संबंधों का बिगड़ता स्वरूप

संबंधों का बिगड़ता स्वरूप

संबंध एक ऐसा शब्द है जो हमें एक दूसरे से जोड़ता है, पत्नी को उसके पति से, पिता को पुत्र से, बेटी को मां से, बहन को भाई से और एक इंसान को दूसरे इंसान से। संबंध प्रेम और विश्वास पर आधारित होते हैं और जहां प्रेम एवं विश्वास न हो, वहां मात्र दिखावा होते हैं संबंध।
आज संबंधों का स्वरूप ही बिगड़ रहा है। हमारी संवेदनायें समाप्त होती जा रही हैं। अपनत्व नष्ट हो चुका है। संबंधों के नाम पर नाटक रचे जा रहे हैं। हर तरफ संबंधों के साथ छल किया जा रहा है। आखिर क्यों?
क्यों समाप्त होती जा रही हैं हमारी संवेदनायें? समाप्त होती संवेदनायें इतना घटिया रूप धारण करेंगी, सोचा भी न था।
आज प्रत्येक समाचार पत्र में न जाने कितनी ही ऐसी घटनायें प्रकाशित होती हैं जिनमें पिता ने अपनी ही चार या तीन वर्षीय बालिका को बलात्कार का शिकार बनाया या भाई ने बहन से अपनी यौन इच्छा को शांत किया।
ऐसे कुंवारे जो आजीवन अविवाहित रहते हैं या जिनका विवाह ही नहीं होता, उनके बड़े या छोटे भाई जमीन-जायदाद के लालच में अपनी पत्नी को ही उनकी हमबिस्तर बनाते हैं क्योंकि ऐसा करने से उन्हें जमीन-जायदाद की प्राप्ति होती है। ये घटनायें उ. प्र. के बागपत, मेरठ, मुजफ्फरनगर इलाकों में अधिक होती हैं।
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समाप्त होती हमारी संवेदनाओं का यह सबसे घृणित रूप है। हर मनुष्य अपने आप में ही मस्त है। किसी के पास इतना भी वक्त नहीं कि वह अपने आस-पास के जन समुदाय को पहचाने। फिर यही जन समुदाय रिश्तों की आड़ में अपना फायदा उठाते हैं और शेष छोड़ दी जाती है चुप्पी, एक ऐसी चुप्पी जो जीते जी मार दे या मरने के लिए विवश कर दे।
जिस तेजी से संवेदनायें समाप्त होती जा रही हैं उससे कई गुणा तेजी से ये घटनायें घटती जा रही हैं। कभी सोचा हमने कि इन घटनाओं का पूर्ण अंत कहां है?
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चार या छ: वर्षीय बच्ची नहीं जानती कि उसके साथ दुराचार किया जा रहा है परन्तु उसे इस घृणित कार्य से पीड़ा अवश्य होती है शारीरिक भी और मानसिक भी। पीड़ा उस समय और भी रूप धारण कर लेती है जब उसे डराया, धमकाया या मारपीट की जाती है और चुप रहने को कहा जाता है। मुंशी प्रेमचन्द ने कहा, ‘यदि आप एक बार दबते हैं तो आपको हजार बार दबाया जायेगा।’
बेहतर यही है कि चुप्पी तोड़ें और इन पशु रूपी पुरूषों से डरने की अपेक्षा डटकर उनका सामना करें। सर्वप्रथम अपने संबंध पहचानें। क्या रिश्ता है उसके आधार पर व्यवहार करें? न किसी से कट कर (किनारा करके) रहो और न ही किसी की हेयदृष्टि को अनदेखा करें। अपने और रिश्तेदारों के संबंध में सदैव सावधान रहें न कि संवेदनायें समाप्त करें। तभी संबंध बेहतर होंगे और संबंधों का स्वरूप नहीं बिगड़ेगा।
– दीपा शर्मा

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