सिनेमा में भी नये आयाम

सिनेमा में भी नये आयाम

जिस तरह भारत चहुं-मुखी क्षेत्रों में नये आयाम बना रहा है, उसी भांति सिनेमा के क्षेत्र में भी बाहुबली-2: द कन्क्लूजन ने केवल अपने दम पर दुनिया के शीर्ष स्तम्भ हालीवुड को जबरदस्त टक्कर दी है। अप्रैल के अंतिम सप्ताह में परम्पराओं को तोडऩे का साहस करते हुए जब इस फिल्म को सिल्बर-स्क्रीन पर प्रदर्शित किया गया था तो किसी ने सोचा भी नहीं था कि 2016 में बेहद धीमी गति से घिसट कर आगे बढ़ रही उस फिल्म-इंडस्ट्री में जो फिल्मों के घरेलू बाजार में 1.6 प्रतिशत की गिरावट के साथ साल के अन्त में बंद हुई तथा जिसके समुद्रपारीय बाजार में भी बेहद मामूली केवल तीन प्रतिशत की वृद्धि मात्र से आँसू पुंछे हों, उसकी मात्र एक फिल्म ही तहलका मचा कर रख देगी। बाहुबली-2 के प्रदर्शन से पूर्व कोई सोच भी नहीं सकता था कि भारत में बनी कोई फिल्म अपनी स्वयं की कमाई का केवल एक महीने में दो हजार करोड़ का आंकड़ा पार कर लेगी किन्तु दो वर्षों से अपना इन्तजार करा रही बाहुबली-2 ने अपने प्रदर्शन के पहले ही दिन नौ हजार से कुछ अधिक सिनेमाघरों में हिंदी, तमिल, तेलगू, मलयालम, जर्मन और फ्रेंच भाषाओं में प्रदर्शित होकर सारे रिकार्ड ध्वस्त करके सवा करोड़ की कमाई को छूकर सब को हतप्रभ कर दिया। रिकार्ड तोड़ प्रारम्भ के बाद बाहुबली-2 ने फिर पीछे मुड़ कर देखना भी गवारा नहीं किया और एक महीना बीतते न बीतते घरेलू सकल आय के रूप में डेढ़ हजार करोड़ से अधिक और विश्व-बाजार के देशों को मिला कर दो हजार दो सौ करोड़ से अधिक आय का आंकड़ा पार करने में देर नहीं लगाई। कहने को तो बाहुबली-2 एक फैंटेसी फिल्म है मगर भारतीय दर्शकों की पसंद के अनुकूल इस फिल्म को पुत्र-प्रेम, वफादारी, नफरत और अनबनों के जाल से इस तरह जकड़ा गया है कि यह सब मिल कर दर्शक को फिल्म की सीमा से भटकने का अवसर ही नहीं देते। जब तक फिल्म का अंतिम दृश्य समाप्त नहीं हो जाता, दर्शक फिल्म के मायावी संसार से निकल ही नहीं पाता और जब निकलता है तो उसके मुंह से वाह और हृदय में फिल्म के प्रति संतुष्टि का एक सार्थक भाव उमडऩे लगता है जो सिनेमा से निकलकर भी बड़ी देर तक अंतर्मन में घुमड़ता रहता है और यही स्थाईभाव मुख-विज्ञापन (माउथ-पब्लिसिटी) के रूप में चौतरफा फैल कर बाहुबली-2 को सिनेमा में स्थाईत्व प्रदान करने में सहायक बनती जा रहा है।
जब बाहर खाना खाने जाये…!
 जैसा कि विज्ञापन और मुख-विज्ञापन के माध्यम और इसके प्रथम खण्ड बाहुबली: द बिगनिंग को देखकर सभी जानते थे कि बाहुबली-2 एक गजब की फैंटेसी होगी किन्तु कोई यह नहीं सोचता था कि इसमें इतनी उच्च-स्तरीय वीएफएक्स और एनिमेशन कला को रिश्तों और पौराणिक परिवेश में इतनी मजबूती से बाँध दिया जाएगा कि वह दर्शक के दिल और दिमाग को बंधक बना ले। कुल मिला कर इस फिल्म में उच्च तकनीकी पहलुओं के साथ करुण, प्रेम, रौद्र, हास्य और वीर रस से संलग्नित श्रंगार का भी तड़का लगा कर इसे अतुलनीय बना दिया गया है। किसी भी फिल्म की सफलता की गारंटी उसके निर्देशन में छुपी होती है। एक अच्छी कहानी का लचर निर्देशन सत्यानाश कर सकता है तो एक परिपक्व निर्देशक बहुत सी खामियों को अपने निर्देशन की खूबियों से इस तरह ढंक सकता है कि उनका पता ही न चले या फिर उन पर ध्यान ही न जाए। यही इस फिल्म के दोनों भागों में हुआ है। दक्षिण के सुप्रसिद्ध निर्देशक एसएस राजमौली जिनके नाम के साथ दक्षिण की फिल्मों का एक लम्बा सिलसिला स्टूडेंट ‘नम्बर वन से मगधीरा तक जिसमें उन्होंने पूर्व और पुनर्जन्मों की कहानियों को विश्वसनीय रूप में प्रस्तुत किया है, जुड़ा है। इसके लिए उन्होंने एनिमेशन और वीएफएक्स का जबरदस्त और सार्थक रूप से विश्वसनीय प्रयोग किया और ख्याति अर्जित की किन्तु ख्याति के शिखर तक पहुंचने की उनकी ललक और पौराणिक परिवेश की कहानियों में उनकी सनक तक पहुंची अभिरुचि ने उन्हें बाहुबली तक पहुंचा दिया।
दांतों को मज़बूत करने में सहायक है फिटकरी.. पायरिया रोग में भी मिलता है लाभ..!
 आशंकाओं के चलते बाहुबली: द बिगनिंग की अभूतपूर्व सफलता ने उनकी सोच और साहस को नये आयाम दिये और वे बाहुबली-2 को पर्दे पर ला सके जिसने उन्हें उस ख्याति के शीर्ष पर पहुंचा दिया जिस के वे वास्तविक हकदार थे। जहां तक भारत में तुलनात्मक रूप से सिनेमाघरों और दर्शकों का प्रश्न है भारत में, अमेरिका के दस लाख दर्शकों पर 126 और चीन के दस लाख दर्शकों पर 23 सिनेमाघरों की तुलना में इतने ही दर्शकों पर मात्र ०6 सिनेमा घरों की उपलब्धता है। साधारण भारतीय दर्शक की टिकट खरीदने की क्षमता उसकी आय के अनुसार बहुत कम है जबकि उसकी आय को ठेंगा दिखाते हुए मल्टीप्लेक्स थियेटरों में छोटे शहरों के सिनेमाघरों की तुलना में टिकट दर चार गुना अधिक है और अमूमन ये मल्टीप्लेक्स थियेटर अक्सर खाली ही रहते हैं। बड़ी टिकट दरों के चलते आधे टिकटों की बिक्री भी पर्याप्त समझी जाती है किन्तु बड़े शहरों के मृतप्राय एकल स्क्रीन सिनेमाघरों को और मल्टीप्लेक्स थियेटरों के गिरते बिजनेस को अपना कंधा देकर बाहुबली और बाहुबली- 2 ने हफ्तों तक उन्हें हाउस फुल बिजनेस प्रदान कर उन्हें तो नवजीवन दिया ही, धीरे-धीरे मृत-शैय्या की ओर खिसक रही सिनेमा इंडस्ट्री जिसे धीरे-धीरे टीवी उद्योग कुतरता चला जा रहा है, को भी नवजीवन प्रदान किया है। किसी व्यापार में लगाया गया धन जब कई गुना होकर वापस लौटता है तो उस व्यापार के प्रति लोगों में आकर्षण पैदा तो होता ही है उसे नवजीवन भी मिल जाता है। यही चमत्कार बाहुबली और बाहुबली-2 ने करके दिखा दिया है। निश्चित रूप से इसके लिए एसएस राजमौली और करण जौहर संयुक्त रूप से बधाई के पात्र हैं जिन्होंने सब कुछ श्रेष्ठ देकर सिनेमा इंडस्ट्री के एक बड़े हिस्से को अवसाद से बाहर निकाल लिया और नये आयाम रच दिये हैं।– राज सक्सेना 

Share it
Share it
Share it
Top