हर पल तनाव के बीच…चिन्ताग्रस्त जीवन में मुस्कायें कैसे..!

हर पल तनाव के बीच…चिन्ताग्रस्त जीवन में मुस्कायें कैसे..!

 जीवन के प्रभात की किरणों को अमावस्या की काली रात अपने मुंह में ऐसे डकार गई कि सम्पूर्ण जिंदगी अंधियारे से परिपूर्ण काली छाया बन कर ठहर गई है। जन्म होते ही बचपन में बड़े-बड़े पुस्तकों के बैग से कांपता जीवन चिंता के पहले ग्रास में चला जाता है। शिक्षा के उपरान्त नौकरी की चिंता का दबाव सताना प्रारंभ कर देता है।
सुखद प्रेम और जीवन में ज्ञान के भण्डार की विशालता विचारों को नवीन स्फूर्ति प्रदान करती है लेकिन नौकरी के बाद खाली वक्त काटने को दौड़ता है। फिर विवाह की चिंता घेर लेती है। कुछ सुखद लम्हों के बाद संतान उत्पत्ति की परेशानियां विकराल स्वरूप प्रकट करती है। धन संग्रह कारोबार नौकरी में कर लिया लेकिन चिंता से मुक्ति मिलना सरल नहीं हो पाता। कहीं अधिक आमदनी के कारण टैक्स की चिंता, गरीबी में भोजन की चिंता, ऐसे ही मनुष्य हर पल मस्तिष्क पर कुछ भी बिना वजह के सोच विचार के दबाव से तनाव में इतना व्यस्त रहता है कि चिड़चिड़ापन एवं भूख, प्यास, कब्ज, अनिद्रा जैसे अन्य रोगों से ग्रस्त होता चला जाता है।
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मानसिक तनाव से पीडि़त मनुष्य चिंता के प्रभाव में अधिक रहने के कारण हर पल अज्ञानता की अग्नि में जलता रहता है। चिता तो एक बार में मुर्दे को भस्त कर देती है लेकिन चिन्ता मनुष्य को जलाकर खोखला और चिड़चिड़ा बना देती है।
चिंता से मुक्ति के मार्ग को प्रत्येक मनुष्य तलाश करता है लेकिन कितने सफल हो पाते है। कुछ परेशानियों के घेरे में मकड़ी के जाल की तरह स्वयं बनाकर फंस जाते हैं। पदार्थों की लोलुपता की चकाचौंध में मनुष्य जीवन की मुस्कान ढूंढ़ता है लेकिन निराशा और चिंता ही प्राप्त होती है। इन पदार्थों से क्षणिक सुख तो प्राप्त किये जा सकते हैं पर शाश्वत सुख से वंचित होता जाता है। आत्मा का विस्तार शाश्वत सत्य के परिवेश में विकसित होता है जो आध्यात्मिक गूढ़ रहस्य की शाश्वत जानकारी से प्रारंभ होता है। मनुष्य का मुख्य उद्देश्य है परमात्मा को बोध करना जिससे यह आत्मा संकीर्णता की परिधि से बाहर निकल कर विचारों की सुकोमल भावनाओं को निर्मित करके हृदय में निर्मलता को उजागर करती है। ब्रहम ज्ञान तत्वेता के आर्शीवाद से हासिल होता है जिससे मानसिकता में परिवर्तन होता है।
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मनुष्य के विचारों में सदगुणों की उत्पत्ति परमात्मा के विधान को मानने वाले सत्संग से होती है। वहां पर आत्मा आनन्द की उस सहज अवस्था को एकाग्रता और श्रद्धा विश्वास से प्राप्त कर लेती है जिससे मन में बचपन, जवानी, कैरियर, विवाह, संतान की चिंताएं समाप्त होकर प्रभु भक्ति में ध्यान केन्द्रित होता है। विचारों में भय, शंका व निराशा का भय समाप्त हो जाता है एवं निर्भयता का उदय होता है। सच्ची वास्तविकता मानसिक विचारों में उज्जवलता उत्पन्न कर देती है। तनाव की स्थिति संकीर्ण सोच से पनपती है। जीवन में आनन्द और खुशियों की सदाबहार मुस्कान चिंताओं से मुक्त होकर प्राप्ति होती है। यदि मनुष्य अल्प समय में उन्नति के पथ ढूढ़कर विकास करना चाहता है तो मानसिकता में नकारात्मक भावनाओं को प्रकट करके दूसरे की भावनाओं को कुचलना पड़ेगा। मनुष्य को ऐसी सोच बनानी होगी जिससे सभी उन्नति करें। जलन, नफरत, निन्दा की प्रवृत्ति में परमात्मा के ज्ञान से ही परिवर्तन किया जा सकता है।
– विकास बिहानियां

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