सेना का राजनीतिक इस्तेमाल कब तक ?

सेना का राजनीतिक इस्तेमाल कब तक ?

केन्द्र सरकार द्वारा सैन्य एवं खुफिया तंत्र के शीर्ष पदों पर नई नियुक्तियां की गई हैं। इसके साथ ही सरकार के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो सकता है। क्योंकि इस बारे में कांग्रेस ने कहा है कि लेफ्टिनेंट जनरल रावत की काबिलियत पर कोई शक नहीं है लेकिन सरकार को इस बात का जवाब देना होगा कि सेना प्रमुख की नियुक्ति को लेकर तीन वरिष्ठ अधिकारियों को नजरंदाज क्यों किया गया। वहीं, जदयू नेता के.सी. त्यागी द्वारा भी नए आर्मी चीफ की नियुक्ति में वरिष्ठता का सम्मान न किए जाने पर सवाल उठाया गया। उनका कहना है कि नियुक्तियों में पारदर्शिता जरूरी है। इसी प्रकार, सीपीआई नेता डी. राजा ने कहा कि सेना को किसी विवाद में घसीटना ठीक नहीं है लेकिन सरकार को बताना चाहिए कि उसने क्यों वरिष्ठता को नजरअंदाज किया।
http://www.royalbulletin.com/एसएसबी-को-और-अधिक-मजबूत-बन/वैसे अगर राजनीतिक दलों की इस आपत्ति को राजनीतिक भी मान लिया जाए तब भी जानकार ऐसा मानते हैं कि सैन्य अधिकारियों की नियुक्ति में उनकी वरिष्ठता को नजरअंदाज करते हुए एक तरह से पक्षपात किया गया है। जो न तो सैन्य मापदंडों के अनुरूप है और न ही इससे देश के प्रति सेना के समर्पण भाव का मूल उद्देश्य ही पूरा होगा। क्योंकि इससे सेना में यह संदेश जा सकता है कि देश के इस प्रतिष्ठित तंत्र में नियुक्तियों को लेकर भी राजनेता पूर्वाग्रह व पक्षपात से प्रेरित रहते हैं। केन्द्र सरकार द्वारा लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत को नया थलसेना अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। सरकार ने जिस माहौल में अगले सेनाध्यक्ष और वायुसेनाध्यक्ष के नामों की घोषणा की है तथा लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत को अगला थलसेना अध्यक्ष बनाया है तथा एयर मार्शल बीरेंद्र सिंह धनोआ को अगले वायुसेनाध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया गया है।
http://www.royalbulletin.com/राजनीतिक-दलों-के-चंदे-का-ह/उसके बारे में जानकारों का स्पष्ट मानना है कि अगले थल सेनाध्यक्ष के रूप में लेफ्टिनेंट जनरल रावत के नाम की घोषणा करके सरकार ने सैन्य अधिकारियों की वरिष्ठता को नजरअंदाज करके गलत परंपरा को शुरू किया है तथा आगे इसके नतीजे उत्साहजनक नहीं होंगे। हमारे देश की सैन्य व्यवस्था को पाकिस्तान के मुकाबले तो बेहतर ही होना चाहिए क्योंकि वहां तो आए दिन सेना की उठापटक व बगावत चलती रहती है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पर आए दिन इस बात का खौफ रहता है कि कहीं आर्मी चीफ शासन तंत्र का तख्ता पलट न कर दे। अगर पूर्वी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रवीण बख्शी सबसे वरिष्ठ हैं तो फिर इस लिहाज से उन्हें ही अगला थलसेना अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए था। रावत के बारे में सरकारी तंत्र का तर्क है कि वह पाकिस्तान से लगती नियंत्रण रेखा, चीन के साथ लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा और उत्तर पूर्व समेत कई क्षेत्रों में ऑपरेशनल जिम्मेदारियों का निर्वहन कर चुके हैं। कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ और झारखंड कैडर के आइपीएस अधिकारी राजीव जैन इंटेलीजेंस ब्यूरो (आइबी) के नए प्रमुख बनाए गए हैं।
http://www.royalbulletin.com/interest-rate-on-pf-reduced-to-8-65-percent/जबकि, पाकिस्तान डेस्क पर काम कर चुके मध्य प्रदेश कैडर के आइपीएस अधिकारी अनिल धस्माना रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) की जिम्मेदारी का निर्वहन करेंगे। देश में आए दिन इस बात पर चर्चा होती रहती है कि देश की प्रतिष्ठा की दृष्टि से सेना एक महत्वपूर्ण इकाई है तथा इसमें नियुक्तियों सहित संपूर्ण व्यवस्था का संचालन निर्धारित मापदंडों के अनुरूप ही होना चाहिए। साथ ही सरकारी तंत्र द्वारा ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाया जाना चाहिए कि सेना में अंतर्कलह, गुटबाजी आदि को बढ़ावा मिले तथा सैन्य अधिकारी या सैनिक सरकार के किसी भी कदम से हतोत्साहित हो। क्योंकि सेना का मकसद तो देश की हिफाज़त करना है तथा सरकार को चाहिए कि वह न तो सैन्य मामलों में किसी तरह की अनावश्यक दखलंदाजी करे और न ही सेना का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजनीतिक इस्तेमाल हो। वहीं, सेना के अधिकारियों व सैनिकों के वेतन निर्धारण तथा पूर्व सैनिकों की पेंशन आदि के निर्धारण में उनके हितों का पूरा ख्याल रखा जाए। लेकिन देश में जिस तरह का दौर चल रहा है उससे तो जनमानस में अच्छा संदेश नहीं ही जा रहा है क्योंकि ओआरओपी (वन रैंक वन पेंशन) के मुद्दे पर पूर्व सैनिक पहले से ही असंतुष्ट चल रहे हैं। सरकार की हठधर्मिता के कारण उनकी जायज मांगें पूरी नहीं हो पा रही हैं। पूर्व सैनिकों को धरना, प्रदर्शन, आंदोलन आदि के लिए विवश होना पड़ रहा है। अभी कुछ दिन पूर्व ही पेंशन के मुद्दे को लेकर दिल्ली निवासी एक पूर्व सैनिक रामकिशन ग्रेवाल ने आत्महत्या कर ली। तब देश के सत्तापक्ष से जुड़े नेताओं ने रामकिशन ग्रेवाल व उनके परिजनों के बारे में कई अपमानजनक बातें कही। वहीं ग्रेवाल के परिजनों से दिल्ली पुलिस द्वारा मारपीट भी की गई। ऐसे में सेना एवं पूर्व सैनिकों के प्रति सरकार की सोच का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
– सुधांशु द्विवेदी

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