शशिकला में नहीं है जयललिता वाला माद्दा..डॉ. प्रभात ओझा

शशिकला में नहीं है जयललिता वाला माद्दा..डॉ. प्रभात ओझा

जे जयललिता का निधन हुआ, तभी कयास लगने लगे थे कि उनकी करीबी मित्र शशिकला उनकी उत्तराधिकारी बन सकती हैं। अलग बात है कि शशिकला के विरोधी भी कम नहीं थे। पूरा परिदृश्य कुछ इस तरह था कि एक ओर कार्यवाहक सीएम पनीरसेल्वम थे तो दूसरी तरफ महासचिव शशिकला। यह संयोग ही है कि दोनों ही नेता थेवर समुदाय से हैं। समुदाय की बात वैसे बेमानी हो जाती है, क्योंकि तमिलनाडु में दोनों बिना जनाधार वाले नेता हैं। रही पार्टी संगठन और विधानमंडल दल पर पकड़ की बात। इस अर्थ में पनीरसेल्वम की पहचान जयललिता भक्त की रही है। अपने जीवन काल में स्वयं जयललिता ने पनीरसेल्वम को अपनी कुर्सी सौंपी थी। पनीरसेल्वम ने भी अपनी नेता का खूब सम्मान किया और सीएम की कुर्सी पर जयललिता की फोटो रखकर सूबे की सरकार चलाई। जयललिता नहीं रहीं तो सीएम पद की शपथ लेते पनीरसेल्वम की आंखों में आंसू थे, रुंधा हुआ गला था तो ऊफरी जेब में थी जयललिता की तस्वीर। राज्य की जयललिता भक्त जनता को पनीरसेल्लवम का यह स्वरूप खूब भाया। याद रखना होगा कि सीएम बनाने का फैसला जनता को नहीं करना था। इसलिए यह भी नहीं कह सकते कि जयललिता भक्त जनता दोनों में से किसे अपनी नेता की जगह देना चाहती थी।
मोदी ने जनता से किये झूठे वादे..उन्हें छलने का काम किया : अजित
 विधानसभा के चुनाव पहले ही हो चुके थे। चुने हुए विधायकों के बीच कार्यवाहक सीएम को पूर्णकालिक बनने में कोई दिक्कत नहीं हुई। भावावेश के दौर और फैसला लेने का आपातकाल, दोनों ही पनीरसेल्लवम के हक में थे। तब शशिकला शायद मन मसोस कर रह गई होंगी। फिर भी जल्द ही उनका पार्टी का महासचिव बना दिया जाना इस बात का प्रमाण था कि जयललिता के घर में निवास करने वाली उनकी दोस्त पार्टी में भी मजबूत पकड़ बनाये हुई हैं। यह मजबूत पकड़ ही रही जो अब काम आई है। देश के बड़े राजनेताओं को भी इसका अहसास पहले से थे। तभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब जयललिता को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे, उन्हें पनीरसेल्लवम को ढाढ़स बंधाने के साथ शशिशकला के सिर पर हाथ रखते हुए भी देखा गया था। जयललिता के सिर पर हाथ अब एआइएडीएमके के बहुतायत विधायकों ने भी रख दिया है। इसका अंदाज लगाकर ही खुद पनीरसेल्लवम ने ही विधानमंडल दल के नेता के रूप में शशिकाल के नाम का प्रस्ताव रखा। अल्प अवधि वाले पनीरसेल्लवम ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया है और अब विधानमंडल दल की नयी नेता का मुख्यमंत्री बनना तय है। मुख्य बात तो यह है कि पनीरसेल्लवम अब आगे क्या करेंगे।
अखिलेश और राहुल ने गढ़ी ‘स्कैम’ की परिभाषा..स्कैम का सही मतलब होता है ‘सेव कंट्री फ्राम अमित शाह एंड माेदी’
कार्यवाहक मुख्यमंत्री रहने के बाद भी वे जयललिता की वापसी पर उनके साथ मंत्रिमंडल में कार्य कर चुके हैं। क्या शशिकला के साथ भी वह ऐसा ही करेंगे? उत्तर सकारात्मक होने पर भी बहुत कुछ अलग होगा। ताकतवर नेता जयललिता के नहीं रहने पर पार्टी और सरकार के अंदर उनके दोनों करीबियों के बीच सत्ता संघर्ष जारी रहेगा। जिस तेजी से पहले पनीरसेल्लवम और अब शशिकला को सीएम की कुर्सी मिली है, उस जल्दबाजी में आगे के संघर्ष का कोई परिणाम नहीं आने वाला है। राज्य की दलित राजनीति में एक ही समुदाय से आने वाले नेता अपने जनाधार की तलाश तक एक-दूसरे के हर कदम पर नजर रखेंगे। इस संघर्ष में जयललिता की भतीजी दीपा जयकुमार के भी तीसरे कोण बनाने की संभावना बनी रहेगी। याद करना होगा कि दीपा ही जयललिता के परिवार की एकमात्र बची हुई सदस्य है। जयललिता के अंतिम दिनों में उसे अपनी बुआ के पास फटकने तक नहीं दिया गया था। यह वह समय था, जब शशिकला ही जयललिता के छाये की तरह उनके आगे-पीछे रहा करती थीं। आज इतिहास को भी याद करना होगा कि कभी एमजीआर की बेहद करीब रही जयललिता को अपन नेता के निधन के बाद उनके शव के पास जाने तक के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी थी। पार्टी की प्रचार सचिव रही जयललिता को पार्टी और सरकार पर नियंत्रण हासिल करने के लिए संघर्ष भरा रास्ता तय करना पड़ा। आज जयललिता की बेहद करीबी को सब कुछ बहुत आसानी से मिल गया है, पर यह तय है कि आगे सभी कुछ आसान नहीं रहेगा।

Share it
Top