हड्डियों को संक्रमण से बचाएं…!

हड्डियों को संक्रमण से बचाएं…!

 संक्रमण की वजह से कई मामलों में हमेशा के लिए हड्डियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। ऐसे में संक्रमण को कैसे रोका जा सकता है? बैक्टीरिया पनपने से त्वचा में संक्रमण हो जाता है और समय पर ध्यान न देने से वह संक्रमण गंभीर भी हो सकता है। ठीक ऐसे ही हड्डियों में संक्रमण हो सकता है जिसे ऑस्टियोमाइलाइटिस कहते हैं।
अगर हड्डी में बैक्टीरिया या वायरस चला जाए तो हड्डियों में संक्रमण होने का खतरा रहता है। वयस्कों में यह समस्या अक्सर कूल्हों, रीढ़ की हड्डी और पैरों में पाई जाती है जबकि बच्चों में यह आमतौर पर बाजू की लंबी हड्डी और टांगों में देखने को मिलती है।
कैसे होता है संक्रमण:
कई छोटे-छोटे बैक्टीरिया व वायरस खून के रास्ते हड्डियों में पहुंच जाते हैं और हड्डियों में संक्रमण फैलाते हैं। इसमें सबसे आम स्टेफ्लोकोकस जीव है जिससे शरीर में संक्रमण होता है और बाद में यह हड्डियों तक भी पहुंच जाता है। स्टेफ्लोकोकस जीव त्वचा के ऊपर कोई नुकसान नहीं पहुंचाते लेकिन ये रोगी की इम्युनिटी को कम कर देते हैं और जख्मी अंग को अधिक संक्रमित कर सकते हैं। ये बैक्टीरिया किसी चोट व गहरे जख्म से उत्पन्न होते हैं और मवाद के रूप में संक्रमण के पास की हड्डियों में पहुंच जाते हैं। कई बार ये बैक्टीरिया सर्जरी से हुए कट से भी उत्पन्न हो सकते हैं।
संक्रमण के कारण: हड्डी में संक्रमण होने के कई कारण हो सकते हैं। अगर जख्म को सही तरीके से साफ न किया जाए तो बैक्टीरिया पनप सकते हैं। कई बार जख्म या चोट में मवाद भर जाता है जिसमें बैक्टीरिया उत्पन्न हो जाते हैं। यही मवाद हड्डियों तक पहुंच जाता है। इसके अलावा डायबिटीज के रोगी का जख्म ठीक न होने की स्थिति में बैक्टीरिया हड्डियों पर अटैक कर सकते हैं। अक्सर डायबिटीज रोगियों के पैरों पर जख्म होने पर वे भर नहीं पाते, जिससे उसमें बैक्टीरिया उत्पन्न होने लगते हैं और फिर वे हड्डियों को संक्रमित करते हैं। त्वचा में संक्रमण के मुकाबले हड्डियों के संक्रमण को ठीक होने में काफी समय लगता है।
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लक्षण: आमतौर पर हड्डियों में संक्रमण से रोगी को दर्द बहुत ज्यादा होता है। इसके अलावा उसे बुखार के साथ कंपकंपाहट, संक्रमित अंग में सूजन और लालिमा छा जाती है। संक्रमित हड्डी के पास त्वचा अकडऩभरी हो जाती है। अंग से गाढ़े पीले रंग का मवाद निकलता है और यह दिन प्रतिदिन काफी गहरा होता जाता है और छेद जैसा दिखने लगता है।
संक्रमण का रिस्क: सबसे ज्यादा समस्या डायबिटीज रोगियों को हो सकती है। उनकी हड्डियों में पहुंचने वाले रक्त से यह समस्या हो सकती है। किडनी के इलाज में इस्तेमाल हिमोडायलिसिस से यह विकार हो सकता है। कृत्रिम प्रत्यारोपण के दौरान भी संक्रमण होने का रिस्क बढ़ जाता है। इसके अलावा ज्यादा शराब व धूम्रपान के सेवन से हड्डी में संक्रमण का रिस्क बढ़ सकता है।
कैसे करें इलाज: बीमारी का पता चलने पर रोगी को एंटीबायटिक दवाओं की खुराक दी जाती है। अगर स्थिति ज्यादा गंभीर होती है तो डॉक्टर सर्जरी का भी परामर्श देते हैं। सर्जरी में संक्रमित हड्डी और उसके आसपास के मृत टिश्यूज को बाहर निकाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया में जख्म या चोट के मवाद को भी बाहर निकाला जाता है। संक्रमित हड्डी को निकाल कर उसकी जगह नई हड्डी प्रत्यारोपित कर दी जाती है।
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जख्म की उपयुक्त देखभाल करना बहुत जरूरी है और कई बार इलाज कई महीनों तक चल सकता है। इसलिए रोगी को डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं को नियमित रूप से लेना चाहिए। अगर रोगी को डायबिटीज है तो बिना डॉक्टर के परामर्श के कोई भी दवा या इलाज न करें। वैसे तो अन्य रोगियों को भी इलाज खुद से नहीं करना चाहिए लेकिन डायबिटीज रोगी के मामले में स्थिति गंभीर हो सकती है।
रोगी अक्सर खुद ही एंटीबायटिक दवाएं ले लेते हैं जिससे कई बार रोगी को कई तरह के साइड इफैक्ट्स हो जाते हैं। खासतौर पर डायबिटीज या किसी अन्य बीमारी से ग्रस्त रोगी को तो बिना डॉक्टर के परामर्श के कोई दवा लेनी ही नहीं चाहिए। लोग कैमिस्ट से दवा ले लेते हैं जो काफी जोखिम भरा हो सकता हैं
बेहतर देखभाल और जख्म को सूखा रख कर संक्रमण को रोका जा सकता है। दर्द बढऩे पर समय रहते डॉक्टर से परामर्श लेने पर स्थिति को गंभीर होने से बचाया जा सकता है। रोगी को आरामदायक और सही जूते पहनने चाहिए। डायबिटीज रोगियों को खास ख्याल रखना चाहिए। चोट से बचना चाहिए ताकि जख्म न हो क्योंकि डायबिटीज रोगियों के जख्म भरने में समय लगता है।
– नरेंद्र देवांगन

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