सर्वेक्षण के बाद किया गया चौंकाने वाला खुलासा….वेतन निर्धारण में होता है महिलाओं के साथ भेदभाव

सर्वेक्षण के बाद किया गया चौंकाने वाला खुलासा….वेतन निर्धारण में होता है महिलाओं के साथ भेदभाव

नई दिल्ली। समानता का अधिकार देने एवं कार्यस्थल पर भेदभाव नहीं होने देने की सरकार की कोशिश के बावजूद देश में पुरूषों की तुलना में महिला कर्मचारियों को औसतन 25 फीसदी कम वेतन दिया जाता है और वेतन निर्धारण में अब भी लिंग भेद का बोलबाला है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मद्देनजर ऑनलाइन नौकरी एवं नियुक्ति समाधान प्रदाता कंपनी मॉन्स्टर इंडिया द्वारा आज यहां जारी लिंग आधारित मॉन्स्टर वेतन सूचकांक में यह दावा किया गया है। इसके जरिये वुमन ऑफ इंडिया इंक सर्वेक्षण के निष्कर्षों का खुलासा किया गया है, जिसमें दो हजार से अधिक कामकाजी महिलाओं ने भाग लिया। रिपोर्ट में कहा गया है कि वेतन में लिंग आधारित अंतर अभी बरकरार है। वर्ष 2016 के इस सर्वेक्षण से पता चलता है कि अभी भारत में वेतन में लिंग आधारित अंतर 25 फीसदी है। वर्ष 2016 में देश में पुरुषों की औसत प्रतिघंटा कुल कमाई 345.80 रुपये थी, वहीं महिलाओं की कमाई महज 259.80 रुपये थी। यह अंतर 2015 के 27.2 प्रतिशत से दो प्रतिशत कम है लेकिन वर्ष 2014 के 24.1 प्रतिशत से अधिक है। हालांकि इसके बावजूद 53.9 प्रतिशत महिलाएँ संतुष्ट से लेकर आंशिक तौर पर संतुष्ट दिखीं हैं तथा उनका मानना है कि उनके लिए और ज्यादा अवसर होने चाहिए। ज्यादा समावेशी वातावरण तैयार करने के लिए समान वेतन और नये प्रस्तावों पर चर्चाओं के बावजूद 62.4 प्रतिशत महिलाओं का सोचना है कि उनके समकक्ष पुरुषों को पदोन्नति के ज्यादा अवसर उपलब्ध हैं और पदोन्नति का निर्णय करने में अन्य मानदंडों के साथ साथ लिंग को भी तरजीह दिया जाता है। इसमें कहा गया है कि विनिर्माण उद्योग में पुरूष एवं महिलाओं के वेतन में 29.9 प्रतिशत का अंतर पाया गया है। इसमें 2015 की तुलना में 5 प्रतिशत का सुधार हुआ है।
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इसके बाद आईटी उद्योग में भी यह अंतर 25.8 प्रतिशत रहा है। बैंकिंग, वित्तीय सेवा एवं बीमा (बीएफएसआई) उद्योग में वेतन का लैंगिक अंतर 21.5 फीसदी पायी गयी है। शिक्षा एवं अनुसंधान उद्योग में औसत लिंग-आधारित वेतन अंतर 14.7 प्रतिशत है। एशिया प्रशांत, पश्चिम एशिया तथा मॉन्स्टर इंडिया के प्रबंध निदेशक संजय मोदी ने यह सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि भारत में लिंग आधारित वेतन अंतर वास्तविक है तथा पूरे देश में कार्पोरेट क्षेत्र में औसतन यह 25 प्रतिशत है। इस अंतर को पाटने के लिए कारगर उपाय किये जाने की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण, नौकरियाँ एवं निर्णय निर्धारण के माध्यम से ढाँचागत बाधाओं को दूर करना जरूरी है। सर्वेक्षण में दिल्ली एनसीआर से सबसे अधिक यानी 15 प्रतिशत महिलाओं ने इसमें भाग लिया, जिसके बाद मुम्बई और बेंगलुरू से 12-12 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी रही। गैर मेट्रो शहरों की भागीदारी 35 फीसदी थी। सर्वेक्षण के नतीजों के अनुसार महिलाओं के काम करने के पीछे पारिवारिक आमदनी में योगदान करना सबसे बड़ा कारण बताया गया है। हालांकि 25.1 प्रतिशत ने नौकरी करने का कोई कारण नहीं बताया।
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रिपोर्ट के अनुसार लगभग 43.7 प्रतिशत महिलाएं महसूस करती हैं कि लैंगिक समानता उनके संगठन के लिए शीर्ष प्राथमिकता नहीं है। 68.5 प्रतिशत महिलाओं का कहना था कि लैंगिक समानता भले ही एक प्राथमिकता हो लेकिन प्रबंधन इसे महत्व नहीं देता और परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं आया है। इससे संकेत मिलता है कि इस अंतर को पाटने के लिए भारतीय कॉर्पोरेट जगत को जागने और व्यावहारिक नीतियाँ लागू करने की आवश्यकता है। श्री मोदी ने कहा कि काम के प्रति महिलाओं के समर्पण, पारिवारिक जिम्मेदारियों के प्रति लगाव, लंबे घंटों तक काम करने वाली महिलाओं की सामाजिक धारणा आदि जैसी चुनौतियों से महिलाओं की प्रगति बाधित होती है। लैंगिक विविधता के प्रति संवेदनशीलता का निर्माण और न्यायोचित एवं समावेशी कामकाजी माहौल तैयार करने की जरूरत है। सर्वेक्षण में अधिकांश 97.2 प्रतिशत महिलाओं के पास 1 से 10 वर्षों का कामकाजी अनुभव है और उनमें से बड़ी संख्या यानी 60.2 प्रतिशत 1 से 3 वर्षों से नौकरी में हैं तथा 10 वर्षों से अधिक समय से काम करने वाली महिलाओं का अनुपात केवल 2.7 प्रतिशत है। लगभग 13.1 प्रतिशत महिलाओं का मानना है कि कामकाजी महिलाओं के लिए उचित शिशुपालन के वास्ते समय का अभाव सबसे बड़ी समस्या है। घर से काम करने की सुविधा या कार्यस्थल पर शिशुपालन की व्यवस्था से इसका समाधान निकाला जा सकता है। 78.1 प्रतिशत महिलाएँ नौकरी का चुनाव करते समय सुरक्षा को मुख्य मुद्दा मानती हैं। भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र की महिलाओं ने रात की पाली में काम करने के प्रति अनिच्छा व्यक्त की और 66.4 प्रतशित से ज्यादा इसे असुरक्षित मानती हैं तथा रात की पाली से बचना चाहती हैं। हालाँकि 62.7 फीसदी का सुझाव है कि संगठनों द्वारा अल्पकालिक आत्मरक्षात्मक प्रशिक्षण दी जानी चाहिए।

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