रहस्य-रोमांच: कैसे रूक गयी थी वहां ट्रेन?

रहस्य-रोमांच: कैसे रूक गयी थी वहां ट्रेन?

मानो तो शंकर, न मानो तो कंकर। मानो तो गंगा माँ, न मानो तो बहता पानी। मानो तो सच, न मानो तो किस्सा। यह बात ही कही जाती है रहस्य-रोमांच से जुड़ी घटनाओं के बारे में।
यह कहानी है एक ऐसे स्थान पर रेलवे स्टेशन के निर्माण की, जहां आज भी काफी-दूर तक मानव बस्ती नहीं है, एक अंग्रेज रेलवे अधिकारी और सिद्ध योगी बाबा की मुलाकात की, जिससे प्रभावित होकर उस अंग्रेज अधिकारी ने एक निर्जन स्थान पर रेलवे स्टॉप (स्टेशन) बनवाया था। यह किस्सा इस क्षेत्र में आज भी कहा-सुना जाता है।
उत्तर रेलवे का मुरादाबाद मण्डल। मुरादाबाद-सहारनपुर/हरिद्वार मार्ग, रेलवे लाइन के स्टेशन नगीना-नजीबाबाद के बीच पड़ता है एक छोटा सा रेलवे स्टेशन मुरशदपुर।
यह घटना अंग्रेजी शासन काल की है जब भाप वाले इंजन चला करते थे। हरिद्वार की ओर जा रही टे्रन के ड्राइवर को एक महात्मा इस स्थान पर एक टीले से हाथ उठाये हुए उतरता दिखायी दिया मानो वह ट्रेन को रुकने का संकेत कर रहा हो। आश्चर्य ड्राइवर के प्रयास के बिना इंजन स्वत: ही रुक गया। बिना किसी स्टापेज के ट्रेन रुकने पर गार्ड अपने डिब्बे से उतरकर ड्राइवर की ओर बढ़ा।
उन दिनों यह स्थान कैसा रहा होगा? इसका सहज अनुमान आज की दशा को देखकर लग सकता है। ऊंची-ऊंची झाडिय़ों व सरकण्डे के झुण्ड, हवा के चलने पर गर्मियों की दोपहरी में ऐसी अजीब सी आवाज करते हैं जिससे कोई भी भयग्रस्त हो सकता है। हां तो, इतने में महात्मा जी टीले से उतरकर टे्रन तक पहुंचे। गार्ड भी इंजन की ओर बढ़ा। महात्मा जी ने गार्ड से कहा-बेटा, हम हरिद्वार जाना चाहते हैं।
अंग्रेज गार्ड ने हंसते हुए महात्मा जी से कहा कि-आपके पास पैसा है? मुफ्त में तो टे्रन नहीं ले जाएगी तुमको।
'अच्छा, देख ले बेटा, पैसा तो नहीं। सन्तों के पास तो आशीर्वाद ही होता है देने को।' महात्मा ने कहा।
महात्मा जी की बात अनसुनी करते हुए गार्ड ने ड्राइवर से पूछा कि टे्रन क्यों रुकी?
ड्राइवर ने बताया कि पता नहीं, अचानक स्वत: ही यहां आकर इंजन थम गया। इंजन में कोई कमी नहीं लेकिन आगे की ओर बढ़ ही नहीं रहा है?
इधर, ड्राइवर-गार्ड की न ले जाने की मंशा भांपकर महात्मा जी जिधर से आये थे, उधर को ही वापस चल दिये।
जंगल में टे्रन रुकने से यात्रीगणों में बेचैनी बढ़ गयी। कहते हैं कि तभी किसी यात्री ने अंग्रेज गार्ड को बताया कि जिस महात्मा जी की बात तुमने लौटा दी है, उन्होंने ही तो गाड़ी नहीं रोक दी?
यह बात ड्राइवर को जमी, क्योंकि जब उसने महात्मा जी को देखा था, उसी क्षण वह इंजन स्वत: रुक गया था। बस ड्राइवर-गार्ड दोनों ही उस टीले पर चढ़ गये। थोड़ी आगे जाने पर उन्हें महात्मा जी दिखे। दोनों ने निवेदन किया-बाबा जी आप हरिद्वार चलें।
किन्तु महात्मा जी ने हरिद्वार जाने से मना कर दिया। 'अच्छा बाबा जी, ट्रेन तो चलवाइये। हम जायें। दोनों ने निवेदन किया। महात्मा जी बोले-'जाओ टे्रन चल जाएगी।'
ड्राइवर इंजन पर, गार्ड अपने डिब्बे पर पहुंचा। ड्राइवर ने ट्रेन चलानी चाही। सीटी देता इंजन, डिब्बों को खींचते हुए आगे बढ़ चला।
अब जब भी मौका मिलता, वह अंग्रेज रेलवे अधिकारी बाबा से मिलने आने लगा। कहते हैं बाबा ने उसे बहुत ज्ञान दिया। उसकी कई विभागीय तरक्की हुई। एक दिन उक्त अधिकारी ने कहा-बाबा, मैं गुरूदक्षिणा देना चाहता हूं।
महात्मा जी बोले-मेरी मरजी की दक्षिणा देनी होगी। उसके 'हां कहने पर बाबा ने यहां रेलवे स्टेशन बनवाने को कहा।
बाबा की बात मानते हुए उसने वहां पर अपने उच्चाधिकारी लोगों से मिलकर रेलवे स्टेशन बनवा दिया। यह स्टेशन भवन आज भी लगभग 10-15 फीट की ऊंचाई पर बना है। स्टेशन भवन से रेलवे लाइन गड्ढ़े में नजर आती है।
कहते हैं उस अंग्रेज अधिकारी ने महात्मा जी को एक ऐसी टू इन वन लालटेन दी थी जिससे स्टोव का भी काम होता था। बाद में बाबा जी ऋषिकेश चले गये। उनके चमत्कारों के कई रहस्यपूर्ण किस्से हैं जो फिर कभी लिखूंगा।
'मुरशदपुर' का अर्थ है गुरु का स्थान। यह नाम उसी अंग्रेज अधिकारी द्वारा दिया गया बताते हैं।
बाबा के कहते ही इंजन कैसे स्टार्ट हुआ? बाबा को आते देख इंजन स्वत: ही कैसे रुक गया? निर्जन स्थान पर रेलवे स्टेशन बनाया गया, यह सब क्यों? ये प्रश्न रहस्य बने हुए हैं?
- अनिल शर्मा 'अनिल'

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