सायनस का प्रकोप… दूर करे योग का प्रयोग

सायनस का प्रकोप… दूर करे योग का प्रयोग

 विश्व में दमा एक सामाजिक स्वास्थ्य की समस्या है। इसका प्रमुख कारण व्यक्ति के नाक में स्थित सायनस नाम की ग्रंथि की स्थायी सूजन मानी जाती है। यह समस्या उन्नत देशों में जहां प्रदूषण नहीं है, वहीं अधिक होती है किन्तु भारत में भी अब इसका प्रभाव अधिक दिखाई देने लगा है। नाक में सायनस की सूजन स्थायी होती है, अत: इसका निदान योग्य योग शिक्षक या चिकित्सक से ही कराना चाहिए।
हर व्यक्ति के नाक के अन्दरूनी भाग में छह सायनस होती हैं। इनमें से उचित मात्रा में श्लेष्मा निकलती रहती है। इसका उपयोग हवा में स्थित कणों को फेफड़ों में जाने से रोकने के लिए होता है। अगर सायनस पर सूजन आ जाती है तो श्लेष्मा अधिक मात्र में निकलने लगती है। इसे ही ‘जुकाम’ के नाम से जाना जाता है। इससे सूजन निरन्तर बनी रहती है और व्यक्ति की प्रतिरोधात्मक क्षमता कम हो जाती है।
जब सायनस मोटी हो जाती है, तब श्वास-प्रश्वास कठिन हो जाता है। इस अवस्था में न तो किसी प्रकार का प्राणायाम करना ही संभव होता है और न ही जलनेति की क्रिया ही संभव होती है। मुंह से श्वास लेने की बाध्यता बन जाती है क्योंकि नाक पूरी तरह से श्वास-प्रश्वास की क्रिया को रोक देती है।
सायनस के होते ही नाक में सूजन, दर्द, श्वास लेने में कठिनाई, सिर दर्द, सिर में तनाव, दांतों में दर्द, आंखों में खुजली एवं सूजन, कानों में दर्द आदि के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। कुछ रोगियों में शाम के वक्त बुखार, कमजोरी, जल्द थकावट, श्वास का फूलना, गले में सूजन एवं खराश आदि के लक्षण भी पाये जाते हैं।
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कुछ रोगियों में सर्दी, जुकाम, एवं नजला प्रतिदिन बनता रहता है। इसका कारण नाक में पैदा करने वाले वायरस होते हैं। इस प्रकार के रोगियों के नाक में कम सूजन होती है। नाक की अतिसंवेदनशीलता के कारण बैक्टीरिया का नाक पर बार-बार हमला होता है। इस बैक्टीरिया में स्टेप्टोकाकस, निमोनिया, हेमोफिलिया, इंफ्लुएंजा आदि को पाया जाता है। नाक में रक्त प्रवाह की कमी के कारण भी यह स्थिति उपस्थित होती है। गर्दन की अकडऩ, सर्वाइकल स्पोण्डोलाइटिस, गर्दन दर्द, सिर दर्द आदि भी रोगियों में पाया जा सकता है।
गर्दन के भीतर से नाक में सायनस तक रक्त संचार अच्छी तरह से न होने पर इन्फेक्शन होने में मदद मिलती हैं। रोगियों के नाक में बैक्टीरिया उत्पन्न होने पर, फंगस का निर्माण होने पर, दमा रोग की संभावाना बढ़ जाती है। कुछ रोगियों में ठण्डी हवा, धूल, शराब, धुआं, आइसक्रीम, कोल्डड्रिंक्स, इत्र, केला, दही, जानवरों के बाल एवं रोएं, एअरकण्डीशनर, आदि से भी यह रोग बढ़ जाता है।
इस रोग में कुछ चुने गये योगाभ्यास करते रहने से लाभ होता है। योगाचार्यों के अनुसार ब्रह्ममुद्रा दस बार, कंधसंचालन दस बार, मार्जरासन दस बार, भुजंगासन दस बार, धनुरासन दस बार, पाश्चात्य प्राणायाम दस बार, उत्तानपादासन दस बार, शवासन 5 मिनट तक, नाड़ी शोधम प्राणायाम दस बार, आदि का अभ्यास योग्य योग गुरू के निर्देशन में करने से लाभ मिलता है।
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इस रोग से पीडि़त रोगियों को कुछ विशेष सुझाव भी दिये जाते हैं जो इस प्रकार हैं
– रोगियों को सोते समय सिर के नीचे तकिया नहीं लगाना चाहिए।
– टी.वी. देखने एवं झुककर पढऩे से परहेज करना चाहिए।
– योगाभ्यास शुरू करने के तीन माह तक एलर्जी बढ़ाने वाले पदार्थों का व्यवहार नहीं करना चाहिए।
– अधिक वजन उठाना एवं अधिक परिश्रम करने से परहेज करना चाहिए।
– तीस मिनट से अधिक योगाभ्यास करने की आवश्यकता नहीं है। इस अवधि का योगाभ्यास ही सायनस के लिए लाभदायक होता है।
– धूम्रपान, शराब , तंबाकू आदि का प्रयोग उपचार की अवधि के दौरान बन्द कर देना चाहिए।-परमानंद परम

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