सबसे ज्यादा गरीब भारत में हैं.. दुनिया में हर तीसरा गरीब भारतीय है !

सबसे ज्यादा गरीब भारत में हैं.. दुनिया में हर तीसरा गरीब भारतीय है !

  कुछ समय पहले विश्व बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब लोग भारत में हैं। ‘गरीबी व साझा खुशहाली’ नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक साल 2013 में भारत की 30 फीसदी आबादी की औसत आमदनी 1.90 अमेरिकी डॉलर यानी तकरीबन 126 रूपए रोज से भी कम थी, इसलिए दुनिया में हर तीसरा गरीब भारतीय है।
ताजा जारी विश्व भूख सूचकांक या ग्लोबल हंगर इंडेक्स(जीएचआई) के अनुसार भारत की स्थिति अपने पड़ोसी मुल्क नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और चीन से बदतर है। यह सूचकांक हर साल अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान(आईएफपीआरआई) जारी करती है जिससे दुनिया के विभिन्न देशों में भूख और कुपोषण की स्थिति का अंदाजा लगता है। दिल्ली, मुंबई वगैरह कुछ शहरों में आसमान छूती इमारतें, चिकनी सड़कें, लंबे फ्लाई ओवरों और बिजली की चकाचौंध से लगता है कि हमारा देश तेजी से बदल रहा है लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ अधूरा पहलू है जो सरकारें दिखाती हैं। दीया तले का असल अंधेरा तरक्की पर तमाचा व गरीबी दूर करने के खोखले नारों व स्कीमों का कड़वा सच है।
सौंदर्य वृद्धि के लिए कोई जरूरी नहीं है महंगे संसाधन..सुंदरता के लिए हंसना है जरूरी..!

गरीबी हटाने के नाम पर केंद्र व राज्यों की बहुत सी सरकारी स्कीमें हैं लेकिन खामी यह रही कि गरीबी की वजहों पर पूरा ध्यान ही नहीं दिया गया। किसी मसले को हल करने की कोशिश ही नहीं की गई। सरकारी लोगों को यह सोचने की फुर्सत ही कहां है। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने जब देश में गरीबों की संख्या की गणना के लिए सुरेश तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट को आधार बनाया, तब उसकी खूब किरकिरी हुई थी।
तेंदुलकर समिति ने मोटे तौर पर विश्व बैंक की गरीबी मापने की कसौटी को आधार बनाया था। इसके तहत तब क्रयशक्ति समतुल्यता(परचेजिंग पॉवर पैरिटी) को ध्यान में रखते हुए 1.25 डॉलर प्रतिदिन खर्च क्षमता को गरीब होने या न होने का पैमाना समझा गया था तो तेंदुलकर समिति ने फॉर्मूला दिया कि गांवों में रोज 27 और शहरों में 31 रूपए खर्च क्षमता से नीचे के व्यक्ति ही गरीब माने जाएंगे। लाजिमी था कि इसे असंवेदनशील बताया गया। उचित सवाल उठा कि आखिर इस रकम में एक व्यक्ति वस्तुओं और सेवाओं का कितना उपभोग कर सकता है?
लेकिन इसी के आधार पर यूपीए सरकार ने एलान किया कि देश में अब महज 21 फीसदी यानी 27 करोड़ लोग गरीब हैं। उचित ही इसकी व्यापक आलोचना हुई। तब पूर्व सरकार ने अर्थशास्त्री आर.रंगराजन की अध्यक्षता में नई समिति बनाई। रंगराजन समिति ने मौजूदा सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। उसमें शहरों में 47 और गांवों में 32 रूपए रोज खर्च क्षमता को गरीब रेखा मानने की सिफारिश की गई। इस पैमाने पर अभी 36 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे आएंगे।
विकासशील देशों की बात जाने दें, हमारे देश के हालात तो अफ्रीका के घोर गरीब राष्ट्र नाइजर, चाड, सिएरा लिओने से भी गए गुजरे हैं। बेशक एक ओर मोबाइल फोन, कंप्यूटर और गाडिय़ों की गिनती तेजी से बढ़ रही है, वहीं इसके उलट दूसरी ओर दिल दहलाने वाली घटनाएं मीडिया में आ रही हैं। मसलन, पिछले दिनों एक गरीब 12 किलोमीटर तक अपनी पत्नी की लाश को कंधे पर ढोने को मजबूर हुआ तो दूसरे को कूड़े के ढेर में आग लगा कर लाश का क्रियाकर्म करना पड़ा।
अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है शांत नींद..!

आर्थिक विकास के तमाम दावों के बावजूद आज भी देश की 22 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। एक वक्त था जब यह समझा जाता था कि तेज आर्थिक विकास के भरोसे गरीबी और भुखमरी को समाप्त किया जा सकता है लेकिन फिलवक्त जीडीपी को किसी देश की खुशहाली का पैमाना नहीं माना जाता। एक ओर नेता, अफसर, कारोबारी व धर्म के धंधेबाज चांदी काट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गांव, कस्बों, पहाड़ी, रेतीले इलाकों, मलिन बस्तियों व झोंपड़ पटिट्यों में रहने वाले गरीब जानवरों से बदतर जिंदगी जी रहे हैं।
वे दो जून की रोटी, तन ढकने के लिए कपड़ा व सिर छिपाने के लिए टूटे छप्पर या खपरैल जैसी बुनियादी जरूरतें भी आसानी से पूरी नहीं कर पाते। यह गरीबों के साथ सरासर नाइंसाफी नहीं तो और क्या है? भारत को बाजार आधारित खुली अर्थव्यवस्था अपनाए चौथाई सदी बीत चुकी है। इस दौरान देश की जीडीपी अच्छी-खासी रही है। आज भारत को दुनिया का सातवां सबसे अमीर देश गिना जाता है। हमारी प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय बढ़ कर 88,533 रूपए हो चुकी है लेकिन अमीर और गरीब आदमी की आमदनी का अंतर भी पहले से कहीं अधिक है।
सरकारी इश्तिहारों में भले ही खुशहाली के दावे किए जाते रहे हों लेकिन गरीबों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। शहरी गरीबों के लिए तो आवास मंत्रालय है लेकिन गंवई गरीबों के हालात ज्यादा खराब हैं। उनके लिए बसावट, तालीम, इलाज, सफर व इंसाफ सब टेढ़ी खीर हैं। सहूलियतें सिर्फ अमीरों के हिस्से में हैं। गरीब हर कदम पर धक्के खाते हैं। गरीब वह गाय है जिसे नेता, सरकारी मुलाजिम व दाढ़ी-चोटी वाले सब बड़े आराम से दुहते हैं और फिर कचरा खाने के लिए उसके हाल पर खुला छोड़ देते हैं।
वोट, घास व चढ़ावा ऐंठने के लिए अपने-अपने मतलब से गरीबों से फायदा सब उठाते हैं लेकिन गरीबों की समस्याओं पर कभी कोई ध्यान नहीं देता।
सब गरीबों की अनदेखी करते हैं क्योंकि सब अमीर यही चाहते हैं कि गरीबों की गिनती बढ़ती रहे ताकि वे उनका शिकार करते रहें। इसका नतीजा यह है कि दुनिया में सबसे ज्यादा गरीब भारत में हैं। गरीबों को रोजगार के मौके व उनकी आमदनी बढ़ाने व उन्हें सस्ता अनाज मुहैय्या कराने पर जोर दिया गया, मनरेगा वगैरह योजनाओं में पानी की तरह पैसा बहाया गया लेकिन ये सारे उपाय ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुए क्योंकि इन स्कीमों का एक बड़ा हिस्सा दूसरे खा गए।
– नरेंद्र देवांगन

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