सही समय पर सही खान-पान, जीवन के लिए वरदान

सही समय पर सही खान-पान, जीवन के लिए वरदान

निश्चित समय पर और आयु व देशकाल के अनुसार खान-पान से शरीर स्वस्थ और निरोग रहता है। दुग्धाश्रित शिशु को संपूर्ण पौष्टिक आहार अपने मां के दुग्ध से मिल जाता है। अन्नप्रासन के पश्चात जब बाह्य खाद्य पदार्थ उसके जीवन का आहार बनता है, तब उसे प्राकृतिक रूप से उपलब्ध सभी खाद्य पदार्थ प्रारंभ में पका कर, मसल कर पेस्ट के रूप में अथवा फलों के रस के रूप में थोड़ा-थोड़ा खिलाते रहना चाहिए।
शिशु का आहार तंत्र पूर्ण विकसित नहीं हुआ रहता इसलिए उसे थोड़ा-थोड़ा निश्चित समय पर चार से अधिक बार आहार देना पड़ता है। शैशवावस्था से युवावस्था अर्थात् 25 वर्ष की आयु तक उसे उसके शरीर निर्माण के साथ-साथ आवश्यक शारीरिक व्यय के लिए अधिक ऊर्जा अर्थात अधिक आहार की आवश्यकता होती है।
25 वर्ष के पश्चात् आहार एक प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से कम करते जाना चाहिए। जिन परिवारों में हृदय रोगी एवं मधुमेह के रोगी हैं, उनके खान-पान में नमक, तेल, घी, मीठा एवं कार्बोहाइड्रेट (चावल, आलू आदि) का उपयोग कम करते जाना चाहिए। सलाद दही, मठा (तक्र) व अंकुरित अनाज द्विदल (दाल) को अपने आहार में अवश्य सम्मिलित करना चाहिए। मिर्च-मसालों का उपयोग संयमित करना चाहिए। पानी पर्याप्त मात्र में पीना चाहिए।
पद यात्र, टहलना, दौडऩा, व्यायाम, एरोबिक, योग-प्राणायाम, ध्यान, साइकिल चलाना में से किसी एक को भी अपने जीवन में अंतिम काल तक अपनाना चाहिए। चालीस वर्ष की आयु के पश्चात अपने आहार में घी, तेल, नमक, मीठे को अत्यंत कम कर देना चाहिए। साठ वर्ष के पश्चात् दाल पतली व बहुत कम प्रयोग करनी चाहिए। सायं काल में फल, सलाद, अंकुरित अनाज, दाल व मात्र दूध लेना चाहिए। दूध सादा व बिना मलाई का हो। फल एवं सलाद खा सकने में असमर्थ हों तो उसका कचुंबर बना लें। अंकुरित अनाज दाल मिक्सी में पीस लें, तब खायें।
मठा (तक्र), सलाद, फल, खट्टे पदार्थ (इमली, नींबू) दूध यथा समय सुविधानुसार खाना चाहिए। दही, मठा (तक्र) दिन में ही खाना चाहिए। नींबू सलाद या अंकुरित अनाज-दाल के साथ या पानी के साथ लेना चाहिए। खट्टे पदार्थ पाचक होते हैं। अंकुरित अनाज-दाल विटामिनों का भंडार है।
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सलाद फल सब्जी में रेशे (फाइबर-फोक) हैं जो किसी भी स्थिति में कब्ज नहीं होने देते। नींबू रक्त वाहिनी को लचीला बनाता है जो हृदय रोग एवं रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) नियंत्रित करता है। लहसुन व प्याज कोलेस्ट्राल को संतुलित करते हैं, व्यायाम एवं पदयात्रा में से किसी भी ऊपर वर्णित प्रकार का दैनिक कार्य हृदय रोग, रक्तचाप एवं मधुमेह नियंत्रित करता है।
मीठा, तेल-घी, लाल मिर्च एवं कार्बोहाइड्रेड (चावल व आलू आदि) कम करने से वजन नहीं बढ़ता व मोटापा नहीं होता। हाथ मुंह पैर धोने के बाद ही भोजन करना चाहिए। इससे भूख खुलकर लगती है। सभी को दोनों समय खाने के पश्चात वज्रासन पांच मिनट करना चाहिए। सौ पग चलना चाहिए। पश्चात् पेशाब करना चाहिए। दिन में खाने के पश्चात कुछ देर वाम कुक्षी (बाई करवट) लेटना चाहिए। रात्रि में खाने के पश्चात कुछ देर कुछ दूर टहलना चाहिए। उपर्युक्त सब क्रिया पाचन तंत्र एवं मूत्र संस्था के निरोगार्थ सहायक हैं। दिन में सोने से कफ, तोंद, मोटापा, वजन बढ़ाना है। रात्रि में बिना मलाई सादा दूध लेने से पेट साफ होता है। नींद अच्छी आती है। कैल्शियम की पूर्ति होती है।
निश्चित समय पर भोजन का व्यापक महत्त्व है। विलम्ब से भोजन करने पर आहार पचाने वाली अग्नि को वायु नष्ट कर देती है। जठराग्नि मंद हो जाती है। शरीर टूटने लगता है। अरूचि उत्पन्न होती है। ऊंघ आने लगती है। आंखें कमजोर हो जाती हैं। शक्ति का नाश होता है जिससे कठिनाई से भोजन पचता है। भूख लगने पर ही निश्चित समय पर खाना खाना चाहिए। प्यास लगने पर पानी अवश्य पीना चाहिए। समय से पूर्व भोजन करने पर सिरदर्द, अजीर्ण, विशूचिका, विलंबिका आदि रोग होते हैं, अत: पचास काम छोड़कर समय भोजन पर करना चाहिए और सौ काम छोड़कर शौच-पेशाब को जाना चाहिए।
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भोजन ठंडा, बासी व रूखा न हो। भोजन से पूर्व एवं पश्चात् एक घंटा तक पानी नहीं पिएं। पूर्व पानी पीने पर जठराग्नि मंद हो जाती है। भूख खुलकर नहीं लगती, पाचन देरी से होता है। भोजन के तत्काल पश्चात् पानी पीने पर पाचन प्रभावित होता है, अपच होता है। कफ बनता है। थोड़ा सा पानी भोजन के बीच में पीने पर वह अमृत के समान है।
सलाद भोजन से पूर्व खाने पर वजन व मोटापा नहीं बढ़ता। सदैव भूख से एक चौथाई कम भोजन करना चाहिए। भोजन अत्यधिक गर्म न हो। पानी अत्यधिक ठंडा न हो। ये दोनों स्वास्थ्य हेतु अहितकर हैं। प्रात: उठते ही तीन चार गिलास बासी पानी जो तांबे के पात्र में रखा हो, पीना चाहिए। इससे पाचन तंत्र की संपूर्ण सफाई होती है, कब्ज नहीं होता।
बाजारू खाद्य पदार्थों के भ्रमजाल में न पड़ें। तेज प्रकाश एवं अधिक टीवी कंप्यूटर से बचें। मुंह में पानी भरकर तीन-चार बार आंखों व मुंह को धोएं। इससे आंखों की रोशनी बनी रहेगी।
सभी फल सब्जी धोकर पकाएं, खाएं। जो बिना छिलका निकाले खाए, पकाए जा सकते है उसका वैसा ही उपयोग करें। सभी खाद्य पदार्थों का छोटा छोटा कौर (निवाला) पर्याप्त चबा चबा कर खाएं। सदैव एक जैसे खाद्य पदार्थ न लें। ऋतु व उपलब्धि अनुसार बदल बदल कर लें। इससे किसी पौष्टिक तत्व की कमी व अधिकता नहीं होगी। दांत का काम आंत से नहीं लें। किसी भी स्थिति में कब्ज न होने दें।
मोटापा, वजन व तोंद (पेट) न बढ़े। ये सब रोगों के घर हैं। कब्ज होने पर पोषण पदार्थ पूर्तिकर्ता पेट का काम प्रभावित होता है। मोटापा, वजन व तोंद (पेट) बढऩे पर जीवन आधार हृदय पर अधिक भार पड़ता है। सभी दृष्टि से समय एवं संयम का पालन करें और आजीवन स्वस्थ रहें।
– सीतेश कुमार द्विवेदी

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