होली का विशिष्ट रंग…शत्रु के भी गले मिल जाने की प्रेरणा देता है..!

होली का विशिष्ट रंग…शत्रु के भी गले मिल जाने की प्रेरणा देता है..!

अति व्यक्तिवाद के कारण जब सामाजिक विद्रूपतायें अपना साम्राज्य स्थापित करने लगें और जीवन मूल्यों एवं नैतिक भावनाओं का पतन होने लगे, तब हमें आवश्यकता होती है, एक ऐसे अवसर की जो सच्ची समाज भावना को दृढ़ करने का संकल्प प्रदान कर सके और जीवन मूल्यों की रक्षा में सहायक हो सके। इस परिप्रेक्ष्य में होली एकमात्र ऐसा पर्व है जो अपने सिद्धांतों और संदेशों से हमें यह व्यापक सोच देता है कि मौज-मस्ती निषेध नहीं है परन्तु मर्यादित, नैतिक और ऐसी हो जिससे व्यक्तिवाद के घने जंगल से निकल कर हम समाजवाद के विशाल और विस्तृत राजमार्ग पर अग्रसर हो सकें। हम ‘स्वीकार’ और ‘परिहार’ (त्याग) के बीच व्यापक अंतर समझ सकें और अपने स्वभाव और गुणों को इनकी कसौटी पर परख कर ग्रहण या त्याग कर सकें। अनुशासन परिपालन और वर्जनाओं के त्याग की प्रवृत्ति ही स्वीकार और परिवार की संस्कृति बनकर हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का एक महत्त्वपूर्ण अंग है और इसी संस्कृति के कारण हमारी प्राचीन होली की संकल्पना एवं उसमें निहित मीमांसा भारत के सभी पर्वों में उसे सर्वश्रेष्ठ होने का गौरव प्रदान करती है। भारतीय पर्वों की श्रृंखला में वास्तव में होली का पर्व ही ऐसा पर्व है जिसका किसी अन्य पर्व से उद्देश्य, मंतव्य या परम्परा अलग है, जिसका मकसद अलग है। एक यही पर्व है जो मानव को मानव से जुड़ जाने का संदेश देता है। शत्रु के भी गले मिल जाने की प्रेरणा देता है, असंतुष्ट या रूठों को मना लेने का बहाना देता है। प्रेम विनिमय का अवसर देता है। हम कुछ सोच सकें कि हम क्या हैं? हमारे कर्तव्य क्या है? और इस कर्तव्य निर्वाह के प्रति हमें क्या करना है? अथवा कर्तव्य निर्वाह को संकल्पित करने का समय देता है। एक ऐसा समय जब हम स्वार्थ और लोभ के मार्ग से हटकर कुछ अलग तरह का सोच सकें और कर सकें, होली का जो विशिष्ट रंग है उसे गहराई से समझ सकें।
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होली का एक अलग रंग होता है यानी विशिष्ट रंग। यह रंग नीला-पीला, बैंगनी, हरा या लाल न होकर एक अलग रंग होता है और जब चढ़ता है तो सीधा हृदय पर असर करता है। यह रंग है एकता का रंग, भाई-चारे का रंग। यह रंग है जो काले-गोरे, धूत-अधूत और जातिवर्ग या संप्रदाय का भेद मिटा दें। जब होली का यह रंग चढ़ता है तो आदमी अपनी सारी लौकिक पहचान खोकर सिर्फ एक पहचान के साथ सामने आता है अर्थात् मनुष्य के रूप में। जी हां, जिसकी सारी व्यक्तिगत पहचानें खो जाती हैं। रह जाती है कि एक पहचान मनुष्य होने की, जिसकी जाति, वर्ग, संप्रदाय और धर्म सब कुछ एक ही है मनुष्यता। यह रंग ही हमें देव श्रेणी में पहुंचा देने में सक्षम है। काश! यह रंग ही हमारी धरती पर बिखर जाये तो सारे अभिशाप मिट जायें। यह अभिशाप ही तो है जो हम झेल रहे हैं। यह अभिशाप ही तो है कि हम जीवन मूल्यों की रक्षा के हितार्थ अपना चिंतन खो बैठे हैं। यह अभिशाप ही तो है कि प्रतिवर्ष होली अपना संदेश देने आती है और हम उसे मूल संदेश से हटकर सोचते और समझते हैं तथा अपनी तरह से मनाते हैं जिसमें हम बैर वैमनस्य को स्थान देते हैं तथा कीचड़, तारकोल या पेंट्स से अपना जुनून प्रकट करते हैं।
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होली का हम शाब्दिक अर्थ लें तो होली दो वर्णों से मिलकर बनी है। होली का ‘हो’ अर्थात होना तद्जनित व्यापक अर्थ में किसी का भी हो जाना। जाहिर है जब आप किसी के होंगे तो उसका, आपका हो जाना प्राकृतिक है। दूसरा ‘ली’ यानी ‘लीजिये’ अर्थात हर किसी को अपना लीजिये। चाहे वह गरीब हो, किसी जाति-वर्ग-संप्रदाय का हो, अधूत या परित्यक्त हो, निरक्षर हो या मिट्टी में कम करने वाला मेहनकश हो, उसे अपनाइये, अपना बनाइये, वह आपको हो जायेगा और आप उसके खुद-ब-खुद हो जायेंगे।
अत: यहां यह स्पष्ट होता है कि होली शब्द हमें अपने अंतर्निहित व्यापक अर्थों में दूसरे का हो जाने और दूसरों को अपना लेने का गूढ़ संदेश देता है जो एक दूसरे से जुड़ जाने की भावना को बढ़ावा देकर रिश्तों को मजबूत बनाने में सहायक है इसी भाव से ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना को बल मिलता है।
आइये इन अर्थों में ही होली को समझें-जानें और मनायें तथा इसके मूल उद्देश्य को, इसके मकसद को शिरोधार्य कर सच्चे समाजवाद की अवधारणा में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दें।
– हरिश्चन्द्र गौड़

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