बाल जगत/जानकारी: उल्काओं का रहस्यमय संसार

बाल जगत/जानकारी: उल्काओं का रहस्यमय संसार

दिन रविवार सत्ताइस नवम्बर सन् 2011, समय शाम साढ़े छह बजे, स्थान दिल्ली के गाँधी नगर के चाँद मुहल्ले का एक घर। घटना, एक दहकता हुआ आग का गोला आकर गिरा जिसे देखने के लिए लोगों का ताँता लग गया।
लोग अलग-अलग ढंग से इसकी व्याख्या कर रहे थे। कुछ लोग इसे आतिशबाज़ी समझ रहे थे तो कुछ लोग जादू-टोना। किसी ने कहा कि कोई तारा टूट कर गिरा होगा। जितने मुँह उतनी बातें लेकिन वास्तव में यह था एक उल्कापिण्ड। उल्कापिण्ड क्या होते हैं और कहाँ से आते हैं ये उल्कापिण्ड? यह उत्सुकता अस्वाभाविक नहीं।
यदि हम गहन अंधेरी रात में आकाश में ऊपर नजऱ डालते हैं तो असंख्य जगमग करते तारों के बीच सहसा दिखलाई पड़ता है एक शोला सा जो तेज़ी से चमकता है और पल भर में विलीन हो जाता है। क्षण भर में लुप्त हो जाने वाले इस चमकीले शोले को ही उल्का अथवा उल्कापिंड कहा जाता है। उल्कापात अथवा उल्कापिंड गिरना एक सिद्ध वैज्ञानिक घटना है, यह बात प्रेक्षणों और प्रयोगों से सिद्ध हो चुकी है। उल्कापिंड बाहरी अंतरिक्ष के वे छोटे-छोटे अंश होते हैं जो पत्थर या धातु से निर्मित होते हैं।
उल्कापिंड जैसे ही बाहरी अंतरिक्ष से पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते हैं उनमें घर्षण के कारण गर्मी पैदा हो जाती है और वे चमकने लगते हैं। वस्तुत: उल्काएँ सौर मण्डल के जन्म से ही अंतरिक्ष में उत्पन्न होती रही हैं और अन्तरिक्ष के सभी पिण्डों पर पहुँचती रही हैं। उल्काएँ सौर मण्डल में भी उत्पन्न होती हैं और सौर परिवार के सभी ग्रहों एवं उपग्रहों पर पहुँचती रहती हैं। इनकी उत्पत्ति उन उल्कापिंडों से होती है जो सूर्य के चारों ओर अपनी विशिष्ट कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं। वैसे तो उल्काएँ सभी दिशाओं में जाती हैं परन्तु जब ये पृथ्वी की तरफ बढ़ती हैं तो उल्का धराओं का निर्माण होता है।
उल्काएँ जब पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करती हैं तो चमकना शुरू कर देती हैं क्योंकि अपनी तेज गति के कारण वे वायुमण्डल के अन्दर घर्षण से गर्म हो जाती हैं और उनका तापमान इतना बढ़ जाता है कि वे जल उठती हैं। कुछ छोटी उल्काएँ तो रास्ते में ही जल कर समाप्त हो जाती हैं जिनकी एक-आध मुटठी धूल भर ही कभी-कभार पृथ्वी तक पहुँच पाती है। अन्य कुछ बड़ी उल्काएँ पृथ्वी तक पहुँच पाती हैं जो पृथ्वी पर पहुँचने के बाद ठंडी हो जाती हैं। यही अवशेष 'उल्काश्म' कहलाते हैं।
उल्काएँ जब वायुमण्डल में प्रवेश करती हैं तो उनकी गति 10 से 70 कि.मी. प्रति सैकेण्ड तक हो सकती है। उल्काएँ वायु मण्डल में 50 से 120 कि.मी. तक की ऊंचाई में चमकती हैं। उल्का जितनी बड़ी व तेज होगी, उसका प्रकाश भी उतना ही अधिक होगा। कुछ उल्काएँ तो शुक्र ग्रह से भी अधिक चमकदार होती हैं जिन्हें हम 'अग्नि उल्काएँ' कहते हैं। 'अग्नि उल्का' के बहुत सारे उदाहरण हमारे इस इतिहास में देखने में आते हैं। कई बार इन अग्नि उल्काओं से पृथ्वी की सतह पर गड्ढ़े भी बन गये हैं। कई गड्ढ़े तो इतने बड़े हैं कि उनका निर्माण केवल लाखों टन भारी उल्काश्मों से ही संभव है।
उल्काश्मों से बने कई गड्ढे तो इतने बड़े हैं कि बाद में वे विशाल झीलों के रूप में परिवर्तित हो गए। कहा जाता है कि महाराष्ट्र स्थित लोणार झील भी किसी उल्काश्म के गिरने से ही बनी है। उल्काओं के गिरने का न केवल पृथ्वी की सतह और इसके वायुमंडल पर प्रभाव पड़ता है अपितु पृथ्वी के जीव-जंतुओं पर भी इसके व्यापक प्र्रभाव देखे गए हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि करोड़ों साल पहले मैक्सिको में गिरे एक उल्कापिण्ड के कारण ही धरती से डायनोसोरों का अस्तित्व समाप्त हो गया था।
उल्काश्मों को रासायनिक विश्लेषण के आधार पर प्रमुख दो वर्गों में रखा जा सकता है: लौह वर्ग एवं पत्थर वर्ग। लौह उल्काश्मों का घनत्व 8 ग्राम प्रति घन से.मी. के लगभग होता है और उनके अन्दर प्रमुख रूप से लोहा, कैल्शियम, मैंगनीज, मैगनीशियम, व्रफोमियम, निकल, सिलीकान, एल्यूमीनियम, कोबाल्ट और सोडियम आदि धातुएँ उपस्थित होती हैं। पत्थर वर्ग की उल्काओं का घनत्व 2 से 4 ग्राम प्रति घन से.मी. होता है जो पत्थर की बनी होती हैं।
पृथ्वी पर प्रतिदिन कुल मिला कर 1० टन भार की उल्काश्म पहुँच जाती हैं जो अरबों वर्र्षोंं से इसी तरह आ रही हैं और प्रतिदिन इनकी संख्या भी लाखो में होती है।
सौरमण्डल की सीमा को पार करने के लिए अथवा उससे आगे जाने के लिए भी अतंरिक्ष के उस भाग से आयी उल्काओं का अध्ययन करना अत्यंत अनिवार्य है इसलिए उल्काओं का अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है।
30 जून 2008 को 'तुंगुस्का' उल्काश्म के आने के सौ साल पूरे होने से कुछ दिन पहले ही एक विचित्र घटना हो गई। रूस के उत्तरी साइबेरिया स्थित तुंगुस्का स्पेस इवेंट फाउण्डेशन के यार्ड से तीन टन वजऩ का उल्कापिंड चोरी हो गया जो 30 जून 1908 को आए तुंगुस्का उल्काश्म का ही एक भाग था। इस घटना से भी उल्काओं के अध्ययन के महत्त्व का ही पता चलता है।
-सीताराम गुप्ता

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