समान आचार संहिता पर हाय तौबा

समान आचार संहिता पर हाय तौबा

 muslim women न तलाक, बहु विवाद, मुस्लिम महिलाओं के भरण पोषण से मनाही और हलाला जैसी परम्पराओं पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सम्बंधित पक्षों की राय लेने पर ही कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कथित सैक्युलर नेताओं द्वारा जिस तरह की हाय तौबा की जा रही है, वह बेहद शर्मनाक है। इन लोगों द्वारा दी गई प्रतिक्रियाएं महिला विरोधी, मुस्लिम विरोधी, मानवता विरोधी और संविधान विरोधी हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही का राजनीतिकरण तो किया ही है, उन्होंने देश को तोडऩे की धमकी देकर देश को ब्लैकमेल करने का दुस्साहस भी किया है। उन्होंने इस्लाम खरते में है का नारा देकर जिन्ना की तरह मुस्लिम समाज में अलगाव का बीज पैदा करने का प्रयास भी  किया है।
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 ढोंगी सैक्युलर नेताओं द्वारा कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं का साथ देने से उनके महिला विरोधी और संविधान विरोधी चेहरे का पर्दाफाश हो गया है। अब यह स्पष्ट हो गया है कि चंद मुस्लिम वोटों के लिए वे अब तक जो राजनीति करते रहे हैं, उनके द्वारा वे मुस्लिम समाज का कोई फायदा नहीं कर रहे थे अपितु उनको पिछड़ा रखकर वे अपना उल्लू सीधा कर रहे थे। एक महिला नेता ने जिस प्रकार महिलाओं को प्रताडि़त करने वाली इन परम्पराओं की रक्षा में ताल ठोका है, उससे यह स्पष्ट हो गया है कि वामपंथ किसी प्रगतिशीलता और महिला अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ा होने वालों का नाम नहीं है। महिला उत्पीडऩ ही इनका असली चरित्र है। चंद मुस्लिम वोटों के लिए वे मुस्लिम समाज को पिछड़ा बनाये रखने के षड्यंत्र में बराबर के भागीदार है। वृंदा करात तो स्वयं महिला होते हुए भी महिला उत्पीडऩ में सहायक बन रही है, इससे अधिक विभीषिका क्या हो सकती है।समान आचार संहिता पर राय लेने का काम भी लॉ कमीशन द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अंतर्गत किया जा रहा है। इसके लिए भारत का संविधान स्पष्ट आदेश देता है और सर्वोच्च न्यायालय कई बार अपने निर्णयों में इसके लिए कह चुका है। राष्ट्रीय महत्व के इस विषय का राजनीतिकरण करके ये सभी लोग न केवल सर्वोच्च न्यायालय का अपमान कर रहे हैं अपितु संविधान की अवहेलना भी कर रहे हैं।
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 संविधान निर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर के विचार इस संबंध में क्या थे, किसी से छिपे नहीं है। समान आचार संहिता का विरोध कर रहे ये लोग डा. भीमराव अम्बेडकर के अपमान करने का अक्षम्य अपराध भी कर रहे हैं। वे बार-बार गलत प्रचार कर रहे हैं कि केंद्र सरकार हिंदू एजेंडा थोपना चाहती है, अब मुस्लिम समाज को हिंदू कानून मानने पड़ेगे। वे यह तथ्य क्यों छिपाना चाहते हैं कि यह कार्यवाही मा. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर हो रही है। क्या वे यह कहना चाहते है कि न्यायपालिका केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रही है? क्या इस वर्ग का भारत की न्यायपालिका पर भी विश्वास नहीं है? जब भी इनके मनोनुकूल काम नहीं होता, ये इसी प्रकार न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा करने का महापाप करते हैं। याकूब मामले में इनके दुष्प्रचार सबके ध्यान में है ही। ये मुस्लिम समाज के मन में अविश्वास का निर्माण कर उसे किस मार्ग पर ले जा रहे हैं? इन सब लोगों को समझ लेना चाहिए कि 50 प्रतिशत मुस्लिम आबादी अब प्रताडऩा के नरक से बाहर आना चाहती है। अब मुस्लिम समाज में भी सुधार की चाह पैदा हो रही है। वे इस बाधित न करें। यह सुधार मुस्लिम समाज के हित में है। गोआ में पहले से ही समान आचार संहिता है। वहां अभी तक कोई कठिनाई नहीं है तो शेष भारत में क्यों हो सकती है? (विनायक फीचर्स)आप ये ख़बरें और ज्यादा पढना चाहते है तो दैनिक रॉयल unnamed
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