सौंदर्य पर प्रदूषण से ग्रहण न लगने दें…!

सौंदर्य पर प्रदूषण से ग्रहण न लगने दें…!

आजकल सर्वत्र प्रदूषण का बोलबाला है। कहीं माइक, स्टीरियो, लाउडस्पीकर की चीख चिल्लाहट वातावरण को प्रदूषित कर रही है तो कहीं गाडिय़ों की आवाज और उनसे निकलने वाले धुएं ने पर्यावरण को प्रदूषित कर रखा है।
हवा में मिली जहरीली हानिकारक गैसें, धुआं एवं धूल के कण हमारे नाक के मार्ग से शरीर के अंदर घुसकर हमारे फेफड़ों को डेमेज कर दमा और ब्रोंकाइटिस जैसे गंभीर श्वसन रोग हमारे शरीर को प्रदान कर रहे हैं जिनमें एलर्जी भी शामिल है।
विशेषज्ञों एवं जानकारों का कहना है कि प्रदूषित वातावरण में मौजूद धूल व धुएं से चेहरे पर कम उम्र में ही झुर्रियां उत्पन्न हो जाती हैं। अगर त्वचा एवं बालों का ख्याल और उचित ढंग से रखरखाव न किया जाये तो इन पर प्रदूषण का दुष्प्रभाव पड़ते देर नहीं लगती। बाल दोमुंहे और असमय ही सफेद होने लगते हैं, साथ ही झडऩे भी लगते हैं।
अगर प्रदूषण उत्पन्न करने वाले कारक, जिस वातावरण में हम रहते हैं, अधिक बढ़ जायें तो ऑक्सीकरण नामक प्रक्रिया को बढ़ा देते हैं जिस कारण से शरीर स्थित स्वतंत्र मूलकों के उत्पादन की बढ़ोतरी हो जाती है। यही वह कारण है जिससे कम उम्र में ही झुर्रियां चेहरे एवं शरीर में पडऩे लगती हैं, चूंकि प्रदूषण पैदा करने वाले कण त्वचा पर चिपक जाते हैं और रोमछिद्रों को बंद कर चेहरे की त्चचा पर मुंहासे और ब्लैकहैड्स पैदा कर देते हैं।
प्रदूषित पर्यावरण के साथ ही साथ अगर सूर्य की पराबैंगनी किरणों के सम्पर्क में भी आदमी अधिक समय तक रहे तो शरीर में स्थित लचीलापन भी धीरे धीरे स्वत: ही खत्म हो जाता है। त्वचा सिकुडऩे लगती है तथा उस पर झुर्रियां भी पड़ जाती हैं। सूखी सर्द हवायें, तेज गर्मी, धूल, धुआं अत्यधिक सौंदर्य प्रसाधनों के प्रयोग तथा त्वचा के प्रति बरती गई लापरवाही यह सब असमय ही बुढ़ापा बढ़ाने के सहयोगी कारक बन जाते हैं।
चर्म रोग विशेषज्ञों का कहना है कि भूमण्डलीय प्रदूषण के कारण त्वचा पर दाग, धब्बे, झाइयां तथा त्वचा में कड़ापन आदि किसी भी उम्र एवं अवस्था में देखे जा सकते हैं।
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शरीर की कमनीयता एवं त्वचा की लावण्यता बनी रहे, इसके लिये जहां तक हो सके, हर्बल तरीकों एवं साथ ही हर्बल सौंदर्य उत्पादों का इस्तेमाल करना चाहिये। तेज धूप या रोशनी से प्रत्यक्ष रूप से बचना चाहिये। नियमित शरीर की सफाई व स्नान ध्यान करना चाहिये। नहाते समय झांवे या स्क्रबर का हल्के हाथों से इस्तेमाल करना चाहिये। अच्छा हो अगर स्नान से आधा घंटा पहले किसी अच्छे तेल क्रीम या लोशन से शरीर की मालिश की जाये। फिर आधे घंटे बाद आराम से प्रसन्न मुद्रा में नहाया जाये।
कभी-कभी झरना या शावर के नीचे भी नहाना चाहिये। ऐसा करने से रक्ताभिसरण में गति आती है जिससे रक्त अधिक से अधिक ऑक्सीजन ग्रहण करके कार्बन डाईआक्साइड एवं अन्य विकारी गैसें शरीर से बाहर निकाल देता है। अगर बाथ टब की सुविधा हो तो उसमें भी आंख बंद करके कुछ देर शरीर को ढीला छोड़ा जा सकता है। तत्पश्चात् साबुन या उबटन से नहाकर, शरीर को रोयेंदार तौलिये से पोंछा जाये। फिर माश्चराइजर या कोल्डक्रीम लगायें और पाउडर का छिड़काव करें। अगर नहाने के पानी में सुगंध का इस्तेमाल किया जाये तो सार्थक प्रभाव पड़ता है।
उसी प्रकार रात्रि में सोने से पहले त्वचा पर जमी मिट्टी, सौंदर्य प्रसाधनों के अंश, त्वचा के मृत कण एवं जमी हुई तैलीय परत को ठीक से साफ कर देना चाहिये। हो सके तो कम से कम पंद्रह मिनट पैरों को हल्के गुनगुने पानी में डुबो कर रखें। उसमें चुटकी भर नमक भी डाल दें। पैरों के साथ ही साथ समूचे शरीर को भी आराम मिलेगा। शरीर स्थित् दर्द में आराम पहुंचेगा और शरीर भी निरोग रहेगा। कारण, अधिक संसर्गजन्य रोग पैरों में स्थित् दरारों से विषाणुओं के द्वारा शरीर में प्रवेश कर शरीर को अस्वस्थ कर देते हैं।
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पेट्रोलियम जैली का उपयोग चेहरे पर नहीं करना चाहिये। एडिय़ों के लिये पेट्रोलियम जैली उपयुक्त रहती है मगर चेहरे के लिये या त्वचा के लिये नहीं। कारण इनके प्रयोग से रोम छिद्र बंद हो जाते हैं जो अवांछनीय तत्वों को त्वचा में चिपकने में सहायता पहुंचाते हैं और रोमछिद्र बंद कर देते हैं। इससे विकारी तत्व शरीर से बाहर नहीं निकल पाते एवं शरीर अस्वस्थ हो जाता है।
इसी प्रकार खानपान में सतर्कता एवं डायट थेरेपी का प्रयोग शरीर एवं स्वास्थ्य के लिये हितकारी होता है। हर मौसम में फल फूल, हरी भाजी व दूध दही का भरपूर सेवन करना चाहिए।
साथ ही समय-समय पर अगर उपचार किया जाये तो धूल धुएं के दुष्प्रभाव से शरीर को बचाया जा सकता है। धूप से बचने हेतु सिर को जहां तक हो सके, ढक कर या कपड़े से ढककर ही घर से बाहर निकलना चाहिये। उच्च कोटि के गागल्स भी आंखों की रक्षा करते हैं। साथ ही आंखों के नीचे पडऩे वाले काले घेरों तथा झाइयों से बचाते हैं। ठण्ड में ऊनी मोजे एवं गरमी में सूती मोजे एवं दस्तानों का इस्तेमाल उचित होता है।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जरा-सी सावधानी और प्रदूषण से भरपूर बचाव। आप भी सावधानी बरतिये एवं अपने सौंदर्य पर प्रदूषण रूपी ग्रहण न लगने दें।
– सेतु जैन

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