धुन में चला आ रहा था कि अचानक मेरी नजर एक सुन्दर युवती पर पड़ी जो किनारे बने चबूतरे पर शांत बैठी थी।

उसने नजर उठाकर मेरी ओर देखा और मुस्कुरा उठी। युवती की इस हरकत से मेरा हौंसला बढ़ा और मैं दवाओं व इंजेक्शनों से ध्यान हटाकर अपनी जवानी व युवती के हुस्न के बारे में सोचकर आगे बढऩे लगा। इधर-उधर देखा, कोई नजर नहीं आया।

उस सुनसान रात में अकेली सुन्दर युवती को देख रोमांचित होकर मैं सुध-बुध सी खो बैठा परन्तु यह क्या। युवती ने जैसे मेरे कदम अपनी ओर बढ़ते देखे, वह झटके साथ मुस्कराते हुए चबूतरे के ऊपर खड़ी हो गयी। मैंने जैसे ही बढऩे का पांव चबूतरे पर रखा, वह हंसते हुए नीचे उतर गयी। मैं नीचे उतरा तो वह पुन: चबूतरे पर खड़ी हो गयी। सुनसान रात में वह खेल न जाने कितनी देर चला पर मैं कई कोशिश करने के बाद भी 'युवती' को 'छू' तक न सका। इतना रोमांचित जरूर हो गया कि मेरे सब्र का बांध टूटने लगा।

कुछ सोचकर मैं तेजी से उसकी ओर बढ़ा तो वह चबूतरे के एक किनारे पर खड़ी हो गयी। मैंने उसका पीछा किया तो उसने चबूतरे के चारों और घूमकर न जाने कितने चक्कर कटा दिए मगर हाथ न लगी। थक-हार कर मैं चबूतरे के एक सिरे पर बैठा, तो वह खिलखिला कर मेरा मजाक सा उड़ाने लगी। लड़कियां इस कदर भी तड़पाती हैं, ऐसा कभी सोचने का मौका तक नहीं मिला।

कुछ देर इस आशा से सिर नीचे किये बैठा रहा कि मुझे परेशान सा देखकर 'वह' खुद ही पास आकर गले लग जायेगी। काफी वक्त गुजर जाने के बाद भी जब युवती पास न आयी, तब मैंने सिर उठाकर देखा तो मारे भय के मेरा बुरा हाल हो गया। पूरा बदन थर थर कांपने लगा, ओंठ सूख गये क्योंकि उस सुन्दर युवती की लम्बाई एकाएक कई मीटर बढ़ गई थी।

युवती कौन है, यह समझते देर न लगी। ईश्वर का शुक्र है कि भय के कारण एकदम बेहोश भी नहीं हुआ। इधर उधर देखा, कोई नहीं था। युवती पूर्णत: नग्न थी। लम्बाई लगातार बढ़ रही थी। जब उसने हमला न किया तो 'हनुमान जी' का मन ही मन स्मरण कर धीरे से पीछे हटा और तेजी से नाक की सीध में दौड़ पड़ा। काफी दूर जाने के बाद पीछे मुड़कर देखा तो जान में जान आयी। वह पीछा नहीं कर रही थी।

ठीक दूसरे दिन क्लीनिक से जल्दी आकर छत पर सो गया। थका होने के कारण जल्दी ही गहरी नींद आ गयी। अचानक आंख खुली तो देखा एक युवती धीरे-धीरे मेरा सिर सहला रही थी। इससे पहले कि डर के मारे में चीखता-चिल्लाता, उसने मेरे मुंह पर हाथ रखकर आंख दबायी और कान में बोली-

मैं खुद अपनी मर्जी से तुम्हारे पास आयी हूं। घबराओ नहीं।

पर कौन हो, पहले मैंने कभी तुम्हें नहीं देखा मैंने डरते डरते पिछली रात का ध्यान आते ही पूछा।

यहीं पड़ोस में रहती हूं रेवाधर, उसने मेरा नाम लेते हुए कहा, तुम कैसे डरपोक मर्द हो, इस जवानी में औरत पर मरने की बजाय उसने डरने लगे। उसकी बात सुनकर मेरी जान में जान आयी और मैं उत्तेजित हो उठा।

वह स्वयं ही पलंग पर लेट गयी। उसने ऐसी हरकतें की कि मेरी आग बुरी तरह भड़क गयी और मैंने उसे कसकर छाती से लगा लिया। चंद क्षण में वह सब हो गया जिसके लिए वह मेरे पास आयी थी। उसके चेहरे पर मैंने अजीब प्रसन्नता देखी और उसका मुंह चूमा तो उसने मेरी छाती पर सिर टिका लिया।

कल फिर आओगी न मेरी जान। मैंने उसकी लटों से खेलते हुए पूछा तो उसने मेरी नाक से नाक मिलायी और धीरे से बुदबुदायी।

हां, लेकिन एक शर्त पर

मुझे हर शर्त मंजूर है, एक कामांध की तरह मैंने हामी भरी।

तुम बातचीत की बजाय प्यार पर अधिक ध्यान दोगे।

ठीक है जानेमन। मुझे तो आम खाने से मतलब है।

समझदार हो रेवाधर। कहकर उसने मेरा गाल चूमा और लिपट गयी। उसकी इस अदा से मुझे तेज सा करंट लगा और मैं प्यार का खेल पुन: खेलने लगा। जब अलग-अलग हुए तो मैं थककर चूर हो चुका था। मुझे कब नींद ने दबोचा, वह कब गयी पता ही न चला। आंख खुली तो सु्रबह हो चुकी थी। सब कुछ याद आने पर मैं किसी अपराध बोध का शिकार भी नहीं हुआ,

छत के लिए सीढिय़ां एक ओर से थी। आस पास के घरों के बहुत कम लोग छतों पर सोते थे जिससे चाचा-चाची व अन्य को पता न लग पाता कि छत में कौन आ जा रहा है। जवानी की आग में जलते हुए इतना विवेक कहां होता कि युवती से पूछूं कि वह इतनी रात अकेले कैसे आ गयी। नाम तक नहीं पूछा। सोचा धीरे-धीरे हर गुत्थी सुलझ जायेगी। युवती हर रोज तय समय पर आनी शुरू हो गयी। दीन-दुनियां से बेखबर थे हम।

इस बीच गांव (गढ़वाल) से मेरी 'सगाई' होने के संबंध में पत्र आ गया। विवाह चार माह बाद था जिसके कारण चाचा की चिंता बढ़ गयी। कई डॉक्टर बदले पर कोई रोग न पकड़ पाया जितनी अधिक दवा शुरू की, स्थिति उतनी और खराब हुई। कमजोरी के कारण काम पर कम ही जा पाता। डॉक्टर साहब भले इंसान थे। उन्होंने भी भरपूर मदद की, परन्त सब बेकार। सच्चाई उगलकर अपनी पोल खोलने का मुझमें नैतिक साहस बचा नहीं था जबकि शीशे में शक्ल देखते ही मैं रो पड़ता। चाचा चाचीजी यह सोचकर अलग परेशान कि गांव वाले सोचेंगे कि खाना नहीं दिया होगा इसलिए रेवाधर की यह हालत हुई।

एक दिन चाची घर पर नहीं थी। छोटे भाई बहिन खेलकूद में खोये थे। चाचाजी ने मुझे कुरेदना शुरू कर दिया।

रेवाधर, तेरे गिरते स्वास्थ्य से लगता है बहुत जल्द सब कुछ खत्म होने वाला है। मैं तो कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं रह जाऊंगा। जिस तेजी से तेरी हालत बिगड़ रही है तू कितना जिंदा रह सकता है खुद ही सोच? गांव में भाई साहब ने तेरी सगाई कर दी है विवाह का दिन भी तय हो चुका है। मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है, बेटे। अगर ऐसी वैसी कोई बात है तो बता दें हालांकि तुझ पर मुझे पूरा विश्वास है। चाचाजी सब एक सांस में कह गये।

उनकी चिंता मुझे गहराई तक छू गयी कि मैं फफक फफक कर रो पड़ा और चाचाजी को चबूतरे वाली लड़की से लेकर इस युवती तक की सारी बात बता दी। आश्चर्य से वह मेरा मुंह ताकते रहे, मैं काफी देर तक सिरे छुपाये सिसकता रहा।

गलती इतनी बड़ी थी कि चाचा मुझे उसी वक्त पीट पीटकर घर से बाहर भी निकाल सकते थे क्योंकि मैंने उनके विश्वास को छला था। आशंका के विपरीत चाचाजी सिर थामे चुपचाप न जाने क्या सोचते रहे, धीरे से उठे, मुझे बैठने रहने का इशारा किया और घर से बाहर निकल गये। अब घंटे भर बाद लौटे तो उनके साथ जान-पहचान के एक पंडित जी थे।

आते ही पंडित जी ने ध्यान से मुझे देखा, कोई पूछताछ नहीं की और काले रंग की सूती धागे की एक पूरी रील मुझे थमा दी और समझाया कि इसका सिरा 'लड़की' के हाथ पर बांध कर रील खुली छोड़ दूं। हिदायत दी कि धागे के बारे में उसे कुछ पता न चले अन्यथा बदनामी व पुलिस केस का डर है।

रात को मैंने पंडितजी का आज्ञा का पालन कर धागे का एक सिरे हल्के से युवती के हाथ में बांध दिया। फिर रोज की तरह उसे दो बार भरपूर प्यार किया और नींद में खो गया। वह कब गयी। इसका पता कभी न चलता, सुबह जब मुझे चाचा ने जगाया तो रात थोड़ा बाकी थी। उनके साथ पंडितजी भी थे। उन्होंने मुझे भभूत का टीका लगाया और थोड़ा रूककर चले गये। मेरी समझ में कुछ न आया।

चाचाजी बीड़ी फूंकते हुए पास बैठ गये। कुछ खामोशी के बाद उन्होंने ही चुप्पी तोड़ी 'रेवाधर। अब तेजी से स्वस्थ होओ'। हम उस लड़की के मां-बाप से कह आये हैं कि उस पर लगाम रखें अन्यथा हमसे बुरा कोई न होगा। उस पर बीमारी होने का भी पता लगा। हां, आज रात आये तो बता देना।

शर्म से पहले ही बुरा हाल था। मैंने चाचा की हां में हां मिलायी और कुछ न पूछा। चाचा ने लगभग मुझे माफ कर दिया था। यह कम बात नहीं थी। लड़की रात को नहीं आयी यह बात मैंने चाचाजी को बता दी हालांकि रात भर मैं सो न सका और लड़की के लिए बेचैन रहा।

दिन में अड़ोस-पड़ोस में उसकी शक्ल खोजने की काफी कोशिश की पर सफलता न मिली। सोचा मां-बाप ने कहीं दूर भेज दिया होगा।

इसके बाद एक माह में ही मेरे स्वास्थ्य में चमत्कारी परिवर्तन आया। लड़की के बारे में जानने को काफी बेचैन रहा परंतु शर्म के कारण चाचा से कुछ न पूछ सका। चाचा स्वयं कुछ बता नहीं रहे थे।

दो माह बीतते-बीतते मैं पहले जैसा हो गया। इतवार था। संयोग से घर पर मैं, चाचाजी व पंडितजी थे। दोनों जब तब मेरी ओर देखकर मुस्कारा जाते। इससे पहले कि मैं साहस बटोरकर कुछ पूछता, स्वयं ही शुरू हो गयेेÓपंडितजी!

लगता है रेवाधर उस लड़की को भुला नहीं पा रहा है। चाचा ने पंडितजी की ओर देखकर कहा। नहीं चाचाजी। मैंने सकुचाते हुए कहा, ऐसी बात नहीं है। चाचाजी हंसते हुए बोले, अबे उल्लू, ऐसा तो जवानी में सबके साथ होता रहा है। अब मैं तुझे जो कुछ बताऊंगा, मुझे पता है उसका तुझ पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

मेरे चुप होते ही चाचाजी ने उस लड़की के बारे में मुस्कराते हुए जो रहस्योद्घाटन किया, पहले ही बता दिया होता तो शायद डर के मारे मेरे प्राण पखेरू तभी उड़ चुके होते। इस बार मैं कांप कर रह गया, होंठ सूख से गये। जिसे लड़की समझकर मैंने कई प्यार किया, वह किसी मृत नवयुवती की आत्मा या भूत था।

मंत्रयुक्त धागे को खोजते हुए चाचाजी को शमशान में एक हड्डी पर बंधा मिला जिसका पंडितजी की सलाह पर चाचाजी ने विधिवत अंतिम संस्कार कर दिया जिससे युवती का रात को आना रूका और मैं असमय ही मौत के मुंह में जाने से बच गया।

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