रहस्य रोमांच: भारत में ममी का बसेरा बौद्ध लामा का शरीर

रहस्य रोमांच: भारत में ममी का बसेरा बौद्ध लामा का शरीर

जहां भी 'ममी' की चर्चा होती है तो सहसा मिश्र देश के पिरामिडों में रखें राजा और रानियों के निर्जीव शरीर 'ममी' की याद आ जाती है। संसार के प्राचीन आचार्यों में पिरामिड तथा ममी का जिक्र होता रहा है। यही आश्चर्य की बात है कि हजारों साल पहले मिश्र के निवासियों ने मृत शरीर को सुरक्षित रखने की जानकारी प्राप्त कर ली थी।

इस संदर्भ में यह आश्चर्य की बात है कि भारत के हिमालयी क्षेत्र में भी एक 'ममी' है। हिमाचल प्रदेश के स्पीति जिले के गुरून गांव में एक बौद्ध लामा की समाधि में स्थित ममी को देखा गया, जोकि बहुत सुरक्षित स्थिति में है। गुएन गांव के निवासियों को इस ममी का पता 1975 में आये एक जोरदार भूकंप के बाद लगा जबकि हिमनद(ग्लेशियर) के निकट स्तूप का हिस्सा टूट कर गिर पड़ा लेकिन योग समाधि में बैठे लामा का पूरा शरीर सुरक्षित रह गया।

गुएन गांव, जहां इस ममी का पता चला, वह तिब्बती (चीन) सीमा के पास है। जो तीन ओर हिममंडित पर्वत श्रृंखला से घिरा है जहां बाहरी लोगों का पहुंच पाना भी कठिन है। यह संयोग की बात है कि 1997 में भारत तिब्बत सीमा पुलिस के जवान उस गांव में पहुंच गए और उन्हें बौद्ध भिक्षु ममी का पता चल गया। तभी भारत के गुएन गांव की ममी की जानकारी देश-विदेश में चर्चा का विषय बन गई।

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लामा का देहदान:-

पर्वतीय प्रदेश हिमाचल में गुएन गांव स्थित 'ममी' की जानकारी मिलते ही विश्व संस्था 'युनेस्को' तथा पेंसिलवानिया विश्ववि़द्यालय के वैज्ञानिक प्रोफेसर विक्टर मेयर ने जांच कर इसे पांच सौ वर्ष पुरानी 'ममी' होना प्रमाणित किया था।

कुछ ही वर्षों बाद 'युनेस्को' तथा लंदन स्थित शोधकर्ता के सहयोग से इन पंक्तियों के लेखक ने एक खोज अभियान के द्वारा गुएन गांव की यात्र की और लामा सांगा तेंगजिन की ममी के दर्शन किए। वास्तव में ममी का प्रथम दर्शन एक रोमांचक अनुभव था।

लामा के निर्जीव शरीर(ममी) के अवलोकन के लिए मेरी टीम सीमा क्षेत्र में स्थित जिला मुख्यालय काजा पहुंची। वहां जिलाधिकारी से परिचय के बाद सरकारी पथप्रदर्शक मिल साथ ही ताबों गोंमा तक वाहन व्यवस्था(जीप) भी कर दी गई। वहां से ऊंची पर्वत श्रेणी के साथ स्पीति की तेज धारा की। दिशा में हम लोग हुल्तिा पहुंचे जहां आगे नदी किनारे ऊंचा-नीचा पथरीला रास्ता था। वहां कुलियां के साथ दो पहाड़ी खच्चरों पर सवार होकर हम लोग एक घंटें में ही वनस्पति विहीन घाटी में स्थित लगभग तीस चालीस घरों वाले गांव पहुंचे। सामने पत्थरों से निर्मित पुराना गोंपा(बौद्ध मंदिर) था जिसके निकट हिमनद से बहती शीतल धारा थी तथा दूसरी तरफ गुएन गांव के छोटे-छोटे मकान थे। वहां पहुंचते ही सीमा पुलिस के जवानों ने परिचय-पत्र देखा और हमारे साथ हो गए।

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दोपहर का समय था, फिर भी ठंड बढ़ गई थी वहां के पुलिस कक्ष में अल्पाहार लेकर हम हिमनद के छोर पर स्थित प्राचीन गोंपा में पहुंचे, वहां का दृश्य अदभुत था। पत्थर के आसन पर ध्यान मग्न मुद्रा में बैठे लामा का निर्जीव शरीर। ध्यान मुद्रा में गहरे पीले रंग की चादर में लिपटे इस बौद्ध भिक्षु के सिर या काले रंग के घुंघराले बाल भी शोभायमान थे। पूछने पर वहां के पुजारी ने ओम मणि पदम हों मंत्र का जाप करने के बाद ऐतिहासिक घटना का सटीक विवरण प्रस्तुत किया -

उनके अनुसार सैंकड़ों वर्ष पहले ऊंची पहाड़ी ढाल पर स्थित ग्लेशियर (हिमनद) पिघलना बंद कर के गांव की ओर खिसकने लगा। गा्रमवासी भयातुर हो गए यदि हिमशिलाओं का खिसकना बंद नहीं होगा तो बुर्क की शिलाओं की चपेट में आकर यह पूरा गांव नष्ट हो जाएगा। धार्मिकं आस्था वाले वहां के ग्रामवासी भयातुर हो सामूहिक प्रार्थना करने लगे। गांव के प्रधान लामा सांगा तेंजिग ने उनका नेतृत्व किया।

दो दिन बीते और तीसरा दिन आ गया। दैत्याकार शिलाखंड लिए ग्लेशियर गांव की ओर बढ़ता चला आ रहा था। अंत्तोगत्वा लामा ईश्वर उपासना में अडिग विश्वास कर खिसकते बर्फ के सामने बैठकर प्रतिज्ञा कर ली कि गांव की रक्षा के लिए ईश्वर प्रार्थना स्वीकार करेंगे अन्यथा मैं भी हिमशिला में दबकर भूमिगत हो जाऊंगा। ऐसी स्थिति में एक चमत्कार हुआ। बर्फ की चट्टान समाधि में बैठे लामा के ऊपर आई और रूक गई। बाद में बर्फ पिघलने पर ग्रामवासियों ने मृत लामा के शरीर को उठा करके गोंपा में रख करके पूजा अर्चना आरंभ कर दी।

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कहते हैं कि जब जब गांव के लोगों पर कोई विपदा आती है तो उस देवतुल्य ममी की पूजा अर्चना करते हैं और विपत्ति से छुटकारा पाते हैं। पिछली सदी संभवत 1990 के दशक में वैज्ञानिकों ने इस ममी की रासायनिक तथा भौतिक जांच की थी जिसके परिणाम चकित करने वाले हैं। उनके अनुसार सैंकड़ों वर्ष पहले मृत इस बौद्ध भिक्षु का शरीर काफी अच्छी हालत में है। कहीं पर सडऩे-गलने या टूट फूट का निशान नहीं है। साथ ही आश्चर्य की बात है कि सिर पर काले-घुंघराले बाल अभी मौजूद हैं जिससे लोगों को दैवी शक्ति का विश्वास हो जाता है।

बिना किसी बाहरी सुरक्षा कवच के उस गांव के बाहर गोंपा में रखी इस ममी के सुरक्षित रहने का मुख्य कारण वहां की शीतल जलवायु तथा बौद्ध भिक्षुओं की कठिन साधनलीन पद्धति है जिसके अनुसार अन्न जल त्याग कर वे तपस्या में लीन हो जाते हैं। ऐसी ममी जो साधनलीन लामा की है देख कर कोई भी व्यक्ति भाव विभोर हो चकित रह जाता है।

बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसी अद्भुत तथा महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय निधि की सुरक्षा के प्रति सरकार उदासीन बनी है। समय की पुकार है कि सांस्कृतिक महत्त्व की गौरव निधि को उपयुक्त सुरक्षा और प्रतिष्ठा प्रदान की जाए।

- राधाकांत भारती

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