चिंतन: भय का भूत और भगवान

चिंतन: भय का भूत और भगवान

भय जब किन्हीं भी कारणों से अपने पांव मन-मस्तिष्क पर पसारने-बढ़ाने लगता है तो इंसान को मानसिक रूप से बिलकुल पंगु कर देता है जिसके परिणामस्वरूप अपने आप से ही डरा हुआ इंसान भयावह हो उठता है-जिससे निजात पाने के लिए उसे पूर्ण रूपेण मानसिक शांति की जरूरत होती है और 'यही जरूरत' जन्म देती है 'भगवान' को।

भय से भक्त और भक्त से भगवान बनें-यही परम सत्य है। केवल श्रद्धा से भगवान को माथा नवाने वालों की संख्या 'न' के बराबर ही है। ऊपर से चाहे वे कितनी आस्तिक भरी भावनाओं की डीगें हांकें पर अंतरात्मा में तो सदा भय बसा हुआ होता ही है। 'फलां-फलां' भगवान को पूजने से किसी समय जब दु:खों से निजात मिलती है तो तब 'उसी भगवान' को आस्था का केंद्र मान कुल देवता की संज्ञा देकर घर में विराजित कर दिया जाता है।

उपयुक्त बातें जब आस-पास के लोगों और जन-साधारण तक पहुंचती हैं तब वे भी इसको 'चमत्कार' की संज्ञा देकर 'उन्हीं' भगवान को अपने कष्ट निवारण के लिए पूजने लग जाते हैं, 'अंधी भीड़ के साथ शामिल होकर'। यही परंपरा निरंतर गतिमान रहते हुए भगवान की आस्था पर अपनी गहरी पैठ बना लेती है। इससे तो यही सिद्ध होता है कि भगवान का अवतरण भी भय रूपी बीज से ही होता है और उस बीज को सींचने पालने वाले भक्त ही भगवान के असल जन्मदाता हैं।

यह बात सर्वविदित है कि एक अलौकिक शक्ति इस सारी सृष्टि और जो कुछ भी दृश्य रूपेण है- का संचालन करती है जो पूर्ण रूप से है बिलकुल 'निराकार'। उसी आदि शक्ति को हमारे मुनि-ऋषियों ने 'ब्रह्म' की संज्ञा प्रदान की जो सर्वजगत का निर्माण करते हैं।

जब-जब धरती पर घोर संकट आया, तब-तब अनेकानेक महापुरूषों ने अपनी अद्भुत सूझबूझ, चतुरता और पराक्रम का प्रदर्शन कर उन संकटों से हमें मुक्त कराया। राम, कृष्ण, बुद्ध और गांधी इसी बात के साक्षात मूर्त स्वरूप हैं। राम ने मर्यादा का पाठ सिखाया तो वहीं कृष्ण ने राज की नीति से हमें अवगत कराया। बुद्ध ने संसार की असारता दुनियां को समझाई तो महात्मा गांधी ने 'म्लेच्छों' के चंगुल से देश को मुक्त कराया।

समय के महासमुद्र में जिन जिन महापुरूषों की गाथाएं जितनी पुरानी होती गईं, उतना ही उन पर लिखा गया-पूजा गया और कालांतर में मंदिर बने। मंदिरों के निर्माण के साथ ही पुजारी-पंडों की भी पहचान बन पाई। ये पुजारी एकमात्र दिखावा और धोखा ही देते हैं यजमान को। कष्टों में घिरा आदमी पहले ही भयभीत होता है, फिर भगवान के प्रकोप का डर। बेचारा दु:खों से छुटकारा पाने के लिए इन धोखेबाजों के चंगुल में फंस-सा ही जाता है जिसका फायदा भगवान के ठेकेदार बने ये पण्डित-पुजारी बड़े मजे से उठाते नजर आते हैं सदा।

हद तो वहां हो जाती है जहां भगवान के चमत्कारों की मनगढ़ंत कहानियां बना भक्तों को कभी रिझाया तो कभी डराया जाता है। सभी जानते हैं कि एक झूठ को भी यदि सौ बार सुना सुनाया जाए या कहा जाए तो वह भी झूठी सत्यता का नकाब ओढ़ ही लेता है। धर्म के नाम पर 'बस' यही तो किया करते हैं सभी 'धर्म की दुकान' चलाने वाले।

ज्ञात हो कि पुराने जमाने में जिन रोगों को असाध्य माना जाता था तथा भगवान का प्रकोप बोलकर मरीज को 'उसी के हालात' पर छोड़ दिया जाता था मरने के लिए, अब समकालीन परिवेश में विज्ञान की प्रगति ने यह साबित कर दिया है कि रोग केवल रोग ही है जो केवल चिकित्सा से ही दूर हो सकते हैं।

भगवान तो एक मात्र भला ही करते हैं। फिर वे अपने भक्तों पर या अन्य पर भी तिल बराबर भी कष्ट देने की न सोच सकते हैं और न ही कभी देते हैं पर बड़े अफसोस की बात है कि पढ़ी लिखी जनता भी कभी सोचने-विचारने पर मजबूर नहीं होती। जन्म भर पाखण्डियों के मकडज़ाल में फंसे रहना पसंद करती है। अपनी आत्मा की पुकार न सुनकर सदा केवल दिल से ही काम लेती है-दिमाग तक को परे रख कर।

तब ऐसी विषम परिस्थितियों में जैसा कि भक्त सोचते हैं, वैसे ही भगवान प्रकट हो भी जाएं तो वे भी बेचारे अपने भक्तों को ऐसे हालातों में देख उनकी बुद्धिमता पर केवल हंसते ही हैं। इनके अपने ही पाले हुए झूठे कष्ठों और रोगों का समाधान उनके भी वश में नहीं होता।

'भला' करने वाला ही होता है भगवान। जिसने जितना ज्यादा जिसका भला किया, उसके लिए वही साक्षात भगवान स्वरूप है। उदाहरणस्वरूप फलाना-फलाना व्यक्ति मेरा एक हाथ समान है, जैसी बात कई लोगों से सुनने मिलती है।

इस बात का मतलब पूरा साफ है कि उस व्यक्ति ने उक्त कथन कहने वाले पर भारी कृपा की होगी और वर्तमान में भी करता आ रहा है। तभी तो वह उसे अपने हाथ बताते हुए उसे भगवान के समकक्ष बना देता है। भगवान तो है गरीब नवाज में, दीन-दुखियों की सेवा में और 'भूखे की रोटी' में ही है, और कहीं नहीं।

यहां एक बात गौरतलब है कि भगवान का भय न हो तो संसार का हर प्राणी अपनी-अपनी मर्जी से अनैतिक काम करने लग जाए। कुछ गलत करने के पहले ऊपर जाकर भगवान को भी तो जवाब देना है' जैसी बातें व विचार ही समाज को अनैतिक कार्य करने से बचाते हैं।

स्पष्ट शब्दों में कहना चाहूंगा कि भय रूपी भूत सदा लोगों के दिल में बसा रहे, जिसके कारण भगवान से डर कर रहें तो वे बुरे कामों को करने से सदा बचे रहेंगे। इसी में उनका और सारे संसार का कल्याण निहित है।

- आदित्य कानोडिय़ा

[रॉयल बुलेटिन अब आपके मोबाइल पर भी उपलब्ध, ROYALBULLETIN पर क्लिक करें और डाउनलोड करे मोबाइल एप]

Share it
Top