सावधान ! एक लाइलाज रोग है मधुमेह…जानिए इसके लक्षण

सावधान ! एक लाइलाज रोग है मधुमेह…जानिए इसके लक्षण

शरीर में इंसुलिन की मात्र के अंशत: या पूर्णत: अभाव की दशा में चीनी की मात्रा बढऩे से मधुमेह रोग उत्पन्न होता है। फलत: शरीर में पानी तथा सोडियम, पोटेशियम की मात्र बिगडऩे के साथ ही कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन व वसा के चयापचय में गड़बड़ी आ जाती है जिसके अनियंत्रण से आंख, किडनी एवं स्नायु तंत्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
मधुमेह दो प्रकार का (1) प्राइमरी (2) सेकण्डरी होता है। प्राइमरी मधुमेह के टाइप 1 एवं 2 होते हैं। इस रोग के अन्य कारणों में पेंक्रियाज की गड़बड़ी की मुख्य भूमिका होती है। प्राइमरी मधुमेह के टाइप 2 एवं 1 का अनुपात 7:3 का होता है।
लक्षण – टाइप-1 अत्यधिक प्यास लगना एवं वजन का कम होना, टाइप-2 कुछ लोगों में अस्पष्ट तकलीफें जैसे-थकावट एवं स्फूर्ति का अभाव, शरीर पर फोड़े एवं गुप्तांगों में खुजली, लगभग 70 प्रतिशत मोटे एवं 50 प्रतिशत उच्च रक्तचाप से ग्रसित, दृष्टिहीनता, पैर में घाव, मांसपेशियों में कमजोरी होती है।
पहचान – लक्षण महसूस होते ही स्पष्ट पहचान के लिए पेशाब एवं रक्त में चीनी की मात्र की शीघ्र जांच करा लेनी चाहिए।
उपचार – मधुमेह को 3 तरह से-(1) भोजन द्वारा (2) दवा एवं भोजन (3) भोजन एवं इंसुलिन द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। लगभग 50 प्रतिशत का उपचार भोजन, 20-30 प्रतिशत दवा, 20-30 प्रतिशत इंसुलिन द्वारा नियंत्रित हो जाता है। इसके लिए नियमित व्यायाम, जीवन शैली में परिवर्तन, धूम्रपान निषेध एवं शराब पीने में कमी कर देनी चाहिए। इंसुलिन वाले मरीज को हमेशा भोजन तथा जलपान की आवश्यकता होती है। भोजन एवं दवा पर रहने वाले रोगी के पेशाब में चीनी की मात्रा नहीं प्राप्त होती, अत: इंसुलिन वाले रोगी को सदैव घर पर ही ब्लड ग्लूकोज स्ट्रिप द्वारा अपना जांच कराते रहना चाहिए ताकि किटोएसीडोसीस जैसे संभावित खतरों से बचा जा सके।
मधुमेह रोगी की निगरानी – मधुमेह टाइप 1 मरीज का ब्लड ग्लूकोज एवं पेशाब में किटोन की मात्र की जांच हमेशा करवाते रहना चाहिए। वैसे मरीज को अपने दवा एवं इंसुलिन की मात्र का ज्ञान व उसे अपने पास सदैव रखना चाहिए ताकि आवश्यकतानुसार शीघ्र ही उसका उपयोग कर सके। मधुमेह एक जटिल बीमारी है जिसकी गंभीरता समय के साथ बढ़ती ही जाती है, अत: उसे हमेशा डॉक्टर के सम्पर्क में रहना चाहिए।
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इससे उत्पन्न होने वाली समस्याएं:-

तत्काल असर – हाइपोग्लायसीमिया, किटोएसिडोसीस, एक्यूट सरकुलेटरी फेल्योर, लैकिड एसिडोसीस।
दूरगामी असर – रैटिनोपैथी, न्यूरोपैथी, पैर में घाव, नेफरोपैथी।
हाइपोग्लायसिमिया – इसका खतरा दवा पर रहने वालों से इंसुलिन पर रहने वाले को अधिक होता है। इसमें मृत्यु की संभावना 2-4 प्रतिशत होती है जबकि गंभीर हाइपोग्लायसिस की स्थिति में दूसरे के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि इसमें कोमा, दौरा पडऩा, मस्तिष्क की क्षति और किसी चीज में ध्यान नहीं लगना इत्यादि हो सकता है।
ऐसी दशा में होश में रहने वाले मरीज को शर्बत पिलाया जाता है जबकि बेहोशी की हालत में ग्लूकोज का पानी या नस में ग्लूकोज देना आवश्यक हो जाता है।
रेटिनोपैथी – वयस्कों में अंधापन का मुख्य कारण मधुमेह है। प्रत्येक मधुमेह मरीज के लिए आपथेलामेस्कोपी कराना आवश्यक है। मधुमेह का उचित इलाज रेटिनोपैथी होने की संभावना को कम कर देता है।
न्यूरोपैथी – इसमें हाथ पैर में कमजोरी, पैर में दर्द, चमड़े में शून्यता, पैर के तलवे में जलन, नपुंसकता हो सकती है जो लगभग 30 प्रतिशत पुरूषों में बहुतेरे कारणों के कारण हो सकती है।
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नेफ्रोपैथी – किडनी के खराब होने की दशा में होता है। ब्लूड ग्लूकोज का ठीक रहना और उच्च रक्तचाप की कमी नेफ्रोपैथी के होने की प्रक्रिया को कुछ समय के लिए रोक सकता है। इसकी जांच माइक्रो एल्बुमिनुरिया द्वारा मुख्य रूप से हो सकती है।
इलाज – टाइप 1 के लिए बेहतर इलाज की संभावना की तलाश करनी होगी।
टाइप 2 वाले मरीज को अपनी पुरानी जीवन शैली बदलनी चाहिए। जिसके परिवार में पहले से इसका मरीज हैं जो अत्यधिक भोजन लेते हैं, व्यायाम न के बराबर करते हैं, उन्हें स्वस्थ भोजन, नियमित व्यायाम व मोटापा दूर करने से आशातीत सफलता प्राप्त हो सकती है। इस प्रकार टाइप 2 मधुमेह रोगी के बचाव एवं उसके बेहतर जीवन की कल्पना साकार की जा सकती है।
– आशुतोष कुमार सिंह

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