शादी के बाद आगे पढ़ना है मुश्किल…!

शादी के बाद आगे पढ़ना है मुश्किल…!

 आज के आधुनिक युग में जहां शिक्षा, राजनीति, व्यापार जगत खेल आदि सभी जगहों पर महिलाओं को पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने एवं उनकी बराबरी करने की आजादी दी है, वहीं पर उनकी स्वतंत्रता में बाधा डालने वाले समाज के दुश्मनों की संख्या में अभी तक कोई खास कमी नहीं आ पाई है।
अगर हम इन बालिकाओं के मां बाप की राय मानें तो अक्सर उनका यही कहना रहता है कि बेटी है, ज्यादा पढ़ा लिखा कर क्या फायदा? नौकरी तो करनी नहीं है। घर-परिवार ही संभालना है। इन अभिभावकों की ऐसी सोच के पीछे मुख्य कारण यह है कि देश की जनसंख्या का दो तिहाई भाग ग्रामीण अंचलों में निवास करता है जहां कहीं-कहीं पर गांवों को शहरों से जोडऩे वाले संपर्क मार्गों का अभाव एवं शहर आने जाने के लिए सवारी के साधनों की कमी तथा गांव से शहर के बीच की दूरी भी अधिक है।
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शिक्षा के लिए विद्यालय केवल प्राथमिक स्तर तक ही सीमित हैं, इस कारण यहां पर बच्चों की पढ़ाई, ग्रामीण इलाकों में प्राइमरी कक्षाओं तक ही सीमित रह जाती है। बेटी जब शादी के पवित्र बंधन में बंधकर अपने सुनहरे सपनों की दुनिया में खोई, बहू के रूप में ससुराल में पहला कदम रखती है तो उसको यह मालूम नहीं रहता कि उसके सपने पल भर में टूट कर बिखर जायेंगे। अपनी पढ़ाई-लिखाई आगे जारी रखने के लिए बहू जब अपने सास या ससुर अथवा पति से चर्चा करती है तो प्राय: उनका यही जवाब होता है कि क्या करोगी?
पढ़-लिखकर, नौकरी करोगी? हमारे घर-परिवार में ऐसा रिवाज नहीं है। हमारे परिवार में पढ़ाई और नौकरी दूर की बात है। बहू घर से बाहर तक नहीं निकलती। आपके मां बाप ने जो कुछ पढ़ा लिखा दिया है, उतना बहुत है हमारे लिए। बाकी बातें भूल जाओ।
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इस मामले में लड़की का पति भी अपने मां-बाप की रूढि़वादी एवं पुरानी विचारधारा का समर्थन करता है। चाहे उसके मां बाप उसके साथ गलत ही कर रहे हों, उसके लिए सब सही है। पति का जवाब अपनी पत्नी के लिए यही होता है कि ‘हम मर्द हैं। औरत की कमाई नहीं खाते।’
आज के आधुनिक युग में जहां शिक्षित बहुएं अपने परिवार के पालन-पोषण एवं घर की देख भाल में आर्थिक रूप से मदद कर रही हैं। इसके लिए वो कोई नौकरी, चाहे वह प्राइवेट स्तर पर हो या सरकारी स्तर पर उसको करके अपने पति के साथ बराबर सहयोग दे रही हैं। इन पुराने जमाने के अनपढ़ एवं रूढि़वादी विचारधारा के लोगों की कितनी घटिया सोच है, हम अंदाजा लगा सकते हैं।
ऐसे में यही उचित होगा कि विवाह से पूर्व ही लड़कियों को अधिक से अधिक पढ़ाने का प्रयास किया जाए।
– मूलचंद विश्वकर्मा

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