श्वेत प्रदर को दूर करती हैं हरी सब्जियां

श्वेत प्रदर को दूर करती हैं हरी सब्जियां

vegetableप्रदर का अर्थ होता है, योनिमार्ग से स्राव का बहना। यूं तो योनिमार्ग अपनी दीवारों से हर समय स्राव करता रहता है लेकिन वह स्राव जो अत्यधिक मात्रा में स्रावित हो तथा योनि के वृहत् भगोष्ठों से बाहर बहने लगे, तब उसे प्रदर या ल्यूकोरिया कहा जाता है।
वर्तमान समय में नारी रोगों में प्रदर रोग सर्वाधिक पाया जाने वाला रोग है। भारतीय स्त्रियां रूप व सौंदर्य की दृष्टि से विश्व के बहुत से देशों की महिलाओं की तुलना में अद्वितीय होते हुए भी नब्बे प्रतिशत महिलाएं इस रोग से ग्रस्त होने के कारण अतिशीघ्र अपना रूप सौंदर्य व आकर्षण गंवा बैठती हैं।
वास्तव में प्रदर रोग अपने आप में कोई रोग न होकर सदैव अन्य रोगों के लक्षण के रूप में प्रकट होता है किंतु इसे अभी तक एक स्वतंत्र रोग के रूप में ही समझा जाता है। ऐसा सिर्फ चिकित्सा को सरल बनाने के लिए ही किया जाता है, जिससे समस्याग्रस्त महिला इसे रोग ही मानकर मानसिक रूप से उपचार के प्रति सहज बनी रह सके।
अब प्रश्न यह उठता है कि श्वेत प्रदर की बीमारी होती क्यों है? आइए, इस पर विचार करें। अनियमित ऋतुस्राव (मासिक), रक्ताल्पता, शारीरिक दुर्बलता, गुदा मार्ग से पतले सूत्र कृमियों का बाहर निकलकर योनि में प्रवेश करना, हस्तमैथुन, पुरूष समागम की अधिकता, जरायु का अपने स्थान से हट जाना, छोटी आयु में गर्भवती होना, योनिशोथ, गर्भाशय शोथ, डिम्ब नलिकाओं में शोथ, डिंब गं्रथियों में शोथ, सूजन, मस्सा, फोड़ा, रसौली, गांठ आदि होकर उनका स्राव होना, कामपिपासा की अतृप्ति व अत्यधिक काम चिंतन, अप्राकृतिक मैथुन, गर्भपात, अतिप्रसव, कमजोरी लाने वाली लंबी बीमारी का होना, अश्लील साहित्यों,चित्रों को देखना या पढऩा, ब्लूफिल्में एवं नग्न चित्रों को देखना, श्वेतप्रदर की बीमारी को प्रारंभ कर देती है।
गरिष्ठ भोजन करना, अधिक खटाई मिर्च, तेल, मादक पदार्थों का सेवन, जरूरत से अधिक गर्म व तले हुए पदार्थ खाना, अधिकतर बैठे रहना, शारीरिक श्रम न करना, आंतों में मल का सडऩा, यकृत, गुर्दे, आंतों, फेफड़ों एवं पेट के पुराने रोगों से भी प्राय: श्वेतप्रदर का स्राव प्रारंभ हो जाता है। इसी भांति अति संभोग व कामोत्तेजना से भी जननेन्द्रिय की गं्रथियों का स्राव बढ़ जाता है। स्त्री की मैथुन इच्छा अपूर्ण रहने के कारण भी यह समस्या उत्पन्न हो जाती है।
यह रोग कुछ कौमार्यावस्था में भी प्रारंभ हो जाता है। परिणाम स्वरूप ऐसी लड़कियों का स्वास्थ्य व सौंदर्य अतिशीघ्र नष्ट हो जाता है। बचपन में नग्न योनि रखते हुए धूल-मिट्टी में खेलना, चेचक आदि के उपभेद के रोग से, भू्रण हत्या, कब्ज, असंतुलित भोजन, अधिक सोना, दुर्बलता में भी अधिक कार्य करना, नाखून बढ़ाना, मासिक का बंद हो जाना, विशेष प्रकार के कृमि, ठण्ड लग जाना, या पानी में भीगकर काम करना, बवासीर का रक्तबंद हो जाना, योनि में चैकपैसरी आदि लगवाना, योनि में किसी भी प्रकार का चर्म रोग या खुजली होने पर कामुकतावश किसी वस्तु को प्रवेश कराना आदि कारणों से श्वेत प्रदर का रोग हो जाता है।
कुमारी वयस्क लड़कियोंमें स्वास्थ्य की खराबी, चिंता, क्रध, थकान प्रेम में असफलता, दु:खी पारिवारिक जीवन, छोटी आयु की लड़कियों द्वारा हस्तमैथुन, अप्राकृतिक मैथुन करना व कराना, बड़ी उम्र की स्त्रियों में अत्यधिक संभोग करना, यौन संतुष्टि न मिलना, वृद्धावस्था में भग के अंदर की झिल्लियों का कमजोर हो जाना, नवविवाहिता स्त्रियों अथवा नि:संतान स्त्रियों में सुजाक के कारण भी श्वेतप्रदर की बीमारी हो जाती है।
साधारणत: मादा जानवरों में यह रोग नहीं होता परंतु जब उन्हें हरी घास कम और अनाज अधिक खिलाया जाता है तो उन्हें भी यह रोग हो जाता हैं। जब उनके चारे में से दाना कम करके सिर्फ घास ही दी जाती है तो वे अपने आप इस रोग से मुक्त हो जाती हैं। यह आश्चर्यजनक नहीं है। अनाज से भी तरल बनता है और हरी वस्तु उसे दूर करती है। ठीक यही परिणाम स्त्रियों के आहार में भी परिवर्तन करके प्राप्त किया जा सकता है।
भोजन में अनाज, घी तथा दूध की मात्रा में कमी करके हरी सब्जियों, तथा मौसमानुसार ताजे फलों की मात्रा को बढ़ाकर श्वेतप्रदर की व्याधि से मुक्ति पायी जा सकती है। गुप्तांगों की सफाई, साफ पानी व अच्छे प्रकार के साबुन से या पानी में डिटोल मिलाकर नियमित करते रहना चाहिए।
पूनम दिनकर

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