सुख-दुख की कल्पना से बना है जीवन

सुख-दुख की कल्पना से बना है जीवन

जब हमें रात को डर लगता है तो हम अंधेरे की बजाए रोशनी कर लेते हैं। इससे हमारा ध्यान परिवर्तित हो जाता है। ध्यान अदृश्य डर की अपेक्षा आसपास की चीज़ों पर केंद्रित हो जाता है और हम डर से मुक्त हो जाते हैं। इसी प्रकार डर अथवा संकट की अवस्था में हम अपने ईश्वर को भी याद करते हैं क्योंकि हमें पूरा विश्वास होता है कि वह हमारी सहायता अवश्य करेगा।
डर अथवा संकट की अवस्था में हम प्राय: हनुमान चालीसा अथवा अन्य किसी धर्मग्रंथ से किसी जप का पाठ भी करते हैं। वस्तुत: यह ध्यान को परिवर्तित करने की विधि ही है। रात हो या दिन, डर को दूर करने का एकमात्र उपाय यही है कि ध्यान को डर के स्थान से अन्यत्र केंद्रित कर दिया जाए।
रोग भी एक डर है। ध्यान यदि रोग पर टिका रहता है तो शारीरिक पीड़ा भी होती है लेकिन यदि ध्यान बदल जाए तो शारीरिक पीड़ा भी दूर होते देर नहीं लगती। इससे उपचार में मदद मिलती है। इसीलिए लोग मिजाज़पुर्सी के लिए रोगी के पास आते हैं और उसका ध्यान बदलने की कोशिश करते हैं।
कई बार ऐसा होता है कि व्यक्ति बीमार पड़ा है और अचानक उसके सामने कोई बहुत बड़ी समस्या आ जाती है। आदमी अपनी बीमारी को भूलकर उस समस्या से लडऩे के लिए उठ खड़ा होता है। बड़ी बीमारी छोटी बीमारी को ठीक कर देती है तथा बड़ी समस्या छोटी-मोटी सभी समस्याओं को हल कर देती है। बड़ा नुक़सान छोटे-मोटे सभी नुक़सानों को भुला देता है। यह ध्यान परिवर्तन द्वारा रूपांतरण की प्रक्रिया ही तो है।
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यदि हम अपने मन को दुख के स्थान से हटा कर अन्यत्र लगा देते हैं तो उससे दुखों से बचने में सहायता मिलती है। इस प्रकार ध्यान का परिवर्तन समस्याओं और चिंताओं से निकलने का अच्छा मार्ग है। इसमें ध्यान को अनचाही स्थिति से हटाकर अन्यत्र लगाया जाता है। ध्यान को अन्यत्र कहाँ लगाया जाए, यह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं। यदि ध्यान किसी दूसरी बड़ी समस्या या चिंता पर जा टिका तो ऐसे ध्यान परिवर्तन का क्या लाभ? ध्यान को किसी सुखद स्मृति या कल्पना में लगाना ही श्रेयस्कर है। सुख की कल्पना सुखी जीवन तथा दुख की कल्पना दुखी जीवन। धीरे-धीरे यही कल्पनालोक वास्तविकता में परिवर्तित होकर हमारा स्थायी सुख या दुख बन जाता है।
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जब ध्यान किसी सुखद स्मृति या कल्पना पर केंद्रित हो जाता है तो इस परिवर्तित मानसिक अवस्था में जो सुख या आनंद की अनुभूति होती है, वह स्वास्थ्यप्रद होती है। वह हमारे तनाव के स्तर को कम करने में सहायक होती है। ऐसी अवस्था में हमारे शरीर में लाभदायक रसायनों का उत्सर्जन प्रारंभ हो जाता है जो हमारे उत्तम स्वास्थ्य तथा रोगमुक्ति के लिए अनिवार्य है।
ध्यान को विगत की सुखद घटनाओं के अलावा किसी सुखद कल्पना पर भी लगाया जा सकता है। यह ध्यान का सर्वोत्तम रूपांतरण है जो न केवल वर्तमान समस्या से मुक्ति दिलाता है अपितु हमारी कल्पना को वास्तविकता में परिवर्तित कर मनचाही स्थितियों के निर्माण में भी सहायक होता है।
– सीताराम गुप्ता

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