सूबे की सल्तनत किसके हाथ में होगी..?..बोनस और बोगस तय करेगा पूर्वांचल

सूबे की सल्तनत किसके हाथ में होगी..?..बोनस और बोगस तय करेगा पूर्वांचल

पूर्वांचल पर भाजपा, बसपा, सपा और कांग्रेस सबकी नजर है। मतदाताओं पर डोरा डालने में कोई किसी से कम नहीं है। सबके लुभावने वादे हैं। पूर्वांचल की किस्मत बदलने को सभी बेताब हैं। हर चुनाव में इस तरह की मसीहाई बेताबी दिखती है लेकिन चुनाव बीतने के बाद उन्हें सपने में भी पूर्वांचल याद नहीं आता। बसपा, सपा और कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों को प्रदेश के हितों के अनुरूप नहीं बता रहे हैं लेकिन विकास के मुद्दे पर बात नहीं कर रहे हैं। कोई अपने आधे-अधूरे विकास गिना रहा है तो कोई बाहुबलियों को जिताने में ही अपनी पूरी ऊर्जा लगा रहा है। पूर्वांचल की मूलभूत समस्या जापानी बुखार से हर साल होने वाली हजारों बच्चों बच्चों की मौत, सपा-कांग्रेस गठबंधन और बसपा के एजेंडे से बाहर हैं। बंद पड़ी चीनी मिलों, कताई मिलों को खोलने का वादा कोई नहीं कर रहा। बनारसी साड़ी और कालीन उद्योग की बर्बादी पर कोई बोलना नहीं चाहता। पूर्वांचल की 31 में से 21 चीनी मिलें बंद हैं। इन्हें खोलने का एक भी ठोस आश्वासन किसी भी राजनीतिक दल की ओर से नहीं किया गया है। इन चीनी मिलों को पूर्वांचल के विकास की जीवनरेखा कह सकते हैं। इन बंद मिलों को पांच साल के अपने कार्यकाल में खुलवा न पाने वालेअखिलेश यादव भी यहां से जीत की उम्मीद लगाए हुए हैं। हर साल बाढ़ और सूखे की मार झेलने वाले पूर्वांचल को जिस हमदर्द सरकार की जरूरत है, वह उसे अभी तक नहीं मिल पाई है। पूर्वांचल बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। सपा, कांग्रेस और बसपा सरकार अपने कार्यकाल में बलिया के दियारा समस्या का आज तक समाधान नहीं कर पाई है। गंगा की कटान से प्रभावित किसानों को हर साल बिहार के सीमा क्षेत्र में जा चुकी अपनी जमीन पर खड़ी फसल को बोने और काटने के लिए लोहा लेना पड़ता है। हर साल दोनों ओर से गोलियां चलती हैं लेकिन इस समस्या का प्रभावी निदान आज तक नहीं हो सका है। गंगा हर साल कटान करती है। उसे कटान करने से रोका नहीं जा सकता लेकिन इससे प्रभावित किसानों को राहत तो दी जा सकती है लेकिन किसी भी सरकार ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया। पूर्वांचल के सामने एक तरफ उसका विकास है और दूसरी ओर जाति-धर्म की राजनीति। इसमें संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोरखपुर में एम्स की आधारशिला रख दी है और बीएचयू स्थित सर सुंदरलाल चिकित्सालय को एम्स जैसा पैकेज दे दिया है।
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वैसे यहां के चिकित्सक एम्स से कम की सुविधा पर सहमत नहीं हैं। केंद्र सरकार इस दिशा में विचार भी कर रही है। मऊ की सभा में जब प्रधानमंत्री ने यह कहा कि सपा-कांग्रेस और बसपा नहीं चाहती कि भाजपा को प्रदेश में स्पष्ट बहुमत मिले तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस पर उनकी चुटकी ली। प्रधानमंत्री भी कम खिलाड़ी नहीं हैं। उन्होंने महराजगंज में पूर्वांचल की जनता को सीधा संदेश दिया है कि भाजपा जीत तो पांच चरणों में ही गई है, शेष दो चरणों में तो उसे यहां की जनता से बोनस में सीटें चाहिए। अखिलेश और उनकी सहयोगी कांग्रेस को नरेंद्र मोदी के इस बयान से निश्चित रूप से झटका लगा है। मोदी की नकल तो की जा सकती है लेकिन वक्तृता में उनका मुकाबला करना बेहद कठिन है। इस बात का अहसास उनके विरोधियों को भी है। अगर सभी विरोधी दल प्रधानमंत्री को निशाना बना रहे हैं तो इसके पीछे उनकी रणनीति भाजपा के बढ़ते रथ को रोकना ही है। भले ही अखिलेश और राहुल विकास के मुद्दे पर मोदी से सवाल पूछें लेकिन भाजपा द्वारा उठाए गए सवालों पर दोनों ही ने चुप्पी साध रखी है। मायावती भाजपा पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आरोप लगा रही हैं लेकिन चुनाव प्रचार के पहले दिन से ही वे दलितों और मुस्लिमों के हितों की बात कर रही हैं। क्या दलित और मुस्लिम ही उत्तर प्रदेश हैं या यादव और मुस्लिम ही उत्तर प्रदेश हैं? इस पर विचार किए जाने की जरूरत है। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के हालिया विवाद को गरमाने के पीछे भी पूर्वांचल में मतों को प्रभावित करना ही विपक्षी दलों का अभीष्ठ रहा है। पूर्वांचल और बिहार के ज्यादातर लड़के जेएनयू में पढ़ते हैं। भोजपुरी भाषा की उपेक्षा का मामला भी इस चुनाव में असर डाल सकता है। मनोज तिवारी की चुनाव प्रचार में उपस्थिति भी अखिलेश और मायावती का समीकरण बिगाड़ रही है। इसमें संदेह नहीं कि पूर्वांचल में राजनीतिक दलों और मतदाताओं की परीक्षा अब होनी है। राज्य के 14 जिलों की 89 सीटें यह तय करेंगी कि कौन बोनस पाएगा और कौन बोगस साबित होगा? पांच चरणों के चुनाव हो चुके हैं।
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छठे चरण का चुनाव चार मार्च को आजमगढ़ और गोरखपुर मंडल में होना है। गोरखपुर मंडल में भाजपा के हिन्दुत्ववादी नेता सांसद महन्त आदित्यनाथ की साख का इम्तिहान होना है तो आजमगढ़ और मऊ में बाहुबली मुख्तार अंसारी की प्रतिष्ठा दांव पर है। देवरिया में अगर केन्द्रीय मंत्री कलराज मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व की परीक्षा होनी है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती को पूर्वांचल के एक करोड़ 72 लाख मतदाता माकूल जवाब देंगे। इन नेताओं की नजर में विकास की अवधारणा क्या है और वह यहां की जनता की सोच से कितना मेल खाती है, इस पर मुहर पूर्वांचल के सात जिले चार मार्च को लगाएंगे। यहां की 77 लाख 84 हजार महिलाएं यह तय करेंगी कि उनकी उम्मीदों का नायक कौन सा राजनीतिक दल होगा? वर्ष 2012 में इन 49 सीटों में से सपा ने 27, बसपा ने नौ, भाजपा ने सात तथा कांग्रेस ने चार सीटें जीती थी, जबकि दो सीटें अन्य के खाते में गयी थीं। गौरतलब है कि छठे चरण के चुनाव में सबसे ज्यादा 23 उम्मीदवार गोरखपुर सीट पर मैदान में हैं, जबकि सबसे कम सात उम्मीदवार मऊ जिले की मोहम्मदाबाद गोहना सीट से किस्मत आजमा रहे हैं। आजमगढ़ मुलायम सिंह यादव का संसदीय क्षेत्र है। वर्ष 2012 में यहां की दस में से नौ विधानसभा क्षेत्रों में सपा प्रत्याशी जीते थे। यह अलग बात है कि इस बार मुलायम सिंह यादव ने यहां की एक भी रैली को संबोधित नहीं किया है। इसका असर भी इस चुनाव में देखने को मिल सकता है। उत्तर प्रदेश के 80 सांसदों में 17 ब्राह्मण, 16 राजपूत, जाट, यादव, लोधी और कुर्मी 5-5, मौर्य, कुशवाहा, सैनी, निषाद, कश्यप 3-3,जाटव, गूजर, बाल्मीकि 2-2, पासी 6, कोरी, भूमिहार,धोबी, मल्लाह, खटिक,धानुक, खरवार जाति के एक-एक सांसद हैं। उत्तर प्रदेश से केंद्रीय मंत्रिमंडल में 11 मंत्री हैं जिनमें 3 ब्राह्मण, 2 राजपूत,1-1 लोधी,निशाद, कुर्मी, धानुक,जाट और भूमिहार हैं।
उप्र में 49 सीटों पर छठे चरण के लिये थम गया चुनाव प्रचार, चार मार्च को होगा मतदान
भाजपा अपने सामाजिक जातिगत समीकरणों की बदौलत 2017 के विधानसभा चुनाव का मैदान मारने के लिए सक्रिय है। पूर्वांचल के सात जिलों आजमगढ़,मऊ, बलिया, महराजगंज, गोरखपुर, कुशीनगर और देवरिया में चार मार्च को छठें चरण का चुनाव होना है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को महराजगंज जिले से एक, गोरखपुर जिले से तीन,कुशीनगर से एक, देवरिया से एक और बलिया से एक सीट मिली थी। आजमगढ़ और मऊ में उसका खाता भी नहीं खुला था। आजमगढ़ जिले की अतरौलिया, गोपालपुर,सगड़ी, आजमगढ़, निजामाबाद, फूलपुर पवई,दीदारगंज,लालगंज और मेहनगर में सपा प्रत्याशी जीते थे, बसपा यहां दूसरे नंबर पर रही थी। बसपा ने मधुबन और मुबारकपुर में सपा को पटखनी दी थी। यह अलग बात है कि उसकी जीत का अंतर क्रमशः 1356 और 8566 रहा। मऊ जिले की घोसी,मोहम्मदाबाद गोहाना और बेल्थरा रोड सीट पर सपा के प्रत्याशी जीते। मऊ विधानसभा क्षेत्र से कौमी एकता दल ने विजय हासिल की। दिलचस्प तो यह है कि आजमगढ़ और मऊ जिले में दूसरे नंबर पर बसपा ही रही। बलिया जिले की फेफना सीट से ही भाजपा जीत पाई थी जबकि रसड़ा में बसपा,बलिया नगर,बांसडीह और बैरिया में सपा प्रत्याशियों ने जीत हासिल की। बांसडीह और बैरिया में भाजपा दूसरे नंबर पर रही जबकि बलिया नगर विधानसभा खेत्र में कौमी एकता दल। नौगढ़, बांसी,खलीलाबाद, धुरियापार,गोरखपुर,दोआबा,बलिया, चंदौली, वाराणसी दक्षिण,गंगापुर, ज्ञानपुर, बरसेठी,गड़वारा, मिर्जापुर, मझवा, छानवे, करछना, बारा, हंडिया,इलाहाबाद उत्तर और इलाहाबाद दक्षिण वैसे तो ब्राह्मण बहुल क्षेत्र हैं। पिछले दो चुनावों में यहां के ब्राह्मणों ने क्रमशः बसपा और सपा का साथ दिया था। यही वजह है कि कुछ गिनी-चुनी सीटें ही भाजपा के खाते में आ पाईं। इस बार ब्राह्मण सपा और बसपा दोनों ही दलों में खुद को उपेक्षित पा रहा है। दोनों ही दलों में ब्राह्मणों की जो बेकदरी हुई है, उसका खामियाजा उन्हें पूर्वांचल में भुगतना पड़ सकता है। अति दलितों और अति पिछड़ों को अपने पाले में करने के चक्कर में भाजपा ने भी ब्राह्मणों को काफी निराश किया है लेकिन इस इलाके के ब्राह्मण खुद को विकल्पहीनता की स्थिति में पा रहे हैं। 2007 का चुनाव बसपा ने ब्राह्मणों और दलितों को आगे कर लड़ा था लेकिन इस बार उसकी निष्ठा बदल गई है। बसपा सुप्रीमो इस बार मुस्लिमों और दलितों को ज्यादा तरजीह दे रही हैं।
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इससे सवर्ण तबका उनसे बिदका है। बार-बार वे जिस तरह दलितों का आरक्षण खत्म किए जाने की बात कर रही हैं और इस बात की दलील दे रही हैं कि भाजपा दलितों और पिछड़ों का आरक्षण छीनकर सवर्णों को देना चाहती है, इससे सवर्णों में बसपा के प्रति जबर्दस्त नाराजगी है। यह सच है कि पूर्वांचल में बाहुबली मुख्तार अंसारी का मुस्लिम मतदाताओं के बीच अच्छा खासा प्रभाव है लेकिन इस बार उनके लिए मुश्किलें कम नहीं हैं। भाजपा यहां उन्हें जबर्दस्त टक्कर दे रही है। कभी बसपा का नारा हुआ करता था कि ‘चढ़ गुंडों की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर।’ लेकिन, अब तो गुंडे ही हाथी पर चढ़ गए हैं और मायावती बाहुबलियों को जिताने ही नहीं, उन्हें निर्दोष साबित करने, उनके ऊपर लगे अभियोग को समाप्त करने की भी बात कर रही हैं। इसे पूर्वांचल का भूमिहार समाज किस रूप में लेगा, यह किसी से छिपा नहीं है। पूर्वांचल में भूमिहारों की बड़ी आबादी है। बसपा यहां जाटवों के मत का तो दावा कर सकती है लेकिन मल्लाह,केवट, राजभर, पासी आदि पहले ही उनसे फिरंट हैं। मुबारकपुर में हुए शिया-सुन्नी दंगों के घाव अभी भरे नहीं है। इसकी वजह से यहां का साड़ी उद्योग चैपट हो गया है। ऐसे में शिया-सुन्नी किसी एक दल को वोट देंगे, इसकी उम्मीद भी नहीं के बराबर है। अब यह पूर्वांचल के मतदाताओं के विवेक का मामला है कि वह हावर्ड से पढे लोगों को वरीयता देंगे या अनुभव में कढ़े क्षेत्र की समस्याओं को जानने-समझने वालों को। एक कहता है कि जिसका पूर्वांचल, उसी का प्रदेश। अब तक तो यही होता आया है और इस बार के चुनाव में भी पूर्वांचल मील का पत्थर बनेगा। पूर्वांचल ही यह तय करेगा कि सूबे की सल्तनत किसके हाथ में होगी?-सियाराम पांडेय ‘शांत’

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