रहस्य रोमांच: पाश्चात्य अंधविश्वास

रहस्य रोमांच: पाश्चात्य अंधविश्वास

किस्सा सन् 1633 का है। रोम की एक अदालत में प्रसिद्ध वैज्ञानिक गैलीलियो पर मुकदमा चला और इस में उसे दोषी पाया गया। गैलीलियो को सजा स्वरूप, मात्र प्रचलित अंधविश्वास के समर्थन के लिए हजारों बार सार्वजनिक रूप से विज्ञान के गलत होने की घोषणा करनी पड़ी कि पृथ्वी स्थिर है तथा सूर्य एवं चंद्रमा उसके चारों ओर घूमते हैं आदि। गैलीलियो को उसके ही घर में नजरबंद कर दिया गया था।

अन्धविश्वास में डूबे यूरोप की यह एक मात्र घटना नहीं है अपितु ऐसी अनेक घटनायें हैं जिससे मालूम होता है कि अति विकसित यूरोप भी अंधविश्वास के जहर से अछूता नहीं है।

15 वीं शताब्दी में ब्रिटेन का यह राजनियम था कि यदि कोई अंग्रेजी में बाइबिल पढ़ेगा तो उसकी समस्त जायदाद जब्त कर ली जायेगी और फिर कभी भी लौटायी नहीं जायेगी। यह कानून पास होने के एक ही साल में 39 आदमियों को अंग्रेजी भाषा में बाइबिल पढऩे के अपराध में न केवल अपनी जायदाद अपितु प्राण भी गंवाने पड़े।

16 वीं शताब्दी में फ्रांस की सरकार ने एक आदमी को इसलिए फांसी दे दी थी कि उसने मैले- कुचैले साधुओं के समक्ष घुटने टेक कर अभिवादन नहीं किया।

ब्रिटेन में यह कानून था कि जिसको न्यायाधीश दोषी ठहरायें और यदि वह अपने आपको निर्दोष माने तो उसे अग्नि परीक्षा द्वारा अपनी निर्दोषता साबित करनी पड़ती थी। यह अग्नि परीक्षा थी- कोर्सनेड अर्थात् अभिमंत्रित रोटी या पनीर का टुकड़ा खाना। एक औंस के करीब रोटी या पनीर का टुकड़ा लेकर मंत्र पढ़ा जाता था, सर्वशक्तिमान, यदि यह व्यक्ति अपराधी हो तो इसकी जीभ में ऐंठन पैदा हो जाय और शरीर पीला पड़ जाय एवं यह रोटी इसके गले में अटक जाय परन्तु यह यदि निर्दोष हो तो इसे यह आहार रूचिकर लगे। 'शाडविन अर्ल ऑफढे' ने 'एडवर्ड दी कनफेसर' के शासन काल में एक बार इस 'कोर्सनेड' की शरण ली। रोटी का टुकड़ा गले में अटक गया और उसे प्राणों से हाथ धोना पड़ा।

इसी प्रकार पानी और अण्डे के सहारे भी दोषी और निर्दोषी का निर्णय हुआ करता था। आग में तपा कर रक्त तप्त लोहा हाथ में उठाया जाता था। यदि हाथ जल जाये तो दोषी और न जले तो निर्दोष। इसी प्रकार अभियुक्त के हाथ-पैर बांध कर पानी में डाल दिया जाता था। यदि वह डूब जाये तो अपराधी मान लिया जाता था और उसे पानी में डूब मरने के लिए छोड़ दिया जाता था।

परन्तु इस प्रकार की परीक्षा में कभी कोई निर्दोष सिद्ध नहीं हुआ। सबने अपने प्राणों की आहुति दी। उस समय के पढ़े-लिखे लोग भी इन बातों में आस्था रखते थे।

सन् 1520 में यूरोप के एक विद्वान 'एन्ड्रीकेन्पी' ने एक ग्रन्थ में बहुत विचार कर यह प्रतिपादित किया था कि ईश्वर ने बाबा आदम से स्वीडन की बोली में बातचीत की थी और बाबा आदम ने होलैंड की जबान में उत्तर दिया। सांप ने बीबी हव्वा से फ्रांसिसी में बात की थी मगर सन् 1569 में एक और विद्वान 'गोरोवियस' ने 'एण्टवार्थ' से एक पुस्तक प्रकाशित कर उक्त सभी धारणाओं को धोखा बताते हुये यह दावा किया कि स्वर्गलोग की भाषा विशुद्ध हालैंडी डब है।

सन् 1474 की बात है। वेसिल नगर में एक मुर्गे पर फौजदारी मुकदमा दायर किया गया। उस पर अपराध यह लगाया गया कि उसने अण्डा दिया था। याद रहे वह मुर्गा था, मुर्गी नहीं। मुर्गे का दिया हुआ अण्डा केवल एक प्रकार की मलहम बनाने के काम आ सकता था जिसे तांत्रिक लोग ही बना सकते थे, अत: यह मामला बहुत संगीन था। लिहाजा नगर के महापण्डितों ने निर्विवाद रूप से यह माना कि बिना शैतान की इच्छा के यह काम हो ही नहीं सकता। अपराधी मुर्गा अण्डे सहित न्यायालय में पेश किया गया। न्यायाधीशों ने उसे अपराधी करार देकर उस विचित्र मुर्गे को अण्डे सहित राजपथ के चौराहे पर समारोहपूर्वक उचित धार्मिक विधि से जिन्दा आग में जला दिया।

यूरोप के कई देशों में यह कानून था कि यदि किसी के घर में सूर्यास्त से लेकर सूर्योदय तक के समय में चोर घुसे और गृहस्वामी चोर को पकड़ कर मार डाले तो कोई अपराध नही हैं। कानून निर्माताओं ने अपनी दूरदर्शिता से यह सोचा कि हो सकता है, कोई व्यक्ति जो अपने घर में अकेला रहता है, किसी और को रात के समय अपने घर ले आये और उसे मार कर कह दे कि वह चोर था। अत: कानून में एक धारा यह भी जोड़ दी गई कि जब कोई व्यक्ति चोर ऐसे आदमी के हाथों मारा जाय जो अपने घर में अकेला रहता हो तो वह अकेला रहने वाला व्यक्ति निरपराध नहीं माना जायेगा जब तक कि वह किसी जीवित प्राणी को न्यायालय में लाकर गवाही न दिला दे। वह जीवित प्राणी चाहे कोई पशु भी क्यों न हो परन्तु साक्षी हो जरूर जिसने हत्या करते देखा हो। इस साक्षी के समक्ष अभियुक्त को कहा जाता कि सत्य बोलने की प्रतिज्ञा करके वह स्वयं को निर्दोष कहे। अगर पशु उसकी बात का विरोध न करता तो उसे निर्दोष माना जाता। कानून ने यह बात मान ली थी कि ईश्वर गूंगे, बहरे पशु के द्वारा आश्चर्यजनक चमत्कार दिखायेगा जिससे हत्यारा तो बच नहीं सकेगा जबकि निर्दोष बच जायेगा।

-प्रदीप जोशी

Share it
Top