शीतकाल में दक्षिण की यात्रा-दर्शनीय श्री रामेश्वरम् धाम

शीतकाल में दक्षिण की यात्रा-दर्शनीय श्री रामेश्वरम् धाम

 धर्मप्राण भारत में प्राचीनकाल से ही तीर्थों की स्थापना की परंपरा रही है, इसी परंपरा के अनुसार विशाल भारत देश को एकता-सूत्र में बांधे रखने के लिये परम पवित्र चार धामों की स्थापना चार दिशाओं में की गई है। उत्तर में हिमालय की गोद में बदरीनाथ, पश्चिम में द्वारिकापुरी, पूरब में जगन्नाथ पुरी तथा सुदूर दक्षिणी छोर पर स्थित है, चौथा धाम रामेश्वरम् तीर्थ।
तीर्थ स्थापना की कथा:- चारों धामों में सुप्रसिद्ध हिंदू तीर्थ रामेश्वरम् की स्थापना के संबंध में अनेक प्रकार की पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं किन्तु सर्वत्र यह मान्यता है कि रावण को पराजित करके सीताजी को लंका से वापस लाने पर राम ने इस पावन तीर्थ की स्थापना की। यह कथा भी कही जाती है कि महाबलशाली लंकाधिपति रावण से युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिये राम ने अपने इष्टदेव शंकर की उपासना यहीं की थी। महादेव प्रसन्न हुए और विजय प्राप्त करने का वरदान दिया।
एक अन्य कथा के अनुसार लंकेश रावण को मारने से रामचन्द्रजी को ब्राह्मण हत्या का महापाप लगा। इसी पाप के प्रायश्चित हेतु लंका से वापस आते ही भारत भूमि पर सागर किनारे रामजी ने महादेव शिव की पूजा अर्चना की और पाप मुक्त हो गए।
यह भी कहा जाता है कि लंकाविजय के महायुद्ध में रावण सहित सवा लाख योद्धा मारे गए। ऐसी हिंसा से त्राण पाने और देवों के देव शंकर को दिए गए वचन के अनुसार सागर तट पर शिवलिंग की स्थापना की बात तय हुई। इसके लिये शिवलिंग लाने हेतु पवनपुत्र हनुमान को काशी भेजा गया। समय बीत रहा था पर हनुमान वापस नहीं आ पाए। ऐसी स्थिति में स्वयं श्रीराम ने अपने हाथों से वहां उपलब्ध रेत से ज्योतिर्लिंग बनाकर स्थापित कर दिया।
बाद में हनुमान जी आए तो उन्हें अपने विलम्ब पर बहुत दु:ख हुआ। अपने भक्त हनुमान को इस प्रकार दुखित देखकर श्रीराम ने उनके द्वारा लाए शिवलिंग की भी स्थापना कर दी और कहा कि जो भक्त इस शिवलिंग से पहले हनुमान जी के लाए हुए ज्योतिर्लिंग की पूजा करेगा, उसी को अधिक पुण्य मिलेगा। इसलिये मुख्य मंदिर में पूजा करने से पहले भक्तजन इस मूर्ति के दर्शन कर लेते हैं।
रामेश्वरम् का मुख्य मंदिर:- तमिलनाडु प्रदेश के दक्षिण छोर पर सागर तट के पास एक छोटा द्वीप है जिसे पौराणिक साहित्य में शंखद्वीप कहा गया है। यहीं सागर लहरों से सदा आलोडि़त तट पर स्थित है रामनाथ स्वामी का भव्य मंदिर। कठोर चट्टानों से बने मुख्य मंदिर में श्रीराम द्वारा स्थापित स्फटिक का अत्यन्त सुंदर ज्योतिर्लिंग है। इसके ऊपर शेषनाग के फणों का विशाल छत्र है। ऐसी परंपरा है कि यहां हरिद्वार और संगम गंगाजल चढ़ाने की ही धार्मिक महत्ता है।
समुद्र तट पर स्थित रामेश्वरम् के इस विशाल मंदिर के चारों ओर पत्थर की ऊंची दीवार है। मुख्य मंदिर के पूरब और पश्चिम में क्रमश दस और सात मंजिले उत्तंग गोपुर बने हैं जिनमें अनेक देवी-देवताओं और पशु-पक्षियों की मूर्तियां हैं। मुख्य मंदिर के चारों ओर पत्थर के स्तंभों से निर्मित विशाल परिक्रमा पथ यहां की अपनी अलग विशेषता है। बारह सौ मीटर से भी अधिक लंबाई वाली इस दीर्घा में करीब ग्यारह सौ प्रस्तर स्तंभ (दोनों ओर मिलकर) हैं जिन पर कलात्मक खुदाई की गई है। इसे संसार का सबसे बड़ा परिक्रमा पथ माना जाता है जो भारतीय शिल्प का बेजोड़ नमूना है।
मुख्य मंदिर का अहाता दो सौ मीटर चौड़ा और दो सौ साठ मीटर लंबा है। मंदिर के पास और परिक्रमा पथ के साथ सब मिलाकर बाईस कूप और छोटे-बड़े सरोवर हैं। ऐसी मान्यता है कि इनके जल से स्नान करने से भक्तजनों की मनोकामना पूरी होती है। विशेषकर युगल दंपति संतान की कामना से यहां के जल से स्नान करके पूजा करते हैं।
मंदिर के अंदर रामलिंग स्वामी तथा पार्वती (पवमह-वर्घिनी अम्मन) की प्रतिमा है। साथ में विश्वनाथ स्वामी और विशाललक्ष्मी अम्मन की प्रतिमाएं हैं। बाहर सोने से मढ़ा हुआ गरूड़ स्तम्भ है। इसके पास ही सफेद रंग की नदी की करीब चार मीटर से अधिक ऊंची प्रतिमा है।
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अन्य दर्शनीय स्थल:- इस शंख द्वीप पर रामनाथ स्वामी मंदिर के अलावा भी अनेक दर्शनीय स्थल हैं। मंदिर से थोड़ी दूरी पर एक पहाड़ी है जिसे गंधमादन पर्वत कहा जाता है। यहीं रामझरोखा है जहां पर एक ओर श्रीराम चिन्ह के दर्शन होते हैं और दूसरी ओर द्वीप तथा अनंत सागर का दृश्य दिखाई पड़ता है। यहां से करीब आठ किलोमीटर की दूरी पर कोदंडराम स्वामी का मंदिर है। यही वह स्थान है जहां श्रीराम ने विभीषण का राजतिलक किया था।
इस द्वीप के दक्षिण छोर पर धनुष कोटि नाम का स्थान है। यह तीर्थ स्थल भी है तथा श्रीलंका जाने वाले जहाजों के लिये बंदरगाह भी है। यहां से लंका अभियान के लिये श्रीराम ने सेतु निर्माण किया था। अब भी सागर लहरों के बीच रेत के छोटे-छोटे टीले दिखाई पड़ते हैं, जिन्हें सेतु बांध रामेश्वरम् का अवशेष कहा जाता है। कहते हैं लंका विजय से लौटने पर श्रीराम ने अपनी धनुष की नोक (धनुषकोटि) से उस पुल को ध्वस्त कर दिया था जिससे राक्षणगण भारत भूमि पर वापस नहीं पहुंच सकें। यहां पर सागर स्नान का विशेष धार्मिक महत्त्व है।
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इन धार्मिक स्थानों के अलावा रामेश्वरम् का महत्व पर्यटन केन्द्र तथा मछली पालन अनुसंधान केन्द्र के लिये भी है। यहां के सागर जल में अनेक प्रकार के जलचर पाये जाते हैं। इस तट से थोड़ी दूरी पर सागर लहरों के बीच मंूगे के द्वीप भी दिखाई पड़ते हैं। इस क्षेत्र में नारियल, शंख तथा कौडिय़ों से निर्मित हस्तकला से बनी आकर्षक वस्तुओं के अनेक बाजार हैं।
यात्रा मार्ग और अन्य सुविधाएँ:- रामेश्वरम् के दर्शन के लिये दूर-दूर से श्रद्धालु प्राय: हर मौसम में आते रहते हैं। भारत की मुख्य भूमि से रामेश्वरम् तथा धनुषकोटि तक रेल लाइन की व्यवस्था बनी थी किन्तु करीब दस साल पहले भयंकर तूफान और सागरीय लहरों के कारण पुल क्षतिग्रस्त हो गया। मंडपम् और पंबन के बीच रेल पुल पुन: ठीक कर दिया गया। अब मंडपम् से पंबन के मध्य सागर पर सड़क पुल का भी निर्माण हो गया है।
यात्रियों के निवास के लिये यहां धर्मशालाएं तथा अनेक यात्री-निवास हैं पर्यटन विभाग और सरकारी अतिथिगृह भी हैं। यहां होटल और बाजार में सब प्रकार का भोजन मिल जाता है किन्तु इडली-डोसा और चावल की प्रधानता है। सागर तट पर स्थित होने के कारण मौसम अच्छा और सुहावना रहता है, केवल गर्मी के दिनों में धूप बहुत तेज होती है। यहां के लोग तमिल और अंग्रेजी के अलावा हिन्दी बोलते और समझते हैं तथा यात्रियों को यथासंभव सहयोग देते हैं।
– राधाकान्त भारती

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