श्रीकृष्ण का मथुरा छोड़ द्वारिका में बसना?..सपा के आंतरिक विद्रोह को इसी संदर्भ में देखा जा रहा

श्रीकृष्ण का मथुरा छोड़ द्वारिका में बसना?..सपा के आंतरिक विद्रोह को इसी संदर्भ में देखा जा रहा

mulayam-singh-yadav-akhiles-1द्वापर  में यदुवंश में देवकी- वसुदेव के यहां प्रगट होने वाले कृष्ण की अनेकानेक कथाएं और कहानियां प्रचलित है। देवकी की आठवी  संतान से कंस के वध की भविष्यवाणी से चिंतित कंस, देवकी वसुदेव को कारागार में बंदी बना देते है और उनकी आठवीं संतान का इंतजार करने की तैयारी करते है । तब  नारद, महर्षि राजा कंस के राजदरबार में उपस्थित होकर समझाते हैं कि ईश्वर की गणित अजब गजब होती है और वे एक से आठ तक सीधा उल्टा गिनकर यह बता देते हैं कि कोई भी संख्या आठवीं हो सकती है। तब कंस नारद जी के कथन को सच मानकर देवकी की सात संतानों को मार चुकने के बाद जब आठवीं संतान को जमीन पर पटकने के लिए पैर पकड़कर ऊपर उठाता है तो वह लड़की उसके हाथों से छूटकर आकाश मार्ग पर पहुंच जाती है । वह प्रभु की माया थी, उसे पौराणिक कथानक में योग माया कहा जाता है। योग माया आकाश से आकाशवाणी द्वारा कंस को चेतावनी देते हुए कहती है -कंस, तू मुझे कैसे मार सकता है ,मैं योग माया हूं ,परंतु तेरा  वध करने वाला इस दुनिया में आ चुका है। इस घटना के पूर्व देवकी नंदन कृष्ण को वसुदेव यमुना पार कर वृन्दावन पहुंचा चुके थे और यशोदा -नंद के घर पैदा हुई लड़की को लाकर कारागार में रख देते हैं जो योग माया बनकर कंस के हाथों से  फिसलकर हवाई मार्ग से आकाश को पहुंच जाती है। कृष्ण को जन्म देने वाली मां देवकी के भाई कंस के अत्याचारों से मथुरा वासी त्रस्त थे।
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कृष्ण का लालन- पालन वृन्दावन में पालन कर्ता मां यशोदा व पिता राजा नंद के यहां हुआ। कंस का  वध करने के बाद कंस के श्वसुर जरासंध ने  अपने रिश्तेदार  के हत्यारे के रुप में कृष्ण से बदला लेने के लिए सत्रह बार कृष्ण से युद्ध किया और कृष्ण की सेना से उसे हर बार पराजय का मुंह देखना पड़ा। परंतु इस रोज-रोज के  लड़ाई झंझटों से थककर मथुरा छोड़कर कृष्ण ने सौराष्ट्र (गुजरात) में अपनी नई राजधानी द्वारिका पुरी की स्थापना की और अपने रिश्तेदार सहयोगी यदुवंशियों मित्रों के साथ शांति से अपने साम्राज्य का संचालन किया। मथुरा छोड़कर गुजरात पलायन पर उनके विरोधी उन्हें रण छोड़ दास कहकर संबोधित तक करने लगे थे। यादवों के इस संघर्ष को इतिहास में यादवी संघर्ष तथा यदुवंश के विनाश का कारण माना जाता है।उत्तर प्रदेश के वर्तमान सत्ता संघर्ष के लिए समाजवादी पार्टी के आंतरिक विद्रोह को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। 25  वर्ष पूर्व पहलवान रहे मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का गठन किया था। इसके पूर्व वे चौधरी चरणसिंह और जयप्रकाश नारायण के साथ राजनीति में आये थे। इन पचीस वर्षों में मुलायम सिंह देश के रक्षा मंत्री भी रहे। तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और वर्तमान में सांसद तथा समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पार्टी सुप्रीमों हैं, उनके परिवार के उन्नीस सदस्य विभिन्न पदों पर है जिनमें पांच लोकसभा सदस्य, एक मुख्यमंत्री, एक राज्यसभा ,एक मंत्री अखिलेश केबिनेट में और इस तरह पूरे प्रदेश में सत्ता का पूर्ण रुपेण यादवीकरण हो चुका है। कहते है यदि वंश बड़ा हो जाए और तीसरी पीढ़ी जवान तो मुखिया को मान लेना चाहिए कि अब वानप्रस्थ का समय आ गया है।
रामगोपाल की बर्खास्तगी निरस्त किये बगैर शिवपाल की मंत्रिमण्डल में वापसी नहीं: अखिलेश
सन 2012 के विधानसभा चुनाव में 224 स्थान (403 में से) पाकर समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था। तब मुलायम सिंह ने अपनी पहली पत्नि के बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया था। अब जब साढ़े चार वर्ष पूर्व होकर 2017 की पहली तिमाही में चुनाव होना है तो अखिलेश यादव और उनके सगे चाचा शिवपाल के बीच गृहयुद्ध चरम पर है। चचेरे चाचा रामगोपाल यादव  राज्यसभा में हैं। वे अखिलेश के पक्षधर बताये  है। परंतु परिवार के अंदर से यह खबरें आ रही हैं कि मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नि साधना गुप्ता के बेटे प्रतीक  यादव भी अब सत्ता में अपनी विरासत मांग रहे, चाह रहे हैं, जो सहज और स्वभाविक है। जब मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी  से निष्कासित अमरसिंह को राज्यसभा के लिए टिकट दिया था तभी से ऐसी सुगबुगाहट थी कि कुछ न कुछ अनहोनी होने वाली है और उनको राष्ट्रीय महामंत्री बनाने के बाद तो विस्फोट ही  हो गया।परिवार की कलह सड़कों पर, सुलह के लिए बैठकों का दौर, अब देखना यह होगा कि क्या कृष्ण रूपी सत्ता फिर सौराष्ट्र की तरफ जायेगी। मुलायम सिंह यादव परिवार के 19 सदस्य सांसद व विधायक है तथा उनके कुनवे के 59 व्यक्ति ब्लाक प्रमुख, जिला प्रमुख और एमएलसी तथा विभिन्न निगमों वार्डोें में सदस्य हैं। वर्तमान राजनैतिक संकट में परिवार का घमासान आने वाली विपत्ति का संकेत मात्र है।
मुलायम की अखिलेश को नसीहत ,बोले मोदी से सीखो..पीएम बनके भी मां को नहीं छोड़ा

झगड़ा अमरसिंह से शुरू होकर पिता पुत्र का , चचेरे भाई का, समर्थकों का, मुलायम सिंह की दूसरी पत्नि के बेटे तथा आजम खां और अमरसिंह तक होते होते अब स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि अखिलेश यादव ने यहां तक कह दिया है कि नेता जी यानि उनके पिता मुलायम सिंह को अब समय आ गया है कि वे पार्टी सुप्रीमों के नाते पुत्र व दलाल में किसे चुनते है, अखिलेश यादव ने खुली मीटिंग में अमरसिंह को दलाल कहा और मुलायम सिंह ने अपने चचेरे भाई रामगोपाल यादव को पार्टी से निकाल दिया 6 वर्षोें के लिए,यदुवंश की लडाई देखते है किस अंजाम तक पहुँचती है ।
-वेणीशंकर उपाध्याय
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