सुपर मॉम बेटों की नई फसल

सुपर मॉम बेटों की नई फसल

5 आज मां बेटे का रिश्ता पारंपरिक न रहकर बदलाव की आंधी में अपना रूप बदल चुका है। काफी कनफ्यूजऩ भी है। आज की मां आर्थिक रूप से स्वतंत्र है। एकल परिवार की परवरिश, मीडिया के एक्सपोजऱ, इंटरकास्ट मैरिज आदि कुछ ऐसे कारण बन गए हैं जिनके कारण रिश्तों के समीकरण में भी बदलाव आया है। ये अब पुन: परिभाषित हो रहे हैं।
मां और बेटी का रिश्ता बहुत क्लोज़ होता है लेकिन मां बेटे का रिश्ता कहीं ज्यादा संवेदनशील माना जा सकता है। मां अपनी छठी इंद्रिय से बेटे का चेहरा देख कर ही उसके दिल का हाल जान लेती है।
बेटा मां को लेकर इस विश्वास के साथ चलता है कि जहां तक उसके स्वयं की बात आती है, मां एक कमज़ोर पर्सन नहीं बल्कि हर समस्या का कामनसेंस से सही हल बतानेवाली, अनकंडीशनल लव देकर बदले में कोई उम्मीद न रखने वाली स्ट्रांग पर्सनेलिटी है।
यूं बहकते हैं कदम किसी और की तरफ

आधुनिक मॉम की अपनी एक स्वस्थ प्रोफेशनल और सोशल लाइफ भी है। पुरूष उनके साथ अब उदारवादी रवैय्या रखने लगे हैं। उनमें महिलाओं को लेकर ईगो कम हुआ है। बेटे भी अब उन्हें ‘सुपर मॉम’ का दर्जा देकर गर्व महसूस करने लगे हैं।
क्या मां बेटों में बढ़ती कैमिस्ट्री बेटे की पत्नी, प्रेमिका के लिए एक चुनौती बन रही है? सफल बेटों और मांओं की फेहरिस्त खत्म न होने वाली हैं।
कामकाजी महिलाएं और नाश्ते की तैयारी..क्या कर सकती है आप …?

मातृत्व निभाना आसान नहीं है। यहां पजेसिव और नॉनपज़ेसिव के बीच जो तालमेल बिठाना है, उसे समझ पाने के लिए बेहद समझदारी अपेक्षित है। एक दूसरे के अस्तित्व को आदर देते हुए ऑक्सीजन के लिए स्पेस देने की भी आवश्यकता होती है।
मां के लिए बेटे से बढ़कर कोई नहीं और बेटा मां के लिए कुछ भी कर सकता है। यह बंधन तो सदियों से वैसा ही पवित्र और गहरा है। बस अब बेटों पर से बुढ़ापे की लाठी का तमगा हट गया है। अब वे एक स्वस्थ कंपेनियनशिप की बात करते हैं।
– उषा जैन ‘शीरीं’आप ये ख़बरें अपने मोबाइल पर पढना चाहते है तो दैनिक रॉयल unnamed
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