शाकाहारी बनें, स्वास्थ्य सुधारें…!

शाकाहारी बनें, स्वास्थ्य सुधारें…!

हो सकता है आप प्रारंभ से ही शाकाहारी रहे हैं और मांसाहार को वर्ज्य मानते हैं। यहां तक कि अंडा, मछली, मांस की गंध ही आप को अरोचक लगती हो। ऐसी अवस्था में आप का स्वास्थ्य निश्चित रूप से आप के मांसाहारी मित्रों के स्वास्थ्य की अपेक्षा काफी सुधरा हुआ होगा। आप भाग्यवान हैं। यदि दुर्भाग्यवश आप में घर के वातावरण के कारण या मित्रों की संगति के कारण मांसाहार की आदत पड़ गई हो तो निश्चित रूप से आप की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी अपेक्षाकृत अधिक होंगी पर चिंता की कोई बात नहीं। आप यदि चाहें तो इसी क्षण अपनी आदत में परिवर्तन लाना आरंभ तो अवश्य कर सकते हैं। आयुर्वेद का मानना है कि हमारे शरीर को चार खंभे थामे हुए हैं 1. भोजन 2. व्यायाम 3. ब्रह्मचर्य और 4. निद्रा। भोजन को प्रथम स्थान दिया गया है। भोजन के संबंध में पांच बातें विचारणीय हैं 1. क्या खाएं? 2. कब खाएं? 3. कितनी बार खाएं? 4. कितना खाएं? और 5. कैसे खाएं? यहां तो केवल पहले प्रश्न का ही उत्तर ढूंढ रहे हैं यानी-क्या खाएं?
एक बार मैंने प्राकृतिक चिकिसा पर एक कोर्स किया था। उस में आचार्य शर्माजी ने मानव शरीर की बनावट की विवेचना करते हुए यह समझा देने का प्रयास किया था कि मनुष्य का शरीर ही शाकाहार के लिए बना है। उनके तर्क थे कि मांसाहारी जीवों के शेर, भेडिय़ा आदि के नाखून पैने होते हैं, जीभ खुरदरी होती है, मांस की गंध उन्हें मोहक लगती है। हम मनुष्यों की बात ठीक उल्टी है। हमारे नाखून पैने नहीं, न ही हमारी जीभ खुरदरी है। मांस की गंध हमें रोचक नहीं लगती। मांसाहारी व्यक्ति भी तभी मांस की गंध पसन्द करते हैं जब मसाले के साथ पकाया जाता है। ऐसा है न? सेब, संतरे इत्यादि की गंध हमें मोह लेती है न? शर्माजी कहा करते थे हाथी को देखिए। कितना बलिष्ठ शरीर है उसका? स्थल जीवियों में आकार की दृष्टि से श्रेष्ठतम? पर क्या वह मांस खाता है? कभी नहीं।
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केरल के प्रमुख आयुर्वेद चिकित्सक वैद्यभूषणम राघवन तिरूमुल्पाड का मानना है कि हर प्रदेश की खेती से उत्पन्न उपज ही उस प्रदेश के निवासियों के लिए उत्तम भोजन है। मांसाहार के कुपरिणामों पर विचार करते हुए तिरूवनंतपुरम मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. के माधवन कुट्टी लिखते हैं गाय, बकरी, सूअर जैसे जानवरों के लाल मांस से बना भोजन हृदय, रक्तचाप और सन्धि संबंधी कुछ रोगों का मुख्य कारण माना जाता है।
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वे यह भी मानते हैं कि भुनी हुई सूखी मछली खाने से भोजन नली में तथा गाय, बैल, बकरी आदि का मांस खाने से आंत में कैंसर होने की संभावना प्रमाण सिद्ध हो चुकी है। कैंसर चिकित्सालयों में प्रवेश पाने वाले रोगियों के आंकड़ों के आधार पर बताया जाता है कि ऐसे रोगियों में शाकाहारियों का अनुपात बहुत कम है। अब आप ही निर्णय लीजिए कि शाकाहारी बनें या नहीं। मैं पूर्णत: शाकाहारी हूं और शायद इसी कारण मधुमेह, रक्तचाप जैसी शिकायतों से पूर्णत: मुक्त रहा हूं।
– के.जी. बालकृष्ण पिल्लै

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