सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण द्वारा ही संभव है संपूर्ण उपचार

सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण द्वारा ही संभव है संपूर्ण उपचार

व्यक्ति का मानस या मन एक उद्यान की तरह होता है जिसे चाहे तो आप अपनी सूझ-बूझ से सजाएँ-सँवारें या उसे जंगली बन जाने दें। चाहे आप उद्यान को उर्वर बनाएँ अथवा उसे जंगली बन जाने दें मगर उसमें कुछ न कुछ तो उगेगा ही। यदि आप उद्यान में अच्छी प्रजाति के उपयोगी बीज अथवा पौधों का रोपण नहीं करेंगे तो बहुत से अनुपयोगी पौधे एवं खर-पतवार स्वयंमेव उग आएँगे और उनकी वृद्धि भी होती ही रहेगी।
मन में स्वस्थ सकारात्मक विचारों का जो बीजारोपण सप्रयास किया जाता है अथवा अनचाहे नकारात्मक या ध्वंसात्मक विचारों का बीजारोपण हो जाने से रोका नहीं जाता तो वे विचार रूपी बीज उसी प्रकार के पौधे उगाएँगे और उसी प्रकार के फूल-फल भी आएँगे और देर-सबेर आप तदनुरूप कुछ न कुछ क्रिया करेंगे। अच्छे विचार बीजों के अच्छे सकारात्मक व स्वास्थ्यप्रद तथा बुरे विचार बीजों के बुरे, नकारात्मक व घातक फल आपको वहन करने ही पड़ेंगे।
उपचार की सारी प्रक्रिया में हमारे मन का अवचेतन भाग सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब हमारे अवचेतन मन में कोई विचार, कोई खय़ाल आता है या डाल दिया जाता है तो हमारा अवचेतन मन उसे बिना किसी तर्क-वितर्क के स्वीकार कर लेता है और सीधे मस्तिष्क को आदेश दे डालता है। मस्तिष्क की कोशिकाएँ जिन्हें न्यूरोंस कहा जाता है, फौरन इस दिशा में सक्रिय हो जाती हैं और हमारे विचार को कार्यरूप में परिणित कर डालती हैं।
वैसे भी हमारा स्वास्थ्य हमारे मस्तिष्क की कोशिकाओं की उच्च प्राथमिकता होता है। जैसे ही हम मन द्वारा मस्तिष्क की इन कोशिकाओं की उत्तम स्वास्थ्य अथवा रोग-मुक्ति के लिए प्रोग्रामिंग करते हैं, ये अतिशीघ्रता से सक्रिय होकर अपने कार्य को सम्पन्न करती है अर्थात् हमें आरोग्य प्रदान करती है, हमारा उपचार करती है।
मायर्स कहते हैं कि अवचेतन मन केवल कूड़े-कचरे का ढेर नहीं है अपितु यह सोने की खान भी है।
आप हमेशा युवा बनी रह सकती हैं…जानिए कैसे..?

‘रोग के कारण चित्त और आत्मा के अन्तराल में ही निवास करते प्रतीत होते हैं। अपने जीवन की स्थितियों में परिवर्तन लाने के लिए जीवन दृष्टि में बदलाव लाने की आवश्यकता है क्योंकि जैसा आप साचेंगे, वैसे ही आप बनते चले जाएँगे। अध्यात्म विज्ञान के अनुरूप यदि वास्तव में सभी कुछ चित्त से ही दिशा निर्देशित होता है तो हम अपने चित्त में जो दृष्टिपथ अंकित करेंगे, वही तो भौतिक स्तर पर प्रकट होगा। यदि हम अपने चित्त में प्रेम और आभार के विचार जगाएँगे तो तदनुसार जीवन भी प्रेम और स्मृद्धि से भरपूर रहेगा।
मानव मन एक कम्प्यूटर की तरह काम करता है। इसमें जो डालोगे, वही बाहर निकलेगा। अच्छे विचार मस्तिष्क को स्वास्थ्यप्रद हार्मोंस उत्सर्जित करने के लिए प्रेरित करते हैं तथा बुरे विचार मस्तिष्क को व्याधिजनक हार्मोंस उत्सर्जित करने के लिए प्रेरित करते हैं। विचार हम पर शासन करते हैं लेकिन हम विचारों पर शासन कर सकते हैं। विचारों पर शासन करने का तरीक़ा है विचारों का चुनाव करना। विचार समाप्त नहीं किये जा सकते लेकिन अच्छे विचारों का चुनाव संभव है। बुरे विचारों से छुटकारा संभव है लेकिन तभी जब अच्छे विचार, स्वस्थ सकारात्मक विचार भी हों।
अत: स्वस्थ-सकारात्मक विचारों से मन को आप्लावित रखें। बुरे विचारों के लिए मन में स्थान ही नहीं बचेगा और वे प्रभावित ही नहीं कर सकेंगे। स्वस्थ-सकारात्मक विचारों को प्रभावित करने दीजिए और उनका प्रभाव देखिए। आज ही किसी एक सकारात्मक विचार को हावी होने दीजिए। उस विचार का कल्पना चित्र बनाइए और उसमें खो जाइए। बार-बार लगातार इसे दोहराते रहिए, लाभ होगा। एक तरीक़ा आपके हाथ आ जाएगा।
अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के भाषाविद् जॉन ग्रिंडर तथा कम्प्यूटर विशेषज्ञ रिचर्ड बैंडलर द्वारा विकसित न्यूरो लिंग्विस्टिक प्रोग्रामिंग कहती है कि विश्वास के ऊपर ही निर्भर है सुख-दुख, सफलता-असफलता, शांति-क्रोध तथा क्रिया एवं कर्म का स्तर। विश्वास उपजता है मन में। मन की शक्ति द्वारा ही हम शिक्षा, खेल-कूद, संगीत-नृत्य, उद्योग-व्यवसाय, व्यक्तित्व विकास तथा चिकित्सा एवं उपचार के क्षेत्र में असाधारण सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इसी के द्वारा कैंसर तक के रोगी को ठीक किया जा सकता है अथवा शरीर के टूटे हुए अंग का उपचार किया जा सकता है।
सकारात्मक सोच, सकारात्मक इच्छा, सकारात्मक विश्वास तथा सकारात्मक आकांक्षा ये सभी तत्व हमारे अच्छे स्वास्थ्य के निर्माण के महत्त्वपूर्ण घटक हैं। जो व्यक्ति जीवन में इन तत्वों पर आधारित सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण अपनाता है वह शायद ही बीमार होता हो। स्वस्थ होने का अनुभव मात्र स्वास्थ्य उत्पन्न करता है तथा समृद्धि का अनुभव समृद्धि।
मेरे प्रिय मित्र इस समय आप अपने मन में क्या अनुभव कर रहे हैं? इस समय आप अपने मन में जो अनुभव कर रहे हैं आप वही तो हैं। विश्वास नहीं आता तो मन में व्याप्त अनुभव अथवा विचार को बदलकर देख लीजिए। हर अनुभव के साथ आप बदल जाते हैं। आपके अनुभव अथवा विचार ही आपको अच्छा या बुरा बनाते हैं।
अभाव और सम्पन्नता दोनों अनुभव हैं। अभाव का अनुभव खऱाब तथा सम्पन्नता का अनुभव अच्छा ही हो यह ज़रूरी नहीं। हर अनुभव में आनंद प्राप्त करने का प्रयास होना चाहिए। अनुभव अच्छा या बुरा नहीं होता यह तो हमारी सोच का परिणाम मात्र है। सोच बदलने से परिणाम बदल जाता है जिसे आप हार या असफलता समझते हैं वो जीत या सफलता में बदल जाती है। विषम परिस्थितियों में जीवन-यापन, यात्रा अथवा खानपान का अनुभव आप चाहें तो कष्टप्रद हो सकता है और आपके चाहने पर ही रोमांचक तथा प्रेरणास्पद हो सकता है।
बच्चों में बढ़ रहा है हार्ट अटैक..!

विशेषज्ञ कहते हैं कि जो सुखी हैं, संतुष्ट हैं अथवा ऐसा अभिनय करते हैं उनकी उम्र भी अधिक होती है। जीवन एक नाटक ही तो है। वास्तविक जीवन में न जाने कितना अभिनय करना पड़ता है। कभी हम अमीर बनने का अभिनय करते हैं तो कभी गरीब बनने का, कभी स्वस्थ दिखने का तो कभी रुग्ण होने का।
छुट्टी लेने के लिए लोग प्राय: अपनी या परिवार के अन्य सदस्यों की बीमारी का बहाना बनाते हैं और एक ऐसी कहानी गढ़ते हैं कि छुट्टी देने वाला विवश हो जाता है लेकिन जो कहानी गढ़ी गई, जो कल्पना की गई, जो भाव चेहरे पर उत्पन्न किये गए, वे भाव सबसे पहले मन में उत्पन्न हुए। जो कल्पना की गई वो भी मन में उत्पन्नप हुई। और जो विचार मन में उठे वो वास्तविक जीवन में घटित भी अवश्य होंगे। अत: तभी कहा गया है कि कभी भी झूठ मत बोलो।
जीवन में अभिनय करो लेकिन सकारात्मक अभिनय, बाहर के लोगों को प्रभावित करने के लिए नहीं अपितु मन को प्रभावित करने के लिए। अपने मन को समझाइए कि मैं सुखी और संतुष्ट हूँ। अपने मन को प्रभावित कीजिए कि मैं पूर्णरूपेण स्वस्थ हूँ, मेरे हृदय में सबके लिए प्रेम है। यह अभिनय श्रेष्ठ अभिनय है।
यदि कोई रोग आ घेरता है तो भी घबराइए मत। रोग का आना स्वाभाविक है तो जाना भी निश्चित है। उपचार करते रहिए लेकिन साथ ही मन को दुर्बल मत होने दीजिए। कहिए कि मेरे अंदर रोग से लडऩे की पूर्ण क्षमता है। मैं रोग को भगा कर ही दम लूँगा। विश्वास के साथ किया गया आपका संकल्प आपको हर क्षेत्र में सफलता की ओर अग्रसर करेगा, इसमें संदेह नहीं।
– सीताराम गुप्ता

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