सनातन धर्म की अनमोल देन है ‘गुरु-शिष्य परंपरा’

सनातन धर्म की अनमोल देन है ‘गुरु-शिष्य परंपरा’

सर्व संप्रदायों में गुरुपूर्णिमा उत्सव मनाया जाता है। यहां पर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि गुरु एक तत्व है। गुरु देह से भले ही भिन्न-भिन्न दिखाई देते हों; परंतु गुरुतत्व तो एक ही है । संप्रदायों के साथ ही विविध संगठन तथा पाठशालाओं में भी गुरुपूर्णिमा महोत्सव श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। इस वर्ष सनातन संस्था एवं हिन्दू जनजागृति समिति द्वारा उज्जैन के क्षीरसागर स्थित महाराष्ट्र समाज में रविवार, 9 जुलाई को शाम 5.30 से 7.30 भजे तक गुरुपूर्णिमा महोत्सव का कार्यक्रम हो रहा है। इस महोत्सव के निमित्त सनातन संस्था निर्मित ‘त्यौहार , धार्मिक उत्सव एवं व्रत’ इस ग्रंथ से संकलित गुरुपूर्णिमा की जानकारी यहां दे रहे हैं। संत गुलाबराव महाराज से किसी पश्चिमी व्यक्ति ने पूछा, ‘भारत की ऐसी कौनसी विशेषता है, जो न्यूनतम शब्दों में बताई जा सकती है ?’ तब महाराजजी ने कहा, ‘गुरु-शिष्य परंपरा’। इससे हमें इस परंपरा का महत्त्व समझ में आता है। ऐसी परंपरा के दर्शन करवाने वाला पर्व युग-युग से मनाया जा रहा है, वह है, गुरुपूर्णिमा! गुरुदेव वे हैं, जो साधना बताते हैं, साधना करवाते हैं एवं आनंद की अनुभूति प्रदान करते हैं। गुरु का ध्यान शिष्य के भौतिक सुख की ओर नहीं, अपितु केवल उसकी आध्यात्मिक उन्नति पर होता है। गुरु ही शिष्य को साधना करने के लिए प्रेरित करते हैं, चरण दर चरण साधना करवाते हैं, साधना में उत्पन्न होनेवाली बाधाओं को दूर करते हैं, साधना में टिकाए रखते हैं एवं पूर्णत्व की ओर ले जाते हैं। गुरु के संकल्प के बिना इतना बड़ा एवं कठिन शिव धनुष उठा पाना असंभव है। इसके विपरीत गुरु की प्राप्ति हो जाए, तो यह कर पाना सुलभ हो जाता है। श्री गुरुगीता में ‘गुरु’ संज्ञा की उत्पत्ति का वर्णन इस प्रकार किया गया है,
गुकारस्त्वन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते । अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशय: ।।
अर्थ : ‘गु’ अर्थात अंधकार अथवा अज्ञान एवं ‘रु’ अर्थात तेज, प्रकाश अथवा ज्ञान । इस बात में कोई संदेह नहीं कि गुरु ही ब्रह्म हैं जो अज्ञान के अंध:कार को दूर करते हैं । इससे ज्ञात होगा कि साधक के जीवन में गुरु का महत्त्व अनन्य है । इसलिए गुरुप्राप्ति ही साधक का प्रथम ध्येय है । गुरुप्राप्ति से ही ईश्वरप्राप्ति होती है अथवा ऐसे कह सकते है कि गुरुप्राप्ति होना ही ईश्वरप्राप्ति है, ईश्वरप्राप्ति अर्थात मोक्षप्राप्ति – मोक्षप्राप्ति अर्थात निरंतर आनंदावस्था । गुरु हमें इस अवस्था तक पहुंचाते हैं। शिष्य को जीवनमुक्त करनेवाले गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए गुरुपूर्णिमा मनाई जाती है।
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आषाढ शुक्ल पूर्णिमा को गुरुपूर्णिमा एवं व्यासपूर्णिमा कहते हैं। गुरुपूर्णिमा गुरुपूजन का दिन है । गुरुपूर्णिमा का एक अनोखा महत्व भी है। अन्य दिनों की तुलना में इस तिथि पर गुरुतत्व सहस्र गुना कार्यरत रहता है। इसलिए इस दिन किसी भी व्यक्ति द्वारा जो कुछ भी अपनी साधना के रूप में किया जाता है, उसका फल भी उसे सहस्र गुना अधिक प्राप्त होता है।
इस दिन गुरु-स्मरण करने पर शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति होने में सहायता होती है। इस दिन गुरु का तारक चैतन्य वायुमंडल में कार्यरत रहता है। गुरुपूजन करने वाले जीव को इस चैतन्य का लाभ मिलता है। गुरुपूर्णिमा को व्यासपूर्णिमा भी कहते हैं, गुरुपूर्णिमा पर सर्वप्रथम व्यासपूजन किया जाता है। एक वचन है – व्यासोच्छिष्टम् जगत् सर्वंम् । इसका अर्थ है, विश्व का ऐसा कोई विषय नहीं, जो महर्षि व्यासजी का उच्छिष्ट अथवा जूठन नहीं है अर्थात कोई भी विषय महर्षि व्यासजी द्वारा अनछुआ नहीं है। महर्षि व्यास ने चार वेदों का वर्गीकरण किया । उन्होंने अठारह पुराण, महाभारत इत्यादि ग्रंथों की रचना की है। महर्षि व्यासजी के कारण ही समस्त ज्ञान सर्वप्रथम हम तक पहुंच पाया। इसीलिए महर्षि व्यास को ‘आदिगुरु’ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि उन्हीं से गुरु-परंपरा आरंभ हुई। आद्यशंकराचार्य को भी महर्षि व्यास का अवतार मानते हैं।
किसी विषय वस्तु का त्याग करने से उसके प्रति व्यक्ति की आसक्ति घट जाती है। तन के त्याग से देहभान भी क्षीण होता है एवं देह ईश्वरीय चैतन्य ग्रहण कर पाती है। मन के त्याग से मनोलय होता है तथा विश्वमन से एकरूपता साध्य होती है। बुद्धि के त्याग से व्यक्ति की बुद्धि विश्वबुद्धि से एकरूप होती है तथा वह ईश्वरीय विचार ग्रहण कर पाता है। त्याग के माध्यम से गुरु व्यक्ति के लेन-देन को घटाते हैं । तन, मन एवं बुद्धि की तुलना में धन का त्याग करना साधक तथा शिष्य के लिए सहज सुलभ होता है।
त्याग के संबंध में कहा जाए, तो गुरु को कितना धन अर्पण किया है इसकी अपेक्षा अपने पास कितना धन शेष रखा है, यही महत्त्वपूर्ण होता है। जैसे कोई व्यक्ति एक लाख रुपयों में से दस हजार रुपये अर्पण करे एवं दूसरा व्यक्ति पचास रुपयों में से सारे पचास रुपये गुरु को अर्पण करे, तो इसमें पूरे पचास रुपये अर्पण करने का महत्त्व अधिक है। अंत में गुरु के चरणों में शिष्य को अपना सर्वस्व अर्पण करना होता है। ऐसा करने की सिद्धता होनी चाहिए। सत्सेवा करने से तन का त्याग होता है, नामजप करने से मन का त्याग होता है, तथा बुद्धि का उपयोग कर गुरुकार्य भावपूर्ण एवं परिपूर्ण करने से बुद्धि का त्याग होता है। आप भी किसी संत, गुरु अथवा आध्यात्मिक संस्था द्वारा आयोजित गुरुपूर्णिमा महोत्सव में सहभागी होकर तन, मन, बुद्धि एवं धन का यथासंभव त्याग कीजिए तथा गुरु-तत्व का पूरा लाभ ग्रहण कीजिए।
-आनंद जाखोटिया

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