शादियों में बढ़ती जा रही है फिजूलखर्ची

शादियों में बढ़ती जा रही है फिजूलखर्ची

marriage houseशादी तो वर-वधू के लिए ही नहीं उनके घरवालों के लिए भी आनंद और आह्लाद का अवसर है। वधू पक्ष और वरपक्ष के परिवार वाले यही चाहते हैं कि यह अवसर अत्यधिक हर्षोल्लास के साथ मनाएं। अपने इस आनंदपूर्ण अवसर के साक्षी बनने के लिए दोनों पक्ष अपने अपने रिश्तेदारों, मित्रों एवं सामान्य परिचितों को भी आमंत्रित करते हैं। उनके आतिथ्य के लिए अत्यंत स्वादिष्ट षड्स भोजन की दावत तैयार कराते हैं। देश-काल के रीतिरिवाज के अनुसार वर-वधू को सजाते हैं, परंपरागत बाजे इत्यादि का भी इंतजाम करते हैं।
सामान्यत: वधू पक्ष को ही ज्यादा खर्च करना पड़ता है। विवाह के मंडप व पंडाल/हॉल का किराया अब तो बढ़ते-बढ़ते एक लाख रूपए तक आ गया है। जितने अधिक लोगों को विवाह की दावत के लिए आमंत्रित करते हैं, उतना ही अधिक विशाल हॉल बुक करना होगा।
पहले तो तीन सौ चार सौ लोग ही आमंत्रित होते थे पर आजकल मध्यवर्गीय परिवार की लड़की की शादी में तो हजार के करीब लोग आमंत्रित होते हैं। जैसे राजनीतिक दलों की शक्ति का प्रदर्शन सभा सम्मेलनों में बड़ी भारी भीड़ जमा करते हुए करते हैं, उसी प्रकार परिवारों की शान-शौकत का मापदंड शादी के अवसर पर एकत्र होने वाले अतिथियों की संख्या माना जाने लगा है।
दावत में जितने अधिक पदार्थ परोसे जाते हैं, खर्चा भी उसी अनुपात में बढ़ता है। केरलीय दावत में करीब बीस पदार्थ परोसे जाते हैं। वधू को अलंकृत करने में होड़ सी लग गई है। विवाह के मुहूर्त में पहनने के लिए हजारों रूपए का वस्त्र खरीदा जाता है। आभूषणों का क्या कहना। सोने का दाम यद्यपि दिन दिन बढ़ता जा रहा है तो भी वधू को पहनाए जाने वाले स्वर्ण आभूषणों का वजन बढ़ता ही जा रहा है। वर-पक्ष मांगे, या न मांगे, वधू को अधिक से अधिक आभूषणों से अलंकृत करना वधू वक्ष अपनी प्रतिष्ठा की निशानी मानता
है। विवाह के रस्मो रिवाज में आडंबर, दिखावा और खर्च के नए नए मुद्दे जुड़ते जा रहे हैं। केरल की हिंदू नायर जाति के विवाह का उदाहरण ही लें। पहले तो वधू पक्ष को विवाह के दिन की दावत का ही इंतजाम करना होता था। अब तो विवाह की तिथि निश्चित करने के दिन भी भारी दावत का इंतजाम करना होता है। इस रस्म को निश्चियम् कहते हैं। पहले तो दोनों पक्षों के करीब बीस पच्चीस जन ही आमंत्रित होते हैं। अब तो इस में भी सैंकड़ों अतिथियों को आमंत्रित करने का रिवाज चल पड़ा है।
विवाह के पिछले दिन की शाम को विवाह के लिए आमंत्रित ऐसे जनों के लिए वधू के घर में प्रीतिभोज आयोजित होता है जो वधू को कोई न कोई तोहफा भेंट करने आते हैं। ये तोहफे ज्यादातर ऐसी वस्तुओं के होते हैं जिन का दंपति के जीवन में कोई उपयोग नहीं हो सकता।
पहले तो ऐसे प्रीतिभोजों में केवल शाकाहारी भोजन ही परोसा जाता था। अब आए दिन सामिष का भी समावेश होने लगा है। कहते हैं कहीं कहीं शराब की बोतलों का भी प्रवेश मिलता है। माना कि अमीरों के लिए यह ठीक है पर आम आदमी ऐसी प्रवृत्तियों का अनुकरण करने के लिए ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेने चले तो?
यह शुभ लक्षण हैं कि विवाह के नाम पर बढ़ रहे ऐसे आडंबरों व फिजूल खर्ची की आलोचना नायर सर्विस सोसायटी नामक जातीय संगठन के नेतृत्व में होने लगी है जिस का प्रभाव भी प्रकट रूप से दिखने लगा है। यदि हर जातीय संगठन जाति को ग्रसित कर रहे ऐसे आडंबरों और फिजूलखर्चियों आदि की कड़ी आलोचना करने लगे उस का जो समेकित प्रभाव भारतीय समाज पर पड़ेगा, वह श्रेयस्कर होगा ही।
के. जी. बालकृष्ण पिल्लै

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