भारतीय युवतियों पर पाश्चात्य असर…..दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है यौन स्वतंत्रता…!

भारतीय युवतियों पर पाश्चात्य असर…..दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है यौन स्वतंत्रता…!

आजकल भारतीय युवतियों पर पाश्चात्य संस्कृति का असर कुछ अलग तरह से ही चढ़कर बोल रहा है, शायद यह कहना गलत साबित नहीं होगा। एक ओर जहां आधुनिकता का जामा पहन कर इन भारतीय युवतियों ने भारत की गौरवशाली संस्कृति को रौंद डाला है वहीं दूसरी तरफ दिनप्रति दिन बढ़ती फैशन रूपी पाश्चात्य संस्कृति को अधिकाधिक अपना कर स्वच्छन्द एवं उन्मुक्त होकर जगह-जगह घूमकर अल्ट्रामॉड बनने के चक्कर में अपना नारीत्व तक दांव पर लगा दिया है।
हालांकि सर्वप्रथम स्वच्छन्द व उन्मुक्त छवि युक्त युवतियों को श्रेष्ठ समझा जाता था परन्तु समय बदलने के साथ ही यह उन्मुक्तता धीरे-धीरे कामुकता और यौन पिपासा की दहलीज तक आ पहुंची है। परिणामस्वरूप, आज न केवल भारत के महानगरों में समृद्ध तथा अभिजात्य परिवारों की मनचली युवतियों ने लोक लाज व संकोच जैसे संवेदनशील शब्दों से अपना नाता तोड़ लिया है बल्कि ग्रामीण युवतियां भी इस चकाचौंध से अंधी हो कर समाज में व्याप्त सभी बंधनों को भुला बैठी हैं।
वर्तमान समय में मुंह में सिगरेट डालकर ढेर सारे ब्वॉय फ्रेन्ड के साथ क्लबों में नाचना, महंगे होटलों में पुरूषों की बाहों में बिना हिचक अपने बदन को सौंपना और किसी गैर मर्द के साथ पार्को में गुलछर्रे उड़ाना आदि बातें तो अब भारतीय युवतियों के लिए एक आम बात हो गयी है। यही नहीं, कुछ नवयुवतियां तो वह सब कुछ कर गुजरती हैं जो उनके लिए हर लिहाज से अनैतिक व खतरनाक है।
इतना ही नहीं, भारत के चार महानगरों में सबसे ज्यादा दिलवालों की नगरी कही जाने वाली यानी दिल्ली की नवयुवतियां आज के समय में कितनी मुक्त या उन्मुक्त हैं, इसका नजारा राजधानी दिल्ली के लोधी गार्डन, बुद्धा गार्डन, नेहरू पार्क, पुराना किला के अतिरिक्त मजनू का टीले आदि नामक स्थानों पर घूमते हुए आसानी से देखा जा सकता है। निस्संदेह यौन सुख एक नितांत अनिवार्य चीज है पर इसका सार्वजनिक जगहों पर खुलकर प्रदर्शन नहीं किया जाना चाहिये।
सामाजिक मान्यताओं और परंपराओं को जी भर कर कोसने वाली नवयुवतियां व छात्रायें इस तरह के अनैतिक कार्य को आधुनिकता का नाम देती हैं। उनके अनुसार, जब अमेरिका, ब्रिटेन, हांगकांग के अलावा सिंगापुर जैसे बड़े-बड़े देशों में युवतियों को यौन स्वतंत्रता प्राप्त है तो हम भारतीय युवतियां ही क्यों उनसे पीछे रहें। फिल्मों में भी तो यही सब दिखाया जाता है।
दिलचस्प बात तो यह है कि बदलते सामाजिक परिवेश और बाहरी देशों की चमक-दमक ने भारतीय महानगरों की युवतियों में नैतिकता का बिल्कुल लोप कर दिया है। विगत दिनों में स्नेह, ममता और त्याग की देवी मानी जाने वाली नारी आज पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध में इस कदर अंधी हो गयी है कि उसे हमारी पुरातन संस्कृति जो शांति के लिए प्रसिद्ध है, तक स्मरण नहीं रह गई है।
भविष्य में दिनोंदिन बढ़ रही इस यौन स्वतंत्रता का चाहे कोई असर पड़े या नहीं, यह तो भविष्य ही जाने मगर जहां तक प्रश्न वर्तमान का है तो यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय महानगरों की इस अनैतिक यौन-स्वतंत्रता और आधुनिकता जो युवतियों की दिनचर्या का अंग बन चुकी है, के कारण हमारे सामाजिक संबंध दहकने लगे हैं जिसका परिणाम आगे अच्छा कतई नहीं साबित होगा।
यौन उन्मुक्तता के संदर्भ में एक रिपोर्ट बताती है कि इक्कीस वर्ष की चालीस प्रतिशत छात्रायें शादी होने से पहले ही रतिक्रि या का अनुभव कर चुकी हैं जबकि छात्रों में यह आंकड़ा सत्तर प्रतिशत को स्पर्श कर रहा है। यह तो है लगभग परिपक्व युवतियों की बात, लेकिन जहां तक सवाल स्कूली छात्र-छात्राओं का आता है तो यह तथ्य वाकई आंखें खोल देने वाला है।
दक्षिण दिल्ली के एक आधुनिक इलाके की स्कूली छात्राओं के बीच किये गये एक सर्वेक्षण के मुताबिक तेरह वर्ष से कम उम्र की सात प्रतिशत और सोलह वर्ष तक की उन्नीस प्रतिशत बालिकायें भी यौन आनंद लेना चाहती हैं परन्तु उचित स्थान और सही साथ के अभाव में फिलहाल वे इसको पाने से वंचित हैं।
यदि भारतीय युवतियों में बढ़ रही इस यौन-स्वच्छंदता और उन्मुक्तता को शीघ्र ही न विराम लगाया गया तो अपनी भारतीय संस्कृति को पाश्चात्य संस्कृति से बचाने में बहुत देर हो चुकी होगी।
-अनूप मिश्रा

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