65250 करोड़ रुपये का स्वदेशी काला धन.. नेताओं और अफसरों पर भी सर्जिकल स्ट्राइक की है ज़रुरत

65250 करोड़ रुपये का स्वदेशी काला धन.. नेताओं और अफसरों पर भी सर्जिकल स्ट्राइक की है ज़रुरत

black-money-620x400भारत जैसे 130 करोड जनसंख्या वाले देश में जिस प्रकार गत कुछ वर्षों में स्वदेशी व विदेशी काला धन अभिशाप बन गया है व इससे देश का विकास तो अवरुद्ध हुआ ही, वहीं देश के नागरिकों को भी गरीबी की मार झेलनी पड़ रही है सो अलग।
भारत देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार अभियान में कहा था कि देश में काला धन इतना है कि यदि वह सामने आये तो भारत के प्रत्येक नागरिक के बैंक खाते में 15 लाख रुपये जमा हो सकते हैं।
देश के असंख्य अशिक्षित व बुद्धिहीन व्यक्ति इस जुमले को सही समझते हुए अभी भी अपने भाषणों के दौरान सार्वजनिक सभाओं में आम जनता से पूछते हैं कि ढाई वर्ष के मोदी के शासन में किसी व्यक्ति के बैंक खाते में 15 लाख रुपये जमा हुए है तो आम जनता नकारात्मक उत्तर देती है। इसको भाषण देने वाला अपनी आशातीत सफलता मानता है और मोदी को एकदम से फेल कर देता है। भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी ने भी काल में कहा था कि भारत देश पर विदेशी ऋण इतना है कि प्रत्येक भारतीय के हिस्से में साढ़े तीन हजार रुपये से अधिक आता है तो क्या तब प्रत्येक व्यक्ति से विदेशी ऋण की वह रकम सरकारी खजाने में जमा करवायी गई थी ?
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 26 मई 2014 को शपथ ग्रहण के तुरंत बाद से विदेशों में जमा काले धन को स्वदेश लाने की कवायद शुरु कर दी थी। भारतीय लोगों ने भ्रष्टाचार करके प्राप्त हुए धन को विदेशों के बैंकों में जमा करवाया हुआ है। इस धन से भारत का नुकसान ही हुआ और अन्य विदेशी सरकारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है।
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भारतीयों के द्वारा देश में भ्रष्टाचार करके कमाये गये धन को विदेशी बैंको में भारत सरकार की अनुमति के बिना जमा करवाने को एकदम से देशद्रोह मान कर मुकदमा चलाया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा विदेशों से काले धन को वापस लाने के प्रयास किये जा रहे है। इसके लिए सरकार को कुछ कानूनी व कुछ व्यावहारिक भारी परेशानियों को झेलना पड़ रहा है।इस सरकार ने जून 2016 में स्वदेश में काले धन को सफेद करने की एक आय घोषणा योजना 2016 (आईडीएस)की घोषणा की थी जिसकी अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2016 रखी गई थी तथा आम जनता को कहा गया था कि व अपना काला धन 45 प्रतिशत आयकर जमा करके उजागर कर सकते हैं तथा उस धन का प्रयोग वे अपने व्यापार धंधें को बढ़ाने के लिए कर सकते हैं जो धन अब तक गुप्त रुप से छिपा कर रख हुआ है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस योजना के अंतर्गत लगभग 65,250 करोड़ रुपये की रकम उजागर हुई और इससे 30,000 करोड़ रुपये से अधिक का आयकर सरकार को प्राप्त होने की उम्मीद है। वित मंत्री अरुण जेटली के अनुसार यह शुरुआती आंकड़ा है। इसमें लगभग 10,000 करोड रुपये की वृद्धि की सम्भावना है। जब सभी घोषित खातों की राशि की गणना हो जायेगी, तब उजागर काले धन में वृद्धि की संभावना है। 30,000 करोड़ रुपये के आयकर की यह धन राशि केन्द्र सरकार की कई योजनाओं के सालाना बजट से अधिक हैं। वर्तमान समय अर्थात 30 सितम्बर 2016 तक केन्द्र सरकार 1,40,741 करोड़ रुपये का घरेलू व विदेशी काला धन व अघोषित आय के रुप में सामने ला सकी है। आईडीएस योजना में 64,275 लोगों ने 65,250 करोड़ रुपये की काली कमाई की जानकारी सरकार को दी है। यह धनराशि अब तक का रिकार्ड माना जा रहा है। काले धन का अंतिम आंकड़ा इससे अधिक ही होने का अनुमान है। विदेश से अधिक काला धन देश में ही छिपा मिला।
वर्ष 1997 में स्वेच्छिक आय घोषणा योजना में 9,760 करोड़ रुपये के काले धन का पता लग सका था। इस योजना में तीन महीने के दौरान 644 लोगो  ने 4,147 करोड रुपये उजागर किये थे। इससे सरकारी खजाने में मात्र 2,428 करोड रुपये ही जमा हो सके थे। वर्तमान आईडीएस योजना में (1 जून से 30 सितम्बर 2016 तक के चार महीनों में) 30,000 करोड रुपये राजस्व प्राप्त होगा और इसमें से लगभग 15,000 करोड रुपये वर्ष 2016-17 में ही मिल जायेंगे बाकी रकम अगले वित वर्ष 2017-18 में प्राप्त हो सकेंगी।
दो दशक पूर्व स्वैच्छिक आय घोषणा योजना (वीडीआईएस) से तुलना करने पर आभास होता है कि इन वर्षों में काला धन लगभग 15 गुना बढ़ चुका है। 1997 में प्रत्येक व्यक्ति ने औसतन सात लाख रुपये जबकि इस योजना में अब औसतन एक करोड़ रुपये की काली कमाई की घोषणा की गई। 2011 वर्ष में यूपीए सरकार ने संसद में काले धन को लेकर एक श्वेत पत्र पेश किया था परन्तु इस श्वेत पत्र में देश में कुल मिला कर कितना काला धन है इसका कोई अनुमान नहीं किया गया था। भारत सरकार ने तीन एजेंसियों (एनआईपीएफपी, एनसीईएआर और एनआईएफएम) को काला धन के आंकलन  व काले धन को रोकने के उपाय पर सुझाव देने का काम सौंपा था।
तीनों एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी परन्तु तीनों ने ही देश में छिपे काले धन के आकार के बारे में विश्वसनीयता से कुछ भी नहीं कहा। वर्ष 2012 में स्विटजरलैंड सरकार ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उनके यहां भारतीयों की मात्र दो अरब डॉलर की पूंजी ही जमा है।
वर्तमान (2016) में 65,250 करोड रुपये के काले धन का खुलासा होना सरकार की एक बडी विजय मानी जायेगी क्योंकि अभी तक की सभी स्वेच्छिक योजनाएं लगभग फुस्स ही साबित हो सकी थी। मौजूदा योजना दंडात्मक प्रावधानों वाली थी जिससे देश में इस योजना के प्रति एक सकारात्मक वातावरण बन सका। अब सरकार को उन तौर तरीकों पर प्रभावपूर्ण रोक लगाना आवश्यक है जिनसे काला धन उत्पन्न होता है अर्थात सरकार को काले धन के विरुद्ध अपने अभियान पर नियमितता के आधार पर जोर देते रहना पड़ेगा। जहां देश में काले धन पर कठोर कुठाराघात करना होगा, वहीं काले धन के लिए कुख्यात देशों पर भी अंतराष्ट्रीय दबाव बनाना जारी रखना पड़ेगा।
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कालेधन के खातों पर गोपनीयता बनाये रख कर वे देश कुल मिलाकर आर्थिक नियमों के विरुद्ध काम करने के साथ साथ देश की गरीबी व असमानता को बढ़़ावा देने का कार्य कर रहे हैं। ऐसे कुख्यात देशों जो काले धन के अडडे बन चुके हैं, उन पर प्रभावी देश अपना दबाब बनाऐं। कई ऐसे पेशे है जो संदिग्ध तौर तरीकों से संचालित होते हैं और काले धन के व्यवसाय में सहायक बनते है। काले धन का एक बड़ा स्रोत धन बल के जरिये संचालित होने वाली राजनीति है। वैसे अप्रत्यक्ष रुप से यह भी माना जाता है कि भारतीय राजनीति किसी न किसी स्तर पर काले धन पर आश्रित है जिसके कारण काले धन के विरुद्ध कोई भी सरकार कोई कड़ा कदम नहीं उठा सकी है।ऐसा लगता है कि इस मामले में लगभग सभी राजनीतिक दलों के बीच एक गोपनीय आम सहमति सी बनी रहती है। कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने आय-व्यय के खातों का सही सही विवरण देनेे को तैयार नहीं होती है। राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदों के एक भाग की ही जानकारी दी जाती है। यदि राजनीति व चुनावों में सुधारों को एक साथ गति दी जाय, तभी काले धन की राजनीति पर अंकुश लग सकता है। इसके साथ प्रशासनिक सुधारों को भी लागू किया जाय क्योंकि काले धन का व्यवसाय समाप्त न होने का एक बड़ा कारण नौकरशाही का वह हिस्सा है जो इस काले कारोबार से लाभान्वित होता है और स्वयं को बचाये भी रखता है। अत: संप्रग सरकार को भाजपा के नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राजनीतिक संधार, प्रशासनिक सुधार व चुनावी सुधारों को एक साथ एक दिशा में कठोरता के साथ कदम उठाने चाहिए।
इन सब मामलों में देश में एक आम सहमति का वातावरण बनाना होगा क्योंकि कई बार यह देखा गया है कि काले धन पर आम सहमति होती है परन्तु आम राय कायम नहीं हो पाती है। सरकार को इस बात को भी देखना चाहिए कि हमारे राजनेता- गांव प्रधान व सरपंच से लेकर सांसद व मंत्री तक बने जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के एक दो साल में ही कई कई करोड रुपये के धन के स्वामी बन जाते है जबकि उनकी आय का कोई प्रत्यक्ष स्रोत नहीं होता है। इसी प्रकार नौकरशाही भी देखते देखते अरबपति बन जाती है। इन पर भी सर्जिकल स्ट्राइक करने की आवश्यकता है।[आप ये ख़बरें अपने मोबाइल पर पढना चाहते है तो दैनिक रॉयल बुलेटिन की मोबाइलएप को डाउनलोड कीजिये….गूगल के प्लेस्टोर में जाकर
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– डा. सूर्य प्रकाश अग्रवाल

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